वह भोड़सी का संत

अब जाटभूमि भोड़सी में भोजपुरी नहीं सुनाई देगी. क्योंकि भोड़सी की पहाड़ियों को भोजपुरी से तर रखने वाले पूर्व प्रधानमंत्री श्री चंद्रशेखर अब इस दुनिया में नहीं है. अब भोड़सी जाने पर न भोजपुरी सुनाई देगी और न ही उस खुरपे की खपर-खपर सुनाई देगी जिन्हें चंद्रशेखर खुद अपने हाथ में लिये यहां-वहां खर-पतवार निकालते रहते थे. भोड़सी से उन्हें इतना प्रेम था कि सरकार और पंचायत ने अपनी जमीन वापस ले ली तो थोड़ी दूर पर निजी जमीन खरीद उस पर नये निर्माण में जुट गये. और जब तक शरीर ने साथ दिया वे वहीं बने रहे.
यह दुखद है कि उनका अन्त बहुत सम्मानजान परिस्थितियों में नहीं हुआ. दो-तीन साल से हड्डी का कैंसर भुगत रहे चंद्रशेखर जीवट वाले आदमी थे. कैसी भी परिस्थिति हो पीठ नहीं दिखाते थे और कितने भी झंझावात आ जाएं एक बार कदम आगे बढ़ा दिया तो फिर पीछे नहीं लौटते थे. लेकिन यह स्वभाव जीवन के आखिरी दिनों में उनको बहुत भारी पड़ा. बहुत से लोग उन्हें छोड़कर चले गये. जो उनके आस-पास बचे रहे वे चंद्रशेखर का नैतिक उत्तराधिकार लेने की जगह उनके भौतिक उत्तराधिकारी होने में ज्यादा रूचि ले रहे थे. उनके जीवन का सबसे आखिरी विवाद रहा जे पी ट्रस्ट पर कब्जे को लेकर जो बवाल मचा था, वह. इस विवाद ने उनके कई घनिष्ठ मित्रों और शुभचिंतकों को उनसे दूर कर दिया. फिर भी उनके स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आया. एक बार जिस फैसले के साथ चले गये तो चले गये.

उनकी बीमारी बढ़ती जा रही थी. घर में लोगों ने विचार किया कि इलाज के लिए अमेरिका ले जाएंगे. यह डेढ़ साल पहले की बात है. अमेरिका जाने से पहले उनके कुछ शुभचिंतकों ने दिल्ली में एक महामृत्युंजय का जाप और रुद्राभिषेक रखा था. चंद्रशेखर खुद वहां नहीं आ सकते थे इसलिए मुझे कहा गया कि रूद्राभिषेक के लिए जल लेकर मैं उनके पास जाऊं और उनसे स्पर्श करवाकर वापस ले आऊं. वही आखिरी बार उन्हें देखा था. सिकुड़कर गठरी हो गये थे. एक-एक शब्द बोलने में भी उन्हें काफी मुश्किल आती थी. बहुत नजदीक जाने पर ही समझ में आता था कि वे क्या बोल रहे हैं. उसी समय लग गया कि अब वे ज्यादा दिन के मेहमान नहीं है. फिर भी वे डेढ़ साल तक अपने रोग से लड़ते रहे. अमरीका से इलाज कराकर लौटे तो सेहत में काफी सुधार हो गया था. और एक दिन संसद भी गये. थोड़ी देर कार्रवाई में हिस्सा लिया और लोगों से मिले-जुले भी. आखिरी बार जनता को चंद्रशेखर तभी दिखे थे. उसके बाद सीधे उनके न होने की खबर आयी.

भारतीय संसदीय व्यवस्था और ब्यूरोक्रेशी में उनकी गहरी आस्था थी. एक बार कुछ लोगों के साथ बातचीत में उन्होंने कहा था ब्यूरोक्रेशी का कोई जवाब नहीं है बशर्ते हम इसका उपयोग करना जानते हों. बाहर निकलने पर उनके विश्वसनीय पत्रकार रामबहादुर राय से मैंने पूछा कि चंद्रशेखर जी की ब्यूरोक्रेशी में इतनी आस्था क्यों है, वे तो आंदोलन से निकले जननेता हैं, कम से कम उन्हें ऐसी बात नहीं करनी चाहिए. रामबहादुर राय ने कहा था कि सरकार में रहने के बाद सबकी सोच में बदलाव आ ही जाता है. सोच के इस परिवर्तन ने चंद्रशेखर को जननेता की छवि से दूर कर दिया, यह साफ दिखता है. उनके ऊपर आरोप लगता था कि वे राजनीति के रिलांसय थे जो देशभर में रियल एस्टेट बनाने में लगा रहता है. आरोप प्रत्यारोप राजनीति का अहम हिस्सा है, इसके बावजूद कोई यह नहीं कह सकता था कि उनके जुझारूपने में कोई परिवर्तन आया हो. हां, उस जुझारूपने के मायने बदल गये थे.

वीपी सिंह से रिश्ते उनके जीवन का वह अध्याय है जिसके बिना चंद्रशेखर का कारवां बनता नहीं है. वी पी सिंह के बारे में उनकी जीवनी पर लिखी गयी किताब “जिन्दगी का कारवां” में वे लिखते हैं “विश्वनाथ प्रताप सिंह का उदय राजनीति में फिसलन की शुरूआत थी. भ्रष्टाचार के मुद्दे को उन्होंने भावनात्मक बना दिया. फिर भी मेरा वीपी सिंह से कोई व्यक्तिगत विरोध नहीं था.” जैसा कि जीवन के आखिरी दिनों में जेपी ट्रस्ट विवाद में प्रभाष जोशी भी उनसे दूर हो गये थे. फिर भी एक बात कहते हैं “पत्रकारिता में होने के कारण अगर मैंने कुछ ऐसा लिखा जिसमें उनकी आलोचना होती थी, फिर भी उन्होंने उन बातों को मित्रता में कभी आड़े नहीं आने दिया.” दोस्तों के दोस्त और शरण में आये लोगों के अभयदानकर्ता चंद्रशेखर का यह बेजोड़ व्यक्तित्व था. उनके जाने से शीर्ष पर यह खालीपन उभर आया है. हाल-फिलहाल में इसे कौन भरेगा, यह कहना मुश्किल है.

“संसद में बड़े घरानों के लिए लोग पहले से लाबिंग करते आ रहे हैं. एक दौर था जब यह काम आंख की शर्म बचाकर किया जाता था. अब यह संसद की हैसियत से जुड़ गया है” अपने जीवन में संसदीय प्रणाली की शुचिता के लिए सदैव चिंतित रहनेवाले उस भोड़सी के संत श्री चंद्रशेखर को मेरी ओर से विनम्र श्रद्धांजली.

8 thoughts on “वह भोड़सी का संत

  1. श्री चंद्रशेखर को मेरी ओर से विनम्र श्रद्धांजली.
    ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे.

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  2. पूर्व प्रधानमंत्री को मेरा भी आदरसहित श्रद्धांजलि…।

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  3. युवा तुर्क के रूप में जाने जाने वाले चंद्रशेखरजी को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।

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  4. साफगोई बरतने की जो हिम्‍मत चन्‍द्रशेखरजी में थी वह उन्‍हें सबसे अलग करती थी । वे केवल साफगोई बरत कर नहीं रह जाते थे, उसे अपने आचरण में भी उतारते थे । उनकी कथनी और करनी में अन्‍तर नहीं होता था । यह अलग बात थी कि वे विसंगतियों और विरोधाभासों के साथ दोस्‍ती बनाए रखने का विकट काम भी करते थे । ‘केर बेर को संग’ को निभाने की वैसी अद्भुत निपुणता अब तो केवल उनके उल्‍लेख के साथ ही रह गई है ।

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  5. चंद्रशेखर की राजनीति और व्यक्तित्व दोनो मे भारत के गाँवों की सोंधी मिटटी की महक आसानी से महसूस की जाती थी । चंद्रशेखर का व्यक्तित्व कांग्रेसी राजनीति के पतन और जे पी आन्दोलन के उत्कर्ष काल मे और निखरा। तीन दशक तक वो समाज के निचले और समाजवाद के मुखर प्रवक्ता के रुप मे जाने जाते रहे। कांग्रेसी नीतियों का विरोध उन्होने कांग्रेस मे रहकर उस समय किया , जब इंदिरा गाँधी देश ही नही विश्व की सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री मानी जाती थीं। लोकतांत्रिक संस्थाओं , मूल्यों और नीतियों मे उनकी गहरी आस्था थी , धर्म निरपेक्षता के वह सच्चे पैरोकार थे । उनका जाना उस पीढ़ी की अन्तिम कड़ी का जाना है , जो राजनीति को सिर्फ नीति ही नही बल्कि मूल्य भी मानते थे। युवा तुर्क को मैं अपनी ह्रदय की गहराई और सम्पूर्ण संवेदना के साथ श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।
    प्रदीप सिंह

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  6. इसे ……””समाज के निचले और समाजवाद……””
    ऐसे पढ़ें … “समाज के निचले वर्गों और समाजवाद ….”

    प्रदीप सिंह

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  7. जेपी के बाद चंद्रशेखरजी भारत के राजनीति में भोजपुरिया संस्कृति के तरफ से देहल सबसे बड़हन उपहार रहन… बलिया के ई वीर के चल गइला से देश के नोकसान त बड़ले बा बाकी भोजपुरिया समाज खातिर ई व्यक्तिगत क्षति बा।

    गंगा मइया उनकर आत्मा के शांति देस।

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