प्रधानमंत्री का रूट

सुरक्षा का भय लोकतंत्र का कोढ़ है. और उस कोढ़ में खाज है प्रधानमंत्री की सुरक्षा का आडम्बर. विदेशी नकल और गलत ट्रेनिंग से खड़ा किया गया एसपीजी का तंत्र ऊपर से जितना मुस्तैद दिखता है व्यावहारिकता में वह उतना ही अव्यावहारिक और नुकसानदेह है. एसपीजी एक्ट बना था श्रीमती इंदिरा गांधी के मरने के बाद. श्रीमती इंदिरा गांधी के बेटे और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 1988 में एसपीजी (स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप) बनाया था. बाद में संसद में बाकायदा एक्ट पारित कर प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए अधिकृत एजंसी के रूप में मान्यता दे दी गयी थी. एसपीजी को चाक-चौबंद रखने के लिए मित्रों की सलाह पर पहली बैच की ट्रेनिंग आदि भी इटालियन सुरक्षा विशेषज्ञों की देख-रेख में हुई थी. आवश्यक उपकरण और बख्तरबंद गाड़ियों के लिए भी इटालियन कंपननियों की मदद ली गयी थी.

बहरहाल एसपीजी एक्ट में यह प्रावधान था कि यह केवल प्रधानमंत्री और उनके परिवार की सुरक्षा करेगा. लेकिन 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद इस एक्ट में संशोधन कर पूर्व प्रधानमंत्रियों और 10 जनपथ के निवासियों को भी एसपीजी एक्ट के दायरे में शामिल कर लिया गया. अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानंत्री थे तो इस बात पर काफी हंगामा मचा था कि ढेर सारे पूर्व प्रधानमंत्रियों को जो सुरक्षा का तामझाम मिला हुआ है उसे समाप्त किया जाए क्योंकि इससे देश का राजस्व जाया होता है. (1997-98 के बजट में 75.59 करोड़ रुपये का प्रावधान एसपीजी के लिए किया गया था) एक बार फिर एसपीजी एक्ट में संशोधन हुआ और पूर्व प्रधानमंत्रियों की सुरक्षा अवधि 10 साल के लिए निश्चित कर दी गयी. 10 जनपथ को स्थाईतौर पर एसपीजी के दायरे में रखने पर कोई पुनर्विचार नहीं किया गया. मानों प्रधानमंत्री और 10 जनपथ के निवासी दोनों का होना देश के लिए समान रूप से जरूरी है. प्रधानमंत्री और 10 जनपथ की सुरक्षा में सिर्फ एक फर्क था कि 10 जनपथ के निवासियों के लिए रूट नहीं लगता था. केन्द्र में कांग्रेस की सरकार होने के कारण फिलहाल व्यावहारिक रूप से इस फर्क को खत्म कर दिया गया है.

एसपीजी एक त्रिस्तरीय सुरक्षा घेरा होता है. जिसके सबसे बाहरी घेरे में डंडा फटकारते दिल्ली पुलिस के जवान होते हैं. प्रधानमंत्री देश के दूसरे किसी हिस्से में होते हैं तो यह डंडा फटकारने का काम वहां की स्थानीय पुलिस को सौंप दिया जाता है. प्रधानमंत्री के पूरे सड़क मार्ग पर ये पुलिसवाले सीने पर कागज का बिल्ला लगाये डंडा फटकारते खड़े रहते हैं और सुरक्षा का पहला घेरा मजबूत करते हैं. इसके बाद प्रधानमंत्री के सौ मीटर के दायरे में एक दूसरा घेरा होता है जिसमें खुफिया विभाग के अधिकारी और दिल्ली पुलिस के कमाण्डो रहते हैं. इनको आप पहचान नहीं सकते क्योंकि इनका कोई ड्रेसकोड नहीं होता. उसके बाद प्रधानमंत्री के आस-पास एसपीजी के सफारी-कोट धारी जवान होते हैं जो सुरक्षा कमाण्डो कम आईटी प्रोफेशनल ज्यादा लगते हैं. (एसपीजी में अभी कुल 2500 कमाण्डों हैं जो एसपीजी सुरक्षा प्राप्त व्यक्तियों की सुरक्षा व्यवस्था का काम देखते हैं) प्रधानमंत्री के सबसे करीब रहने वाले चार कमाण्डो लगातार एसपीजी मुख्यालय के संपर्क में रहते हैं और क्षण-प्रतिक्षण की खबर लेते-देते रहते हैं. कहने की जरूरत नहीं है कि एसपीजी मुख्यालय दिल्ली में प्रधानमंत्री निवास के ठीक बगल में है, और आप वहां से निकल जाएंगे और आपको अंदाज भी नहीं लगेगा कि यहीं से प्रधानमंत्री की सारी सुरक्षा-व्यवस्था का संचालन होता है.

यह सब पढ़-सुनकर हमें फंतासी कहानी का आनंद भले ही आये लेकिन इस सुरक्षा तामझाम का कोई मतलब नहीं है. इससे जितनी प्रधानमंत्री की सुरक्षा होती है उससे ज्यादा आम आदमी को तकलीफ होती है. मान लीजिए अगर किसी कार्यक्रम में प्रधानमंत्री आनेवाले हैं तो उस कार्यक्रम का सत्यानाश होने से कोई नहीं रोक सकता. एसपीजी तीन दिन पहले से ट्रैकिंग शुरू कर देती है और वहां की सारी व्यवस्था अपने हाथ में ले लेती है. इस सारी प्रकृया में आयोजक को भी दरकिनार कर दिया जाता है. कई बार ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री भले ही देश का कार्यकारी अधिकारी हो लेकिन वह खुद एसपीजी का गुलाम है. इसका सबसे बढ़िया उदाहरण पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह हैं. जैसे ही अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने यह फैसला किया कि पूर्व प्रधानमंत्री को 10 साल से अधिक एसपीजी सुरक्षा के घेरे में नहीं रहेगा उन्होंने तुरंत सरकार को खत लिखा कि अगर मेरी एसपीजी सुरक्षा तत्काल हटा ली जाए तो मेरे ऊपर बड़ी मेहरबानी होगी. उन्होंने कहा था एसपीजी हटने के बाद मैं खुली हवा में सांस ले सकता हूं.

सच्चाई यही है. अगर आप कभी प्रधानमंत्री के रूट में आये हों तो आपको इसका अंदाज लग चुका होगा. आप प्रधानमंत्री के रूट में आ जाएं यह तो संभव ही नहीं है क्योंकि डंडेवाला कमाण्डो आपसे निपटने के लिए तैयार खड़ा रहता है, वह आपको उधर देखने भी नहीं देता. अगर आप चाहते हैं कि दूर से सही प्रधानमंत्री को एक बार देख लूं तो वह आपका मुंह दूसरी ओर घुमा देता है. अगर आप ऐसा नहीं करते तो वह डंडाधारी कमाण्डो आपके साथ वही व्यवहार करेगा जो किसी अलकायदा आतंकवादी के साथ अमीरीकी कमाण्डो अबू-गरेब जेल में करते हैं.

यह सुरक्षा का ढोंग-ढकोसला है. सुरक्षातंत्र की नजर में प्रधानमंत्री के रूट में आनेवाला हर आदमी संभावित आतंकवादी है. इसलिए वह उनके साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं. अगर कभी खुदा-न-खास्ता कोई व्यक्ति उस रूट में आ जाता है तो मीडियावाले खबर बना देते हैं, बिना यह सोचे कि इस खबर का क्या असर होगा. सुरक्षा एजंसियां तब और सतर्क हो जाती हैं जब इस तरह की कोई खबर हाईलाईट होती है. जिसका सबसे ज्यादा नुकसान आम-आदमी को होता है. आज सुरक्षा घेरा का ही कमाल है कि प्रधानमंत्री एक जीती-जागती फंतासी हो गया है. आम आदमी के लिए उसकी गाड़ियों का काफिला, सुरक्षा घेरा उसके ओहदे का प्रतीक नजर आता है. और दुष्परिणाम यह हुआ है कि छुटभैये नेता और गुण्डे भी गाड़ियों के काफिले और गुण्डानुमा सफारीधारी सुरक्षाकर्मी लेकर चलते हैं.

आज के परिवेश में जब आतंकवाद अपने अस्तित्व से ज्यादा प्रचारित है, तब प्रधानमंत्री की सुरक्षा की कोई ऐसी विधि विकसित करनी पड़ेगी जो जितनी अदृश्य हो उतनी ही कारगर भी. क्या एसपीजी एक्ट में एक और संशोधन की बात हो सकती है?

3 thoughts on “प्रधानमंत्री का रूट

  1. छोडिये. अब और परिवर्तन की बात मत करिये. वरना यह सारे मंत्रियों को दे दी जाएगी.

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  2. अच्छा जानकारीयुक्त लेख लगा. एस पी जी के विषय में इतनी विस्तृत जानकारी नहीं थे. बदलाव का विचार भी उचित लगता है.

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