जंह-जहं पांव पड़े संतन के

संत के लिए संपत्ति क्या है? राम नाम. जी नहीं, आज के संत उसी संपत्ति को संपत्ति मानते हैं जिसे हम-आप मानते हैं. लखनऊ में संत आशाराम आश्रम ने जिस तरह से जमीन पर कब्जा किया है, उससे तो यही लगता है. सरकार और राज्य प्रशासन आश्रम को पूरी तरह से अवैध मानते हैं क्योंकि यह सरकारी जमीन हड़पकर बना है. लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं कर सके, क्योंकि यह आश्रम संत आशाराम का है, और संत आशाराम की किसी संपत्ति पर हाथ डालने से पहले सौ बार सोचना पड़ता है. 2002 में ही लखनऊ के तत्कालीन जिलाधिकारी नवनीत सहगल ने जांच की थी और उन्होंने माना था कि यह आश्रम अवैध भूमि कब्जा करके बना है. 24 जून 2002 को अपने आदेश में जिलाधिकारी ने कहा कि यह आश्रम अवैध है और इसे तत्काल हटा दिया जाए. लेकिन कार्रवाई इसलिए नहीं हुई कि मामला हाईकोर्ट पहुंच गया और उभयपक्षों को मौका देने की नीयत से हाईकोर्ट ने स्थगन आदेश दे दिया.

तब जो हालात थे उनमें कोई बदलाव नहीं आया, उल्टे आस-पास की जमीनों को भी अवैध तरीके से कब्जा करके आश्रम का विस्तार जारी है. जहां आश्रम है उसका सरकारी रिकार्ड यानि खसरा नंबर 150 है. अब आश्रम के लोग (जो कि वास्तव में भू-माफिया हैं) आस-पास की जमीन खरीद रहें हैं, जो नहीं बेचने को राजी उसपर कब्जा कर रहे हैं. पिछले साल 64 लोगों से एक ही रजिस्ट्री पर जमीन खरीदी गयी. ये 64 लोग दलित और पिछड़े वर्ग के हैं. लेकिन रजिस्ट्री में यह बात छिपा ली गयी. क्योंकि ऐसा कहने पर कई तरह की कानूनी अड़चन पैदा हो सकती थी. मसलन इस तरह की किसी-खरीद बिक्री में जिलाधिकारी की अनुमति होना जरूरी है.

बात तब खुली जब कागजात दाखिल-खारिज के लिए तहसीलदार के पास पहुंचे. अपनी शंका से तहसीलदार ने उपजिलाधिकारी को अवगत करा दिया. उपजिलाधिकारी महोदय ने ट्रस्ट को कहा कि वे कागजात दिखाएं कि इस खरीद के लिए जिलाधिकारी का आदेश ले लिया गया था. ट्रस्ट के पास ऐसा कोई कागज नहीं था. अतः कानूनन यह खरीद अवैध थी. फिलहाल ट्रस्ट ने सरकार के किसी संभावित कार्रवाई से बचने के लिए उपमण्डलायुक्त के न्यायालय में अपील दायर कर रखी है.

संत आशाराम ट्रस्ट पर दिल्ली के रिज इलाके में जमीन कब्जा करने का आरोप है. इसी तरह पटना और गुजरात के आश्रमों पर भी आरोप है कि उन्होंने जमीन पर अवैध कब्जा कर रखा है. असल में आज संत महात्मा के नाम पर बनने वाले ट्रस्ट भी जमीन के कारोबारी की तरह व्यवहार करते हैं और संत का उपयोग ब्रांडनेम की तरह करते हैं. हरिद्वार के भूपतवाला में संत आशाराम अपार्टमेन्ट बना है जहां फ्लैट की कीमत 15 लाख से शुरू होती है. धर्म का यह कर्म समझ में नहीं आ रहा.
साथ में, रुपेश कुमार (लखनऊ)

11 thoughts on “जंह-जहं पांव पड़े संतन के

  1. सही बात है —जहा जहा पाव पडे सन्तन के
    तह तह बन्टाधार ।

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  2. सत्य वचन . अस्सी परसेंट संतई आजकल ऐसे ही चल रही है.

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  3. अच्छी जानकारी है लेकिन क्या कभी सरकार ये अवैध कब्जा हटा पाएगी? गरीबों की झुग्गियां हटाते तो इनको एक मिनट नहीं लगता।

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  4. भाई इन्हे सन्त बनाता कोन हे ???जहा भी देखो इन पखन्डियो की बक्वास सुनने लाखो लोगो की भीड जमा होती हे कयो???

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  5. @ सुजाता को लाईन पूरी करने के लिए धन्यवाद.
    @ गिरीन्द्र भैया मैं मजदूर हूं, साहब नहीं.
    @समीर जीः सही है
    @हे मेरे इष्टदेव सन्यासी बनने चले हैं क्या
    @सत्येन्द्र भैया ने ब्लाग पर क्या लिखा ब्लूलाईन की शामत आ गयी.
    @ राज बाबू, जनता को ढांढस चाहिए, अब लोग ढकोसला करें तो जनता का क्या दोष?
    @ और आनेवालों आपके लिए, धन्यवाद.

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  6. बढिया स्टोरी लाए हैं गुरू. चीजें सामने लाना हम लोगों का काम है. सो वह पूरा करते रहना चाहिए. साधुवाद

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  7. इष्ट देव संत और संजय तिवारी चेला. इष्टायनी आश्रम कब खुल रहा है. बहुत सी जमीन दाबने को पुकार रही है! 🙂

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  8. Bravo Mr Tiwari, please do more
    campaign to aware people.

    These stupid so called sant are
    pure business people they make
    money by purely to fool people.
    they have nothing to do with god
    and human kind.

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