मठी हिन्दीवादियों का आठवां सम्मेलन शुरू

मठी हिन्दीवादियों का आठवां सम्मेलन न्यूयार्क में शुरू हो गया है. सम्मेलन का उद्घाटन भारत के विदेश राज्यमंत्री आनंद शर्मा ने किया और सम्मेलन के मुख्य अतिथि थे संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून. न्यूयार्क के संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में यह आयोजन किया जा रहा है जो 15 जुलाई तक चलेगा. पूरे आयोजन पर अमरीका और अमरीकावाद हावी दिख रहा है. विदेश मंत्री और प्रधानमंत्री दोनों ही हिन्दी के सम्मेलन से ज्यादा इस बात पर उत्साहित थे कि सम्मेलन अमेरिका के न्यूयार्क शहर में हो रहा है.

सम्मेलन में भारत सहित दुनिया के कई देशों के हिन्दी के विद्वान इकट्ठा हुए हैं. सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए भारत के विदेश मंत्री ने कहा कि “श्रीमती इंदिरा गांधी ने 32 साल पहले नागपुर में हुए पहले विश्व हिन्दी सम्मेलन में हिन्दी के लिए जो सपना देखा था वह आज पूरा हो रहा है. आज न्यूयार्क के इस “यूएन प्रांगण” में हिन्दी प्रेमियों को देखकर लगता है उनका सपना सच हो रहा है.” कुछ इसी तरह की बात प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कहा. अपने विडियो संदेश में उन्होंने कहा “1975 से जो यात्रा शुरू हुई थी आज वह यूएन के इस परिसर तक पहुंच गयी है. यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज अमेरिका दुनिया के विकसित देशों में अग्रणी है. और अमरीकी भारतीयों ने हर क्षेत्र में नाम कमाया है. आनेवाले दिनों में अमरीका और भारत के रिश्ते और प्रगाढ़ होंगे.” यह प्रधानमंत्री का आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के संदेश की शुरूआत है. मनमोहन सिंह इसी बात से खुश दिखे कि अमरीकी स्कूलों के सिलेबस में हिन्दी को शामिल कर लिया गया है. लेकिन उस अमेरिका का क्या रूख है? उसने वीजा तक नहीं दिया कि लोग सम्मेलन में न्यूयार्क पहुंच सकें. आखिर में वे कहते हैं कि ” उनकी सरकार हिन्दी को यूएन की अधिकारिक भाषा बनाने की दिशा में काम कर रही है.”

इस अवसर पर किसी ने भी अटल बिहारी वाजपेयी का नाम नहीं लिया जिनके विदेश मंत्री के रूप में दिये गये पहले हिन्दी भाषण के बाद यूएन को पता चला कि अपने यहां हिन्दी के अनुवादक भी रखने चाहिए क्योंकि कुछ लोग इस भाषा को प्रेम करते हैं और कोई भी मंच हो वे अपनी भाषा में ही बात करना चाहते हैं. दुर्भाग्य से इंदिरा गांधी याद रहीं लेकिन अटल बिहारी किसी को याद नहीं आये. इस एका का ही परिणाम है कि बान की मून भले ही नमस्ते और आपका क्या हाल-चाल है हिन्दी में बोले हों लेकिन इस बात पर कुछ नहीं बोले कि कब तक वे संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी को अधिकारिक भाषा का दर्जा देंगे.

एक बात अच्छी हुई और वह कि इस सम्मेलन के उद्घाटन भाषणों में इंटरनेट पर हिन्दी की उपस्थिति का उल्लेख प्रधानमंत्री और विदेशमंत्री दोनों ने किया. और हिन्दी ब्लाग का भी जिक्र आया. संयोग से इसमें सरकार का कोई खास योगदान नहीं है. यह बाजार और कुछ जनूनी लोगों के जज्बे का परिणाम है कि सम्मेलन शुरू होने के एक घंटे के अंदर मैं यह रिपोर्ट लिख पा रहा हूं और उस भाषा में लिख रहा हूं जिसमें मैं अपने-आप को बेहतर तरीके से अभिव्यक्त कर सकता हूं. उन जज्बेवाले लोगों को मैं सलाम करता हूं जो भाषा का रोना रोने की बजाय भाषा में काम करते हैं और उसे विस्तार देते हैं. इसी बहाने मैं उन सभी चिट्ठाकारों को भी सलाम करता हूं जिन्होंने इंटरनेट पर हिन्दी की इतनी शसक्त उपस्थिति बना दी कि आज विश्व हिन्दी सम्मेलन में इनका जिक्र किया जा रहा है. इन मठी हिन्दीवादियों को मैं खास महत्व न कल देता था न आज देता हूं और न आगे दूंगा, क्योंकि ये लोग हिन्दी को दिवस और सम्मेलनों का विषय मानते हैं.

4 thoughts on “मठी हिन्दीवादियों का आठवां सम्मेलन शुरू

  1. बहुत सही!!

    आपकी इस बात का तो हम पूरा समर्थन करते हैं कि “इन मठी हिन्दीवादियों को मैं खास महत्व न कल देता था न आज देता हूं और न आगे दूंगा क्योंकि ये लोग हिन्दी को दिवस और सम्मेलनों का विषय मानते हैं.”

    शुक्रिया!!

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  2. आपके विचारों से पूरी पूरी सहमति है ! धन्यवाद ताजा समाचारों को पहुंचाने के लिए !वैसे यहां जितने भी जुगाडकर पहुंचे लोग हैं उनका हिंदी के विकास से बहुत कम लेना देना है यह तो एक समारोह भर है या फिर विदेश भ्रमण का एक मुफ्त अवसर

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  3. किसी भी विचार/उत्पाद के प्रचार-प्रसार के बहुत से अंग/आयाम होते हैं। हिन्दी का विश्व सम्मेलन इसी रूप में देखा जाना चाहिये। यह कहना कि नेट पर हिन्दी के छा जाने भर से हिन्दी का भला होगा, ये भी तो पूरी तरह ठीक नहीं है। किसी के सारे अंग बहुत सबल हों किन्तु केवल कोई एक अंग ही निर्बल/खराब/अविकसित हो, उसकी क्या दशा होती है? इसी तरह हिन्दी को राष्ट्रसंघ में, भारत में, अमेरिकी स्कूलों में, ब्रिटिश स्कूलों में, सब जगह अपनी जगह बनाए की कोशिश करनी चाहिये।

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