भूमंडलीकरण और पत्रकारिता

दिल्ली के श्रीराम कला केन्द्र में कल 16 जुलाई को एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसका विषय था – भूमंडलीकरण और पत्रकारिता. इस विषय पर बोलनेवाले मुख्य वक्ता थे – जनसत्ता के संपादकीय सलाहकार प्रभाष जोशी, हिन्दी के आलोचक नामवर सिंह, केन्द्र सरकार में मंत्री आस्कर फर्नांडीज, पत्रकार सुभाष गाताडे और पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा उपस्थित थे.
सुभाष गाताडे ने कहा कि भूमंडलीकरण के इस दौर में केवल प्रस्तुती नहीं बल्कि सामग्री के स्तर पर भी बदलाव आ रहा है. आज समाचार एक उत्पाद है और उसे बेचने की होड़ मची हुई है. इसलिए जो बिकता है वही दिखता है. देश के सबसे प्रतिष्ठित अखबारों में भी अब एडिट स्पेश की बोली लगाई जाती है. उन्होंने एक अहम मुद्दे की ओर संकेत किया कि अखबारों में स्थानीयकरण की होड़ इतनी बढ गयी है कि एक जिले की खबर दूसरे जिले को नहीं मिलती. यह कितना अच्छा और कितना बुरा है इसका आकलन होना चाहिए.
आनंद स्वरूप वर्मा का कहना था कि 1990 प्रस्तुत विजन स्टेटमेंट के कारण आज स्थिति यह हो गयी है सेवाओं को निजी हाथों में सौंपा जा रहा है और सरकारें सेवा प्रदाताओं की सेवाकार के रूप में काम कर रही हैं. अब न संसद का कोई मतलब रह गया है. न प्रशासन का और न ही कल्याणकारी राज्य का. आजकल इसके खिलाफ जो आवाज उठाता है उसको बड़ी आसानी से आतंकवादी कह दिया जाता है. उनका कहना था कि नक्सलवाद के खिलाफ अचानक सरकारी मुहिम में आयी तेजी का एक कारण यह भी है कि वह उनको आतंकवादी और उपद्रवी साबित करना चाहती है जो नये सिरे से स्थापित कंपनीराज से लड़ रहे हैं. उन्होंने बताया कि सितंबर 2004 से अक्टूबर 2005 के बीच योजना आयोग और व्यापार जगत के कई नामी-गिरामी लोगों की तीन दौर की बैठकें हुईं. इसमें जिस प्रारूप पर विचार किया गया वह था कि ग्रामीण भारत को कैसे डिकोड करें? लेकिन कहीं इसकी कोई खबर नहीं आई.
प्रभाष जोशी ने कहा कि यह समय प्रिंट के लिए चुनौतीपूर्ण है. आज खबरें लाईव हो रही हैं और आनेवाले समय में खबरों का प्रसार इतना त्वरित हो जाएगा कि अखबार पढ़ने के लिए लोग इंतजार नहीं करेंगे. ऐसे में विचारपरक पत्रकारिता होगी तभी प्रिंट बचेगा और लोगों के बीच अपनी प्रासंगिकता बनाये रख सकेगा. लेकिन संकट यह है कि ऐसी पत्रिकाओं को बाजार सहयोग नहीं करता. वे भला क्यों चाहेंगे कि उनके खिलाफ बोलनेवाले पैदा हों. नामवर सिंह ने भी कुछ इसी तरह की चिंता व्यक्त की. एक अच्छी बात यह हुई कि नामवर सिंह ने हिन्दी चिट्ठों की तारीफ की और कहा कि इसमें बहुत संभावना है.
इस गोष्ठी का आयोजन समकाल ने किया था. समकाल दिल्ली से निकलनेवाली पाक्षिक पत्रिका है और इसके जुलाई द्वितीय अंक में हिन्दी चिट्ठाकारों पर एक विस्तृत रिपोर्ट दी गयी है. पहली बार किसी पत्रिका ने हिन्दी ब्लाग्स पर इस तरह स्टोरी की है. निश्चित ही चिट्ठाजगत को इसका लाभ होगा.
(फोटो- मंच पर दाये से श्री ऑस्कर फर्नांडीज, श्री प्रभाष जोशी और श्री नामवर सिंह.)

3 thoughts on “भूमंडलीकरण और पत्रकारिता

  1. प्रभाष जी से लेकर वर्मा जी और नामवर जी की चिंताएं वाजिब हैं। लेकिन समय तो अपनी रफ्तार से चलता है। हमें इस पहलू पर भी गौर करना चाहिए कि इधर अखबार से लेकर टीवी की पत्रकारिता ने हमारे समाज के लोकतंत्रीकरण का भी काम किया है। यहां तक परिवारों या प्रेम से जुड़ी सनसनीखेज रिपोर्ट भी इन संस्थाओं के लोकतंत्रीकरण का काम कर रही है। पुरातन बुद्धिजीवियों शायद एक खास चश्मे से यथार्थ को देखने के लती हो गए हैं।

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  2. समकाल के संबंध में जानकारी प्रदान करने के लिए धन्‍यवाद ।

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