परमाणु समझौताः बुश क्यों खुश

(18 जुलाई 2005 को भारत-अमरीका परमाणु समझौता हुआ था. इस समझौते के 2 साल पूरा होने पर विशेष रिपोर्ट)

सरदार मनमोहन सिंह अपने अमरीका प्रवास से भारत लौट रहे थे. हवाई जहाज में पत्रकारों ने उनसे पूछा कि परमाणु समझौते पर आपका क्या कहना है? उन्होंने कहा हमने जिस संयुक्त घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किया है उसपर हर राष्ट्रभक्त देशवासी को नाज होगा. अभी वे भारत पहुंचे भी नहीं थे कि अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बयान जारी कर कह दिया कि इस संयुक्त घोषणापत्र से लंबी अवधि में भारत की सुरक्षा और संप्रभुता खतरे में पड़ सकती है. देशभक्तों की सूची में एक नाम कम हो गया. थोड़े दिनों बाद एक और पूर्वप्रधानमंत्री वीपी सिंह ने इस समझौते का विरोध करते हुए प्रधानमंत्री को पत्र लिखा और कहा कि जब तक पूरी जानकारी देश के सामने नहीं आ जाती मैं इस समझौते का विरोध करता रहूंगा. देशभक्तों की सूची से दूसरा नाम भी कट गया. इसके बाद कई परमाणु वैज्ञानिक, संस्थाओं से जुड़े कई लोग, राजनीतिज्ञ और कुछ रक्षाकर्मी भी इस समझौते का विरोध कर देशभक्तों की सूची से अपना नाम अलग करवा चुके हैं. जिस एक नाम का मैं खासतौर से उल्लेख करना चाहूंगा वह है डॉ ए एन प्रसाद.

डॉ प्रसाद भी इस समझौते का विरोध कर देशभक्तों की सूची से बाहर हो चुके हैं लेकिन उन्होंने विरोध करना जारी रखा है. दो दिन पहले दिल्ली आये थे. एक बातचीत में उन्होंने कहा कि “इस समझौते का परिणाम यह होगा कि भारत का परमाणु कार्यक्रम जो अभी तक राष्ट्रीय था अब बहुराष्ट्रीय हो गया है.” डॉ0 प्रसाद देश के जानेमाने परमाणु वैज्ञानिक हैं. भाभा एटामिक रिसर्च सेंटर(barc) के डायरेक्टर रह चुके हैं और आजकल संयुक्त राष्ट्र से जुड़े हुए हैं. उन्होंने 1957 में बार्क ज्वाईन किया था. तब देश का परमाणु कार्यक्रम ठीक से शुरू भी नहीं हुआ था. जब उन्होंने सरकारी पद छोड़ा तब तक भारत तीन परमाणु विस्फोट कर चुका था. केवल सैन्य प्रयोगों के लिए ही नहीं नागरिक उपयोग के लिए परमाणु तकनीकि का उपयोग सफलता पूर्वक किया जाने लगा था. डाक्टर प्रसाद बताते हैं कि 1959 में पहला परमाणु उर्जा कार्यक्रम शुरू किया गया था और मात्र छह सालों के अंदर हमने पहला रियेक्टर चालू कर दिया था. अमरीका में भी बिजली उत्पादन के लिए पहला रियेक्टर 1971 में बना यानि 6 साल बाद.

तो क्या अमरीका सचमुच परमाणु मुद्दे पर भारत की नैया पार लगाना चाहता है या फिर भारत की नैया मझधार में डुबाना चाहता है. सेंटर फॉर पालिसी रिसर्च (सीपीआर) के फेलो ब्रह्म चेलानी कहते हैं “यह सही है कि रक्षा उत्पादन के मामले में हमारा कोई खास स्थान नहीं है. गन से लेकर लड़ाकू विमान तक हम सबकुछ बाहर से खरीदते हैं लेकिन परमाणु तकनीकि के मामले में हम दुनिया के सर्वोपरि देशों में एक हैं.” अमरीका को यह कतई बर्दाश्त नहीं है. पोखरण के पहले परीक्षण के बाद जो प्रतिबंध लगे उसका भारत पर कोई खास असर नहीं हुआ. नब्बे के दशक की शुरूआत से जो तैयारियां चल रही थीं उसका परिणाम यह हुआ कि वाजपेयी सरकार ने एक के बाद दूसरा लगातार दो परमाणु परीक्षण किये और दुनिया के परमाणु क्लब में शामिल हो गया. (अभी यह बहस छोड़ देते हैं कि यह कितना मानवीय या अमानवीय है.) क्या यहां तक का सफर भारत ने उड़कर तय किया था? डाक्टर प्रसाद कहते हैं “अमरीका नहीं चाहता कि भारत और मजबूत हो. उसके हर प्रतिबंध के बाद भी हमारे परमाणु कार्यक्रमों में कोई रूकावट नहीं आयी. अमरीका जो काम प्रतिबंध लगाकर नहीं कर सका अब वह इस समझौते से हो जाएगा.” यह आम आदमी नहीं बोल रहा है. वे बार्क के निदेशक रहे यही नहीं वे परमाणु ईंधन रिप्रोसेसिंग क्षेत्र में सबसे प्रतिष्ठित नाम हैं. फ्रांस ने जब तय किया कि वह परमाणु उर्जा बनायेगा तो उसकी परमाणु भट्टियों की डिजाईन में खामियों को दूर करने के लिए डॉ प्रसाद को वहां बुलाया गया था.

जिस परमाणु उर्जा की बात की जा रही है उसमें अमरीका की प्रगति यह है कि 28 सालों से उसने कोई नया रियेक्टर नहीं बनाया है. जबकि भारत में पहले से 15 परमाणु उर्जा संयत्र काम कर रहे हैं. इस समझौते का मुख्य बिन्दु यह है कि भारत अपने परमाणु बिजलीघरों को यूरेनियम पर शिफ्ट कर दे. भारत की दक्षता थोरियम आधारित परमाणु बिजलीघर बनाने में है. अगर हम यूरेनियम पर शिफ्ट करते हैं तो दो सवाल खड़े होते हैं. पहला क्या हमारे पास इतना यूरेनियम है कि हम 2020 तक 20 हजार मेगावाट बिजली पैदा कर सकें और दूसरा सवाल है कि अगर नहीं तो फिर अपने संसाधनों पर निर्भरता छोड़कर यूरेनियम पर क्यों सिफ्ट करें?

4 thoughts on “परमाणु समझौताः बुश क्यों खुश

  1. आपकी बातें विचारोत्‍तेजक हैं ।
    राजनेताओं की बातें राजनीति केन्द्रित होती हैं । उनकी मानें तो सारे के सारे नेता राष्‍ट्र विरोधी हैं । लेकिन जब कोई वैज्ञानिक, वह भी इतना जवाबदार और जानकार वैज्ञानिक यह सब कहता है तो विचार आता है ।
    क्‍या वाकई में हमारे नेता राष्‍ट्र द्रोही हो गए हैं ?

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  2. बहुत सही और विस्तार दें. मजा आ रहा पढ़ने में खुली किताब.

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  3. बंधु जरा अब मेरे ब्लाग पर तो आएं निराशा हाथ नहीं लगेगी। फिर भी सुधार की काफी गुंजाइश है। सुधरने और सुधारने का काम तो चलता रहेगा।
    आपका लेखन में काफी मजा आया। लिखें और खूब लिखें।

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