खबर क्या है?

टीवी हमारे मन पर इतना क्यों हावी है? आखिर टीवीवाले क्या दिखाएं कि हम कहेंगे कि टीवी चैनल अच्छा काम कर रहे हैं? जार्ज फर्नांडीज के एक करीबी ने एक दिन कहा कि जार्ज सर न्यूज चैनल नहीं देखते. मुझे बहुत आश्चर्य हुआ. एनडीए के संयोजक, राष्ट्रीय नेता और न्यूज चैनल नहीं देखते. करीब डेढ़ साल हो गये इस बात को. अब मुझे लगता है कि जार्ज फर्नांडीज समझदार राजनेता हैं. हम ही मूर्ख थे जो टीवी का मोह पाले हुए थे.

हमें यह स्वीकार करना होगा कि खबर की शक्ल-सूरत बिगड़ गयी है. हर न्यूज चैनल अपनी तरह से न्यूज की परिभाषा गढने में लगा हुआ है. आपको वह परिभाषा पसंद नहीं तो न्यूज चैनलवाले का क्या दोष? बात सीधी है. हम परिभाषा नहीं बदल सकते. जो न्यूज चैनल जिसे खबर समझता है उसे खबर की तरह चलाता है. हमें पसंद न हो तो हम रिमोट से अगले चैनल पर चले जाएं. कोई भी पसंद न हो तो टीवी बंद कर दें. मुझे आजतक समझ में नहीं आया कि टीवीवालों को सुधारने का नैतिक डंडा हमने क्यों उठा रखा है यह जानते हुए कि इन बहसों का कोई मतलब नहीं है. जो टीवी में काम कर रहे हैं वे बेहतर जानते हैं कि कार्यदबाव, टीआरपी और तकनीकि की जटिलता के कारण जिंदगी बहुत दुरूह है. ऐसे माहौल में आप टीवी से क्या उम्मीद कर सकते हैं?

वैसे एक बात आपको बता देता हूं, आनेवाले समय में समाचार चैनल प्रिंट और इंटरनेट के बीच पिचक जाएगा. इंटरनेट पर थोड़ी भाषाई पकड़ और मजबूत होने दीजिए, फिर देखिए क्या होता है. एक स्पेश खाली है. टीवीवाले उसे नहीं भर सके. क्या इंटरनेट के लोग उसे भर पायेंगे? अगर इंटरनेट उसे भरने में कामयाब रहा तो टीवी अपने आप दुर्बल हो जाएगा.

अपना अनुभव बताता हूं. विभिन्न आंदोलनों से जुड़ा हूं. आज से दो-तीन साल पहले जब भी कोई कार्यक्रम करना होता तो टीवीवालों की लिस्ट पर पहले सूचना भेजते, उन्हें फोन करते. और कार्यक्रम में एकाध चैनल का चोगा दिख जाता तो लगता कार्यक्रम सफल हो गया. लेकिन धीरे-धीरे यह पता चल गया कि ये चैनलवाले शूट करके ले जाते हैं लेकिन चलता-वलता कुछ नहीं है. इधर यह परिवर्तन मैं साफ देख रहा हूं कि अब टीवीवालों को बुलाने की इच्छा ही नहीं होती. मानों हमारे अवचेतन मन में यह बात बैठ गयी है कि इनको बुलाने का कोई फायदा नहीं.

असल में टीवी का सबसे बढ़िया उपयोग राखी सावंत, शिल्पा शेट्टी जैसे नचनियों ने खुद को ब्रांड के रूप में स्थापित करने के लिए किया है. बाकी उपयोग पूंजीवादी ताकत अपनी क्षमता बढ़ाने में कर रही है. इस माध्यम में आम आदमी के लिए कोई जगह नहीं है. ग्लैमर के मारे लड़के लड़कियां टीवी का चोंगा पकड़े पर्दे पर दिखना चाहते हैं. उनके लिए यही पत्रकारिता है. शेष जो थोड़े पुराने हो गये हैं वे नौकरी कर रहे हैं. उनके लिए अब इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि पत्रकारिता हो रही है या नहीं, उनको इस बात की चिंता रहती है कि कितने नये चैनल आ रहे हैं और कहां कितना अधिक पैसा मिल सकता है. यह तो हम बाहरवाले हैं जो टीवी को सर पर लादे टहल रहे हैं और चाहते हैं कि बुद्धू बक्सा हमारे लिए पत्रकारिता करे.

4 thoughts on “खबर क्या है?

  1. इन सबसे मन हटायें, हमारा ब्लोग पढ़ें. मन लगा रहेगा. 🙂

    मुद्दा सही उठाये हैं.

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  2. सही चिंता है. इस इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर में, प्राथमिक शिक्षा के अभाव और गरीबी में ढेर हो रहे समाज में टीवी बदलने से रही. राखी, शिल्‍पा और क्रिकेट से अलग उसके पास बताने व दिखाने को और कुछ नहीं रहेगा. उम्‍मीद व्‍यर्थ है. अच्‍छा तरीका यही है कि चोरी-चोरी कभी बीबीसी देख लें, वर्ना टीवी बंद रखें, और अख़बार में बीटवीन द लाइन्‍स पढ़ें.

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  3. आज मीडिया के रिपोर्टर खुद को ऐसे प्रस्तुत करते है जैसे वे ही दूध के धुले बाकी बचे है, और आप ने अगर एक पर (सुभाश झा) उंगली उठाई तो सब लकड्बग्घो के झुन्ड की तरह आप को घेर लेंगे! क्योकि अब तक हिडेन कैमरा अभियान उनपर कोई नही घुमाता है!समाज के नाम पर ये सिर्फ़ टी.आर.पी.कमाते है!निठारी पर अब कोई नही बोल रहा और अब किसी बच्चे के दिल में छेद नही बचा जिसके नाम पर चन्दा मांगे,क्यों कि ये अभी टी.आर.पी. नही देंगे!
    शर्मनाक

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  4. समीर> “इन सबसे मन हटायें, हमारा ब्लोग पढ़ें. मन लगा रहेगा. 🙂 ”
    और क्या? टीवी से ब्लॉग क्या बुरा है. पर भैया जब लोग टीवी से ब्लॉग पर चले आयेंगे तो साथ में राखीबेन अपने से चली आयेंगी!

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