मीडिया का गिद्धभोज


कोई डेढ़ दशक पहले की बात है. सोमालिया में फैले अकाल को कवर करने के लिए देश-विदेश के पत्रकार वहां पहुंचे हुए थे. आदमी अन्न के अभाव में मर रहा था तो मानों गिद्धों की बन आयी थी. सोमालिया में मंडराते गिद्ध जीवित लोगों पर भी हमला बोल देते थे. एक छोटी लड़की पर एक गिद्ध बार-बार हमला कर रहा था. इसे कई फोटो पत्रकार ने देखा और वह चित्र दुनियाभर में छपा भी. लेकिन एक फोटो पत्रकार ने बजाय चित्र लेने के उस लड़की को बचाना अपनी जिम्मेदारी समझी. उसने लड़की को बचा भी लिया. उस पत्रकार को पुरस्कृत किया गया. लेकिन वह पुरस्कार उसके लिए आत्मघाती साबित हुआ. मरने के बाद उसके पास जो सुसाईड नोट मिला उस पर लिखा था- “क्या किसी की जान बचाना पुरस्कार का विषय है?”

अब सोमालिया छोड़िये. 15 साल पहले का अतीत भी छोड़िये. बनारस आईये. साल 2007. भारतीय मीडिया जगत के दो चैनलों के प्रतिनिधि. एक स्टार न्यूज का और दूसरा आईबीएन सेवेन का. इन दोनों की पत्रकारिता देखिये. 28 जुलाई को प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती बनारस जानेवाली थीं. मुख्यमंत्री के आने की भनक से प्रशासनिक अमला चौकन्ना हो गया. साफ-सफाई का दौर चल पड़ा. इस साफ-सफाई में कुछ विकलांगों की गुमटियां भी आनेवाली थीं जो 1990 में उन्हें वितरित की गयी थीं. गुमटी टूटने के डर से विकलांगों ने आंदोलन किया और धमकी दी कि अगर उनकी गुमटी हटाई गयी तो वे आत्महत्या कर लेंगे. नमो प्रकाश उपाध्याय और रवि चटर्जी के नेतृत्व में ये विकलांग डीएम से मिले भी और डीएम ने आश्वासन दिया कि उनकी गुमटियां नहीं हटाई जाएंगी. बात शायद खत्म हो जाती क्योंकि मुख्यमंत्री आयीं ही नहीं.

लेकिन आईबीएन सेवेन के विक्रांत दूबे और स्टार न्यूज के शैलेष चौरसिया ने तय किया कि आंदोलन चलना चाहिए नहीं तो खबर नहीं बनेगी. जोरदार खबर की खोज में विक्रांत दूबे ने अपने मामा नमो प्रकाश उपाध्याय को तैयार कर लिया कि वे आंदोलनरत विकलांगों से कहेंगे कि वे जहर खा लें. नमो प्रकाश उपाध्याय ने टीवीमोह में फंसकर 12 गुमटीवालों को जहर खाने के लिए तैयार कर लिया. 31 जुलाई को उन्होंने विकलांगों को सामूहिक रूप से जहर खाने के लिए तैयार कर लिया. नमो प्रकाश ने इसमें केन्द्रीय भूमिका निभाई. खबर बनी. लेकिन इस खबर से 12 लोगों के जान पर बन आयी. अब तक पांच मर चुके हैं और नमो प्रकाश उपाध्याय तथा रवि चटर्जी जेल में हैं. मजिस्ट्रेट इस बात की जांच कर रहे हैं कि टीवी चैनलवालों की क्या भूमिका है.

प्रदेश के आईजी कश्मीर सिंह ने 3 अगस्त को एक बयान जारी कर कहा कि पूर्व में भी ऐसी कोई घटना हुई है तो उसकी जांच की जाएगी. कश्मीर सिंह को जरूर जांच करवानी चाहिए. पूर्व में बनारस में ही ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं. पिछले साल घूरेलाल सोनकर ने आत्मदाह कर लिया था. उसे सभासद का टिकट नहीं मिला था और एक फोटोग्राफर तथा एक चैनल रिपोर्टर ने उसे उकसाया कि अगर तुम आत्मदाह करने की कोशिश करो तो खबर बन जाएगी और तुम्हारा दावा पक्का हो जाएगा. इसी 19 जुलाई को एक चैनल रिपोर्टर ने साली को पत्नी बनाने की एक घटना को शूट करने के लिए भीड़ जुटाई, हंगामा करवाया और समाचार लेकर चलता बना. आईबीएन7 की एक और खबर जिस पर लोगों का ध्यान गया था कि एक किशोरी ने अपने बाल मुंडवाने पर उसने अपने मां-बाप को देह का सौदागर बता दिया था. मजिस्ट्रेट के सामने मामला पहुंचा तो उसने कहा कि कुछ लोगों ने उसे कहा था कि तुम ऐसे-ऐसे बोलना.

खबर पैदा करने की यह ललक टीआपी के गर्भ तक ले जाती है जहां से ग्लैमर और पैसा पैदा होता है. पत्रकारिता पढ़ानेवाले एक संस्थान में 30 लोगों से बातचीत के बाद 27 लोगों को नहीं मालूम कि वे पत्रकारिता क्यों करना चाहते हैं. उन्हें लगता है कि शाहरूख खान न बन सकें तो कम से कम टीवी पर तो दिखेंगे. यह ग्लैमर की चाह है, इसे पत्रकारिता कैसे कह सकते हैं. और इनके मुखिया जो कभी-न-कभी पत्रकारिता से जुड़े रहे हैं अब गलत को सही ठहराने की हर संभव दलील देते हैं. क्या टीवी मीडिया खबरों का गिद्धभोज आयोजित करना चाहता है जहां हम सब उसके शिकार हैं?

साथ में राजेश कटियार, नई दिल्ली
रूपेश कुमार, लखनऊ

One thought on “मीडिया का गिद्धभोज

  1. Sanjay ji,

    bahut sahi likha hai aapne.kamobesh har kshetra me aise hi halaat hain.jo jitna apne aapko janta ka hitaishi batata hai,wo hi unka shoshak bane hue hain.
    SO CALLED HELPING PROFESSION WALE ,SOCIAL WORKERS bhi peeche nahi hain is GIDDHBOJ me.

    Like

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