हे भगवान भारत को कभी अमरीका न बनाना

हे भगवान, मेरी एक ही प्रार्थना है कि भारत को कभी अमरीका मत बनने देना. भारत-भारत ही रहे इसीमें भारतवासियों का ही नहीं दुनिया का भी कल्याण है. जैसे गांधी जी कहते थे स्वतंत्रता की लड़ाई भारत की अकेली नहीं है. यह सभ्यता की लड़ाई है. एक तरफ उपनिवेशवादी सभ्यता है तो दूसरी तरफ उपनिवेशवाद के शिकार लोगों की सभ्यता है. हम दूसरी ओर हैं. गाँधी जी कहते थे – हम उपनिवेशवाद की मानसिकता से लड़ रहे हैं. दुनिया में जहां कहीं भी उपनिवेशवाद होगा, हम उसका विरोध करेंगे, उनके प्रतिनिधि बनेंगे.

आज के दौर में उपनिवेशवाद उपभोक्तावाद हो गया है. हथियार बदल गये हैं लेकिन न उनको चलानेवाले बदले हैं और न ही लक्ष्य में कोई परिवर्तन हुआ है. उपभोक्तावाद का यह युग उपनिवेशवाद से भी घातक है. उपनिवेशवाद में दुश्मन की पहचान आसान थी. उसका रंग-रूप, देश-काल से निर्धारण हो सकता था. अब ऐसा नहीं है. उपनिवेशवाद के दौर में भूभाग पर कब्जा था अब मन और शरीर पर कब्जा है. गुलामों की फौज खड़ी हो रही है. और इन गुलाम मानसिकतावाले उपभोक्ताओं को लगता है कि वे कोई महान जीवन जी रहे हैं. एकबार भी अगर विचार करें तो पता चलेगा कि वे सिर्फ कंपनियों के लिए जीवित हैं. खरीदना, खाना और मर जाना यही जीवन का मकसद बन गया है. दुर्भाग्य से इस जीवनशैली का स्रोत अमरीका है.

हे, ईश्वर अमरीका का पागलपन भारत पर हावी हो रहा है. देश में पैदा हो रहे जटिल मध्यवर्ग के सिर पर अमरीका सवार है. मुझे नहीं मालूम कि इन भरे पेट और खाली दिमाग लोगों का उद्येश्य क्या है. वे ऐसा पागलपन क्यों कर रहे हैं. लेकिन एक बात समझ में आती है जब तक इस मध्यवर्ग को होश आयेगा भारत का काफी नुकसान हो चुका होगा. संभव है पीढीगत रूप से हमारें यहां पागलों की फौज खड़ी हो जाए. जिसकी शुरूआत हो चुकी है. ऐसे अर्धविक्षिप्त दिशाहीनों को सम्यक बुद्धि देना भगवान और जीने का वास्तविक मतलब.

धन की कामना कोई बुरी बात नहीं है. लेकिन धन और द्रव्य का भेद स्पष्ट होना चाहिए. भारत और दुनिया के हर तथाकथित पिछड़े देशों में यह भेद कायम है. अमरीकी माडल ने यह स्थापित कर दिया है कि धन और द्रव्य दोनों एक ही वस्तु है. फिर इस धन की प्राप्ति के उपाय और खर्च का विवेक भी खत्म हो गया है. धन क्यों कमाएं, कैसे खर्च करें यह स्वविवेक का विषय होना चाहिए. लेकिन अमरीकी माडल आफ इकोनामी ने हमारा यह विवेक भी हमसे छीन लिया है. इस विवेकहीनता का परिणाम है कि कहीं धन गड़ा पड़ा है और कहीं लोग अभाव में मर रहे हैं. धन का उपयोग उन अमर्त्य वस्तुओं के क्रय-विक्रय पर खर्च कर रहे हैं जो केवल कंपनियों द्वारा खड़ा किया गया हौवा है. वास्तविक जीवन से उनका कुछ लेना-देना नहीं है. दूसरी ओर अपने ही देश में 25 करोड़ से अधिक लोग 12 रूपये से भी कम पर रोज गुजारा कर रहे हैं. लेकिन हमें कोई चिंता नहीं होती.

हे भगवान, हमारे देशवासियों की प्रज्ञा जागृत करो कि उन्हें अहसास हो वे दिव्यबोध से परिपूर्ण हैं. वे उपभोक्ता नहीं बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक हैं, और उससे भी बढ़कर एक उदारचरित्र मनुष्य हैं. हमारे देशवासी अपनी क्षमता पहचाने, अपनी प्रज्ञा जागृत करें और समझें कि अमरीका उन्हें जो दे रहा है वह कौड़ी-पाई है. वे अमरीका को जो दे सकते हैं वह अमूल्य निधि है. हमें अपनी आत्मग्लानि से मुक्त करो भगवान ताकि हम पूर्ण उत्साह से मानवजाति की सेवा कर सकें. अभावग्रस्त के भाव बन सकें. उनकी आवाज बने जिन्हें बोलने की मनाही कर दी गयी है. उनके बारे में सोचे जिन्हें हाशिये पर डाल दिया गया है.

हे ईश्वर भारत को कभी अमरीका न बनाना. हो सके तो यह आशिर्वाद देना कि हम एक भारतीय बने रहें और अपने मनुष्य जीवन को सार्थक कर सकें.

आमीन…

7 thoughts on “हे भगवान भारत को कभी अमरीका न बनाना

  1. क्‍यों इस तरह की बेमतलब के ख़्यालीलोक और क़यास में सिर फंसा रहे हैं..

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  2. हमारे यहाँ एक कहावत कही जाती है – बिलारी के मनौले सिकहर ना टुतात. मुट्ठी भर टुच्चे लोगों के चाहने से भारत अमेरिका नहीं हो सकता. इस मुद्दे पर चिन्ता की कोई जरूरत नहीं है.

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  3. me bhi aapke vicharo se shamt hui . mene aapne blog dhara bharat ko bharat hi rhane do ka nara bulndh kiya

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  4. बिल्कुल सही कह रहे हैं आप. किन्तु कुछ वक्त हास्य में भी बीते तो क्या बुराई है.

    इसी खातिर एक बड़े व्यंग्यकार ने लिखा है कि काश, मैं कुत्ता होता!! मुझे नहीं लगता कि वो वाकई कुत्ता बनना चाहते थे मगर वो एक व्यंग्य का माध्यम था कुत्तों की हो रही आवाभगत के सामने भूखे मरते आदमी की व्यथा पर. बस, यूँ ही कुछ मान कर चलें.

    और फिर भारत में सभी कुछ अच्छा है और अमरीका में सभी कुछ खराब और बेहूदा-यह स्थिती भी तो नहीं है. अगर कुछ अच्छी बातों को आत्मसात कर हमारे यहाँ बसी (या कहें धँसी) कुछ सामाजिक और अन्य बुराईयों का परित्याग कर एक बेहतर समाज की कल्पना की जा सकती हो, तो ऐसी कल्पना में बुराई ही क्या है? इन्हीं विचारों से तो सृजन की राह निकलेगी.

    बाकि बातें तो हास-परिहास हेतु कही जा रहीं हैं. सुना है, हँसना स्वास्थय पर अनुकुल प्रभाव डालता है.

    मुस्करायें दोस्त!!

    और आपको बधाई इस गंभीर लेखन और चिंतन के लिये.

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  5. अच्छा है। मैं आपके विचार से सहमत हूं। लेकिन इसमें भगवान का करेंगे! 🙂

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