धन और संसाधन

एक कहावत है जिसे समझने की आज बहुत जरूरत है-

गोधन, गजधन बाजिधन और रतनधन खान ।
जब आवै संतोषधन, सबधन विरथा जान ।।

मेरी समझ से अब इसका अर्थ कुछ यूं है-
गोधन- वह संपदा जो हम पुरूषार्थ से अर्जित करते हैं.
गजधन- आपकी शौर्यगाथा. जब लोग आपकी जय-जयकार करें.
बाजिधन- मर्त्य धन. ऐसा धन जो छल-कपट प्रपंच से अर्जित किया जाता है.
रतनधन – पुत्र या संतानरूपी धन

तो मुख्यतया चार प्रकार के धन हैं. इसमें पुत्रधन को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है. अगर संस्कारी पुत्र हो तो बाकी के तीन प्रकार के धन की कमी कभी नहीं अखरती. सबसे निकृष्ट धन है बांझधन. यानि वह धन जो प्रपंच से कमाया जाता है. आज चारों ओर इसी धन का बोलबाला है. गोधन यानि पुरूषार्थ से धन कमानेवाले लोग गिने-चुने हैं और गजधन तो बिरले ही किसी के पास है. कार्य के बदले धन की हमारी परिभाषा में यह कहीं उचित बैठता ही नहीं कि कार्य के बदले प्रशंसा भी एक तरह की कमाई है. हम एक अच्छा काम करते हैं और कुछ लोग उसकी दिल से तारीफ करते हैं, और बहुत सारे लोग लाभान्वित होते हैं. इससे प्रत्यक्ष-परोक्ष जो शौर्य-कीर्ति प्राप्त होती है वह गजधन अमूल्य है.

फिर भी इन सबसे ऊपर है संतोष धन. हम जो कुछ अर्जित करते हैं उसको एक दिन हमसे अलग होना पड़ता है. फिर नये सिरे से पाना और फिर खोना. यह एक सतत प्रक्रिया है. अब संतोषधन हो तो पाने-खोने के खेल के बीच हम स्थिर रहते हैं. न पाने की खुशी और न खोने का गम.

आज हमें समझाया जा रहा है कि चौड़ी सड़कें, बंदरगाह, ऊर्जा के बड़े-बड़े श्रोत आदि बातें संसाधन(infrastructure) हैं. और हम इन्हीं बातों को संसाधन मानकर उनकी कमी का रोना भी रो रहे हैं. इन संसाधनों को बढ़ाने में लगे तो क्या होगा? बड़ी-बड़ी कंपनियों को बड़े-बड़े ठेके मिलेंगे और इन संसाधनों का उपयोग बड़ी कंपनियां अपना व्यवसाय बढ़ाने में करती हैं. इसकी आड़ में जिन बातों को अब तक भारत संसाधन मानता आया था उसको नकारा जा रहा है.

हमारी नजर में संसाधन है- जल, जंगल, जमीन, जानवर और जन. इन पांचों वास्तविक संसाधनों की चिंता किसी को नहीं है. उलटे हमारे विकास के रास्ते इन पांच मूलभूत संसाधनों का ही सबसे अधिक नुकसान करते हैं. आज जल पर संकट है, जमीन पर संकट है, जंगल(पर्यावरण) पर संकट है , पशुधन पर संकट है और आखिरकार मनुष्य जीवन पर संकट है. क्या इन संसाधनों को संकट में डाल हम चौड़ी सड़कों, मंहगी गाड़ियों और चमचमाती बत्तियों के प्रकाश में जी पायेंगे?

धन और संसाधन दोनों की भारतीय परिभाषा के अनुसार सोचिए. क्या हम वाकई विकासपथ पर हैं या विनाशपथ पर? आपको इस बारे में एक बार जरूर सोचना चाहिए.

8 thoughts on “धन और संसाधन

  1. अभी हम विनाशपथ की ओर बढ रहे हैं संजय जी. पहुंचे नहीं हैं, लेकिन पहुंच जाएँगे जल्दी ही. वैसे चल रहे हैं उसी ओर बहुत दिनों से.
    दूसरी बात यह संतोष धन की बात बाबाओं के प्रवचन में तो ठीक लगती है, लेकिन उनका ही भौतिक सच देखें तो हमारी-आपकी आँखें फटी रह जाती हैं. फिर सवाल यह है कि संतोष धन किसके लिए? सिर्फ उपदेश के लिए?

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  2. कई जगह हम सोने का अण्डा देने वाली मुर्गियों से एक-एक अण्डा प्रतिदिन लेने के बजाय सारे अण्डे एक साथ पाने के अज्ञानता में मुर्गियों को ही मार दे रहे हैं। हमे अक्षय विकास (sustainable development) और शाश्वत विकास की बात सोचनी चाहिये।

    मेरे खयाल से ‘बांझधन’ नहीं, ‘बाजिधन’ होना चाहिये; बाजि=घोड़ा

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  3. अनुनाद सिंह आप बिल्कुल सही कह रहे हैं. बाजिधन ही होना चाहिए.

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  4. जब बात धन की हो रही है तो एक ही धन है जो आज सब पर हावी हो रहा है…वो है हरामधन!संतोषधन तो बाबा लोगों तक को सिर्फ़ उपदेश देते वख्त ही याद रहता है उसका उपयोग अब वे भी अपने व्याव्हारिक जीवन मे नही करते है(अक्सर आप उन्हे वायुयान के J class मे देख सकते है)!रही बात हम सामान्य लोगों की तो हमे पहले ही आदत पड चुकी है चादर से बाहर पाँव पसारने की,आज नही तो कल अन्जाम भुगतने को तैयार रहना ही पडेगा!

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  5. सही बात है सन्‍तोष धन सर्वोत्‍तम । लेकिन तब जब हम बाजी हार जाये ।

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