आज 9 अगस्त है

हाल में एक दल नंदीग्राम का दौरा करने गया था. इसमें राधा भट्ट भी थीं. राधा भट्ट एक गांधीवादी समाजसेवी हैं और उत्तराखण्ड में रहती हैं. नंदीग्राम दौरे के समय उन्होंने स्थानीय निवासियों से पूछा कि आप लोगों ने सड़क क्यों काटी? विरोध का यह तरीका आपको क्यों सूझा? स्थानीय ग्रामवासियों ने जवाब दिया कि अंग्रेजों के समय हमारे पुरखों ने भी ऐसे ही विरोध किया था. यानि उनकी स्मृति में यह बात बैठ गयी है कि वर्तमान सरकारों में और अंग्रेजों में कोई फर्क नहीं रह गया है?

फर्क मिट गया है, यह तो साफ दिखता है. हमारी सरकार आम आदमी पर लाठी बरसाने, गोली चलाने में कोई संकोच नहीं करती और इसे लॉ एण्ड आर्डर के लिए जरूरी बताकर बात को रफा-दफा कर दिया जाता है. सरकार को निवेश चाहिए, ग्रोथ रेट चाहिए और सरकार में बैठे लोगों को सफेद से ज्यादा काला धन चाहिए. इसलिए कंपनियों को स्थापित करने में सरकार कोई कसर नहीं छोड़ रही है. गरीब को घर बनाने की जगह नहीं और झुग्गी पर भी आफत है और रिलायंस, मित्तल, जिंदल के लिए हजारों एकड़ जमीन औने-पौने दामों में दी जा रही है.

जिसे विकास कहा जा रहा है असल में वह नये सिरे से कंपनीराज की स्थापना है. जंगल से आदिवासी खदेड़े जा रहे हैं क्योंकि वहां कंपनियों को खनिज संपदा मिल जाती है. गांव और खेत से किसान खदेड़े जा रहे हैं क्योंकि कंपनियों को खेती में अचानक बहुत मुनाफा नजर आने लगा है. शहर से झुग्गियां उजाड़ी जा रही हैं क्योंकि झुग्गियां शहर पर बदुनमा धब्बा हैं? फिर गरीब, किसान, आदिवासी जाएं तो कहां जाएं? क्या विकास के इस रांड़रोने में गरीब की कहीं कोई जगह है या नहीं?

कहा जा रहा है कि आदमी के सामने अवसर पैदा हो रहे हैं? कहां अवसर पैदा हो रहे हैं? जो नीति है उससे तो उपभोक्ता के सामने विकल्प सिमटकर 10-15 रह जाएंगे. रिलांयस ही आपकी आधी से ज्यादा जरूरतें पूरी कर देगा. फिर चुनाव का अवसर बचा कहां? उपभोक्ता के लिए अवसर खत्म हो रहा है क्योंकि उत्पादन का केन्द्रीयकरण हो रहा है. इसके कारण बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हो रहे हैं. ये करोड़ो बेरोजगार लोग कहां जाएंगे? भूमि आवंटन और कंपनीराज की इसी तरह की नीतियों के कारण ब्राजील में जरूरत से ज्यादा जमीन होने के बाद भी भूमि सुधार का सबसे बड़ा आंदोलन चल रहा है. ब्राजील क्षेत्रफल में भारत से तीनगुना बड़ा है और आबादी है 17 करोड़. लेकिन भूमिहीनों की संख्या इतनी कि आंदोलन चल रहा है. क्यों? क्योंकि वहां अधिकांश जमीन कंपनियों के कब्जे में है. अब भारत में भी हम अपनी सारी जमीन कंपनियों के हवाले करते जा रहे हैं.

आज 9 अगस्त है. आज के ही दिन 1942 में भारत छोड़ो (“Quit India”) का नारा देश में गूंजा था. समय आ गया है कि एक बार फिर कहीं से यह नारा गूंजे कि कंपनियों भारत छोड़ो. हमारे लिए भी यह 9 अगस्त विचार का एक मौका देता है कि क्या हम कंपनियों के लिए जी रहे हैं? अपने जीवनशैली में ऐसे बदलाव करने का भा वक्त आ गया है कि हमारे जीवन में कंपनियों का दखल कम से कम हो. इसी में हम सबका भला है.

12 thoughts on “आज 9 अगस्त है

  1. तो क्‍या करें । क्‍या हल है इसका । कृपया आदर्श वादी बातें कर टालमटोल का उत्‍तर देने की कोशिश न कीजियेगा ।

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  2. संजय तिवारी जी देखते जाईये, कल शायद सारे राज्यों के नाम के पीछे प्राईवेट लिमिटेड या लिमिटेड जुड जायेगा!

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  3. हरिमोहन भाई.

    आपकी टिप्पणी से एक बात साफ है कि आप भी मानते हैं देश में नये सिरे से कंपनीराज आ रहा है. एक लाईन में हल जानना हो तो वह है बहिष्कार. पूरा नहीं तो जितना संभव हो उतना कंपनियों का बहिष्कार किया जाए. दार्शनिक आधार विकसित करना हो तो आप पढ़ने-लिखनेवाले आदमी हैं समानांतर रूप से कंपनीराज के खिलाफ बहुत कुछ लिखा गया है. उस तरफ नजर दौड़ानी चाहिए.

    मैं इसे नये सिरे से कंपनीराज कहता हूं तो मेरी समझ कोई एक दिन में तो बनी नहीं. आठ नौ सालों से इस विषय पर काम कर रहा हूं. समस्या है यह तो दिखता है लेकिन समस्या का मूल क्या है? राजनीतिक स्वेच्छाचारिता? विचारधाराओं का भटकाव? भ्रष्टाचार? बेईमानी? काला धन? यह सब तो रोग के लक्षण हैं. रोग का कारण क्या है. रोग है कोई है जो इन रोगों को पैदा होने दे रहा है. वह है पश्चिम से आयातित व्यावसायिक नजरिया. अब इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कंपनी देशी है या विदेशी. फर्क इस बात से पड़ता है कि उसका वर्किंग पैटर्न क्या है? इस लिहाज से देखेंगे तो सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे लगते हैं. इतिहासकार धर्मपाल कहा करते थे सत्रहवीं और अठारहवी सदी में यूरोप में जो कुछ हुआ था वही आजकल भारत में हो रहा है. वे कहते थे- बाड़ लगाई जा रही है. ….. मतलब सीमांकन हो रहा है. कब्जा हो रहा है. चारदीवारी बन रही है. और इस चारदीवारी से गरीबों को धक्के मारकर बाहर फेका जा रहा है.

    संसाधनों पर कंपनियों का कब्जा हो रहा है. पानी, जमीन, जंगल सब उनके हाथ में जा रहा है और वे तात्कालिक फायदे के लिए इन संसाधनों का शोषण कर रहे हैं. आप बताईये उत्तराखण्ड के पहाड़ों पर निर्मल पानी बहता है. कल को कोई कंपनी दिल्ली में समझौता कर ले कि उत्तराखंड के पानी का कापीराईट उसके पास है. (एक कानून ऐसा आनेवाला है जिसमें भूजल पर केन्द्र सरकार का अधिकार हो जाएगा.) और वह पानी वहां से पैक करके बड़े शहरों को रूपया बनाएगा और स्थानीय निवासियों का उस पानी पर कोई अधिकार नहीं रह जाएगा. तब लोग किसी एक कंपनी से लड़ेगे. लेकिन आज जरूरत है इस मानसिकता से लड़ने की. इन्हें पराश्त करने की.

    आज कंपनियों का खुला खेल फर्रूखाबादी नहीं रोका गया तो वह दिन दूर नहीं जब दंगे और लूटपाट रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा हो जाएंगे. फिर सरकार चिल्लाती रहे लॉ एण्ड आर्डर की समस्या है. आज जो भिखारी सड़क पर कटोरा लेकर भीख मांग रहा है कल को वह छीनैती भी शुरू कर देगा और परसों संभ्रांत घरों में डाका भी डालेगा. खून भी करेगा. आखिरकार जीने का हक तो सबको है.

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  4. बहुत बढिया और हृदय स्पर्शी
    दीपक भारतदीप

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  5. संजय जी
    ये अहिष्कार-बहिष्कार बिल्कुल टालू जवाब हैं. आजादी की लड़ाई में नपुन्सकों और ढोंगियों की अवैध घुसपैठ का ही नतीजा है जो आज तक हम कम्पनी राज और दुनिया भर की जहालतें झेलने को विवश हैं. इससे मुक्ति का एक ही रास्ता है और वह वही है जो नंदीग्राम के लोग कर रहे हैं. आज वे सड़क काट रहे हैं, दो-चार साल बाद सिर काटेंगे. धीरे-धीरे यही तरीका पूरे देश को अपनाना पड़ेगा. सत्ता पर काबिज अंग्रेजों की अवैध संतानों से छुटकारे का कोई और उपाय नहीं है. भरोसा न हो तो अपना इतिहास-पुराण उठाकर देख लें. सचमुच चाहते हैं छुटकारा तो क़मर कसिये उसी हाल के लिए और लोगों को एकजुट करिये इस महासंग्राम में हिस्सेदारी के लिए. एक बात और, यह ख़्याल भी हमें रखना पड़ेगा कि कहीं संसदीय राजनीति में शामिल भंडुए इस में न घुस जाएँ. वे जहाँ घुसे इस लड़ाई का हाल भी वही हो जाएगा जो आजादी की लड़ाई का हुआ.

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  6. ह्म्म्म, सहमत हूं संजय जी, लेख से भी और आपकी प्रतिटिप्पणी से भी!!

    लेख के हेडिंग से मुझे अपने स्वर्गवासी पिता की याद आ गई!! हर साल ऐसे दिनों मे वह सुबह हमें उठाते हुए ही याद दिलाते थे कि आज नौ अगस्त है, आज ये है आज वो है!! सेनानी थे वे!!
    2004 में ही नौ अगस्त पर सम्मान के लिये राष्ट्रपति भवन गए थे वही उनका स्वास्थ खराब हो गया, इसी हालत में रायपुर लाए गए फ़िर दो महीने की अस्वस्थता के बाद अक्टुबर में उनका देहांत हो गया!! बस आपकी हेडिंग ने उनकी याद शिद्दत से दिला दी!!
    यह लिखते हुए मेरी आंखें नम हो रही है!!
    आज एक बहुत ही छोटा सा ऐसा काम किया है कि शायद उपर बैठे वह खुश हो जाएं।

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  7. अपने जीवनशैली में ऐसे बदलाव करने का भा वक्त आ गया है कि हमारे जीवन में कंपनियों का दखल कम से कम हो.
    अच्छा लिखा है। इसी तरह के लेख लिखते रहें।

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  8. मेरा सुनिश्चित निष्‍कर्ष है कि इसके लिए खुद से शुरूआत करनी होती है – यह चिन्‍ता और प्रतीक्षा किए बिना कि बाकी लोग क्‍या कर रहे हैं । दिक्‍कत यह है कि हर कोई चाह रहा है कि इसकी शुरूआत कोई और करे और उसके पीछे वह भी चल पडे । ऐसे में, हर कोई ठिठका खडा है । नन्‍दीग्राम का ‘जन’ ठिठक कर खडा नहीं रहता क्‍यों कि वह बुध्दिजीवी नहीं है । बुध्दिजीवियों ने जितना नुकसान किया है, उतना किसी ने नहीं । बन्‍द कमरों में शाब्दिक जुगाली कर अपने कर्तव्‍य की इतिश्री मान कर आत्‍म मुग्‍ध होने वाली ये ‘पवित्र गाएं’ समाज से सम्‍मान और प्राथमिकता तो हासिल कर रही हैं लेकिन समाज को दे कुछ भी नहीं रहीं – अपना गोबर तक नहीं ।
    बुध्दिजीवियों के साथ एक दिक्‍कत और है । वे खुद को श्रेष्‍ठ तो मानते हैं लेकिन किसी अभियान का नेत़त्‍व करने के लिए मैदान में कभी नहीं आते और किसी का नेतृत्‍व स्‍वीकार करने को तो बिलकुल ही तैयार नहीं होते ।
    और कुछ नहीं तो हम कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि अपने-अपने इलाके के निर्वाचित जन प्रतिनिधियों को दो-टूक शब्‍दों में, खुले आम कहना शुरू करें कि उनका योगदान देश और समाज को किस ओर ले जा रहा है । हमारे नेताओं को नियन्त्रित करना आज की सबसे पहली जरूरत बन गई है ।
    आपकी सूचनार्थ निवेदन कर रहा हूं कि मैं मेरे इलाके के संसद सदस्‍यों और विधायकों से, रेल्‍वे प्‍लेटफार्म पर और सार्वजनकि समारोहों में मिल कर यह सब कहता हूं – उनके समर्थको की मौजूदगी में । इसके अतिरिक्‍त, ऐसे मद्दों पर जब भी शहर में कोई आयोजन, गतिविधि होती है तो उसमें अपने मित्रों सहित भाग लेता हूं ।
    कहना बहुत हो गया – अब तो कुछ कर गुजरने का वक्‍त आ गया है ।
    बहिष्‍कार और प्रतिकार – सब कुछ साथ-साथ ।

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  9. अच्छा है. अपने विचार जरुर सामने रखने चाहिये. सबका सहमत होना तो कतई आवश्यक नहीं. बात उठाना आवश्यक है, तभी चर्चा और विमर्श के रास्ते खुलते हैं.

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  10. अभी पूरी पोस्ट और टिप्पणियां नहीं पढ़ीं। लेकिन मैं हर समस्या का मूल हमारा कोई काज कार्य अपनी भाषा में न होना ही मानता हूँ। हर तरह का अनुबन्ध, पढ़ाई अंग्रेज़ी में है तो आम आदमी तो एक जानवर से अधिक कुछ भी नहीं रह जाता, जिसे कोई भी कंपनी, सरकार या ताकतवर आदमी आराम से लताड़ सकता है। बाकी विस्तार में बाद में।

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