"सेज" पर गुरेज

सेज (SEZ) विकास का नया शिगूफा है. देखते-देखते सर्र से यह इतना हावी हो गया कि विरोधी भी समझ नहीं पा रहे हैं कि इसकी भयावह तस्वीर लोगों को कैसे दिखाएं. 77 करोड़ लोगों के 20 रूपये प्रतिदिन आमदनी वाले देश में 355 सेज विकास का पहिया घुमाने के लिए आनेवाले हैं. अगर समाजवादी व्यवस्था के उदारवाद(कुछ हद तक भ्रष्ट) के लंबे दौर के बाद देश की यह हालत है तो अपेक्षाकृत अतिउदार (अतिभ्रष्ट) पूंजीवादी व्यवस्था के केन्द्रित माहौल में सेज के रास्ते कौन सा विकास आयेगा? अभी अंदाज और कयास लगाने का दौर है.

एक धड़ा कहता है देश की जीडीपी बढ़ेगी, प्रति व्यक्ति आय बढ़ेगी और रोजगार के नये अवसर पैदा होंगे. दूसरा धड़ा कहता है जीडीपी और प्रति व्यक्ति आय की अंकतालिका के उछाल से वास्तविक प्रगति नहीं होती. एक देश के तौर पर देखें तो प्रगति साफ दिखाई देती है लेकिन समाज और व्यक्ति के तौर पर अवनति होती है. एक वर्ग के पांस पूंजी का भंडार और होता है दूसरे वर्ग के पास पूंजी और संसाधन दोनों का अभाव. इनके बीच एक मध्य वर्ग होता है जो पहले वर्ग की दासता स्वीकार कर अपने लिए रोजी-रोटी का जुगाड़ कर लेता है. रोजगार भी इसी मध्यवर्ग के खाते में जाता है.

तो क्या इस पूंजीवाद के दर्शन में खोट है? शायद. जवाहल लाल नेहरू विवि के प्रोफेसर अरूण कुमार ने सामाजिक विषमता और अर्थशास्त्र पर बहुत काम किया है. वे कहते हैं “आजादी के 55 सालों में जितनी विषमता नहीं आयी है उतनी विषमता 5 सालों में बढ़ी है.” यानि पूंजीवादी उदारवाद नामक पूत के पांव पालने में ही दिखने लगे हैं. सरकार अपने आप को जिम्मेदार मानती है और चाहती है कि देश के हर व्यक्ति का जीवन योजना आयोग की नीतियों के अनुसार निर्धारित होना चाहिए. चलिए स्वीकार कर लेते हैं और मजबूत समाज कमजोर हो रहा है वाली बहस से मुक्ति पाते हैं. तो सरकार के पास 50 हजार करोड़ रूपया नहीं है इसलिए वह रोजगार गारंटी योजना नहीं चला पा रही है. लेकिन उसी सरकार के पास 2 लाख करोड़ रूपये का अतिरिक्त भार सहने की शक्ति है जो वह इन सेज प्रतिष्ठानों के नाम कुर्बान करने जा रही है.

कहते हैं देश का नागरिक नयी तरह की गुलामी में फंस रहा है. हम आर्थिक आधार पर पिछड़ेपन का नया अध्याय लिखने जा रहे हैं. यानि पूंजीवादी ब्राह्मण नये तरह के शूद्र गढ़ने की व्यूह रचना रच रहे हैं. वर्ण व्यवस्था का स्वरूप वही रहेगा सिर्फ आधार बदल जाएगा. अब सामाजिक नहीं आर्थिक शूद्र होंगे. लो, समाज के क्रांतिकारियों एक लड़ाई जीते नहीं दूसरी शुरू हो गयी? लेकिन समाज सुधार के क्रांतिकारी इस नयी वर्णव्यवस्था के खिलाफ कोई जंग छेड़ेगें?

6 thoughts on “"सेज" पर गुरेज

  1. मुझे सेज पर हमेशा से शक रहा है. पता नहीं क्यों लेकिन मुझे ये राजनेताओं, बिल्डरों, और बड़े उद्योग घरानों की मिलिभगत में जेबें भरने की साजिश से बढ़कर और कुछ नहीं लगतीं. सेज एक भयावह विचार है, इसका परिणाम हम नंदीग्राम और सिंगुर में देख चुके हैं. अब बुद्धदेव कहते हैं कि वो गलती थी… कई सौ लोगों की मृत्यु के बाद?

    … सेज का विरोध किया जाना चाहिये, हर स्तर पर, हर आदमी को. अगर उद्योगपतियों को उद्योग लगाने हैं तो वो पारंपरिक तरीकों से, उचित मूल्य, और उचित शर्तों पर भूमि अधिग्रहण करें और मोल-भाव हो किसानों से, न कि सरकार से. औने-पौने दाम में सरकार वो ज़मीन इन उद्योगपतियों को बेच रही है जो उसकी है ही नहीं, गरीब किसानों की है.

    थू है ऐसी सरकार के मुंह पर.

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  2. “सरकार के पास 50 हजार करोड़ रूपया नहीं है इसलिए वह रोजगार गारंटी योजना नहीं चला पा रही है. लेकिन उसी सरकार के पास 2 लाख करोड़ रूपये का अतिरिक्त भार सहने की शक्ति है जो वह इन सेज प्रतिष्ठानों के नाम कुर्बान करने जा रही है.”
    मित्र! पूंजीवादी उदारवाद का यही सच है. इसी को बेनकाब करने की जरूरत है. बधाई. ऐसे मुद्दों पर हम आपके साथ हैं.

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  3. कृपया कुछ विस्तार से बताएँ कि सेज़ से किस तरह हानि होगी? मैंने कहीं पढ़ा था कि भारत में निम्न वर्ग की आय में भी पर्याप्त इज़ाफ़ा हुआ है, हालाँकि उच्च और मध्य वर्ग की वृद्धि-दर के मुक़ाबले वह कम है। इसलिए उस हिसाब से यह नहीं कहा जा सकता कि निम्नवर्ग को नव-उदारवाद से नुक़सान हो रहा है। इस बारे में आपकी क्या राय है?

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  4. आपका सवाल सपाट है. यह सपाट सवाल कईयों के मन में उठना चाहिए. मैं जवाब अपनी समझ से ही दूंगा. सच कहें तो मैं आपको कई सवालों से भर दूंगा.

    पहला सवालः कहा जा रहा है इससे विकास का नया युग शुरू होगा. कैसे? जहां एसईजेड बनेंगे वहां उद्योग के लिए मात्र 15 फीसदी जगह आरक्षित है. बाकी जगह डेवलपर अपने हिसाब से प्रयोग कर सकता है. रिलांयस का झज्जर के एसईजेड में केवल 8 प्रतिशत जगह उद्योग के लिए आरक्षित है. बाकी जगह का क्या होगा? बाकी जगह पर रियल एस्टेट का कारोबार होगा. क्योंकि आनेवाले समय में रियलएस्टेट कारोबार देश का सबसे फायदेमंद कारोबार होगा?

    दूसरा सवालः खेती की जमीन और शहर से सटे इलाकों में ही एसईजेड क्यों बनाए जा रहे हैं?

    तीसरा सवालः अगर पैसा ही आधार बन जाए तो दुनिया की फिक्सिसीयस इकोनामी रियल एकोनामी से 100 गुना बड़ी है. यानि जितना पैसा यहां से वहां मूव कर रहा है उससे दुनिया के समस्त संसाधनों को 100 बार खरीदा जा सकता है. तो क्या अब यही हो जाए?

    चौथा सवालः कहा जा रहा है कि एसईजेड से रोजगार पैदा होगा. कहां रोजगार पैदा होगा? स्थानीय लोगों के लिए कोई रोजगार कभी पैदा नहीं होता. जो पैदा होता है वह चाय-खुमचे से ज्यादा कुछ होता नहीं. और एक वेल प्लान्ड शहर के आस-पास तो यह संभावना भी खत्म हो जाती है. आपको यकीन न हो तो लोनावाला का सहारा का प्रोजेक्ट देख आईये कितने स्थानीय लोगों को रोजगार मिला है.

    पांचवा सवालः क्या यह देश के भीतर और साढ़े तीन सौ देश बनाने जैसा नहीं है? यहां कोई कानून प्रभावी नहीं होगें. सरकार यहां लगनेवाले उद्योगों से कोई टैक्स आदि नहीं लेगी. यहां की सारी सुविधा डेवलपर खुद विकसित करेगा. उसके पास पैसा है वह अपने शहर में रहनेवाले लोगों को गंगा का पानी पिलाएगा. आप प्यासे मरते हैं तो मरें. गरीब आवाज उठायेगा तो पुलिस उसको लाठियों से शांत कर देगी. अगर हम मध्यवर्ग में हुए तो हम शांपिग वगैरह करके कोई फिल्म देखकर अपना समय गुजारेंगे. थोड़ा और पैसा हुआ तो विदेश भी घूम आयेंगे. देश की बाकी जनता मरती है तो मरे. क्या हमारी गैरत को यह बर्दाश्त होगा?

    प्रतीक भाई यह हद दर्जे की चालाकी है. असल में पूंजीपति देश के प्राकृतिक संसाधनों पर अपना कब्जा कर रहे हैं. आज यह इतना साफ इसलिए नहीं दिखता क्योंकि हम लोग कहीं न कहीं इस व्यवस्था के लाभार्थी हैं. इसलिए हमें लगता है कि विकास नाम की कोई चीज हो रही है. उत्तर प्रदेश में सरकार की योजना है कि वह मुकेश अंबानी को प्रदेश की अधिकांश चीनी मिलें दे देगी. इसकी कवायद चल रही है. रिलांयस उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती करने जा रहा है. कहा जा रहा है कि किसानों को फायदा होगा. यह नहीं बताया जा रहा है कि इस बहाने अब तक स्वतंत्र रूप से स्वावलंबी जीवन जी रहे किसान रिलांयस की मजदूरी करेंगे.

    इससे लड़ने के लिए जो युवा शक्ति और जोश चाहिए वह तो उपभोक्ता और नचनिया बनकर खुश है. लेकिन याद रखिये जल्द ही वो दौर आयेगा जब देश में कंपनीराज के खिलाफ विस्फोट होगा.

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  5. बढि़यॉं सार गर्भित लेख,
    सेज के परिणाम स्‍वरूप देश में असामनता आना स्‍वाभाविक है। और निश्चित रूप से हम आर्थिक परतन्‍त्रता की ओर जा रहे है।

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