किसानों का विकास मत करिए….प्लीज

अनिल रघुराज ने थोड़े दिनों पहले एक रिपोर्ट लिखी थी कि उत्तर प्रदेश में मायावती अधिया खेती को लागू करने जा रही हैं. इस लेख के साथ उन्होंने कहीं से खोजकर कैबिनेट मीटिंग की वह रिपोर्ट भी लगाई है जिसमें उत्तर प्रदेश की नयी कृषि नीति का खाका खींचा गया है. इस रिपोर्ट का एक पैरा देखकर मेरे पैंरों के नीचे से जमीन खिसक गयी. क्या हमारे नौकरशाह इतना झूठ बोल सकते हैं? नौकरशाहों की जवाबदेही किसके प्रति है? नागरिक के या फिर कारपोरेट घरानों के प्रति? पहले वह पैरा देखिये-

“कृषि क्षेत्र में विकास न होने के कारण कृषि से जुड़े कई क्षेत्रों का विकास नहीं हो रहा है. कड़ी मेहनत करने के कारण देश के कई हिस्सों में किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर हुए हैं.”

इससे बड़ा झूठ कुछ हो नहीं सकता कि कड़ी मेहनत के कारण देश में किसानों ने आत्महत्या की है. किसान आत्महत्या के जो कारण रहे हैं उसी को सरकार और कंपनियां निवारण बनाकर प्रस्तुत कर रही हैं. कर्ज, बाहरी पूंजी का दखल, गैरजरूरी तकनीकि का हस्तक्षेप ऐसे मूलभूत कारण हैं जिसके कारण किसानों ने आत्महत्या की है. आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और पंजाब में सबसे अधिक किसान आत्महत्या कर रहे हैं. दुर्भाग्य से इन्हीं तीन राज्यों में खेती में सबसे अधिक पूंजी निवेश हुआ है. खेती में तकनीकि और नकदी फसल का सबसे अधिक प्रयोग इन्ही राज्यों में होता है. खेती में तकनीकि और पूंजी का कम प्रयोग करनेवाले राज्य उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि में इक्का दुक्का आत्महत्या की घटनाएं हुई हैं वो भी कर्ज के कारण.

जब हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं कि खेती का विकास होना चाहिए तो इसका सीधा मतलब होता है खेती पर कंपनियों का प्रभुत्व बढ़ना चाहिए. अचानक हमारे उद्योगपतियों को भी खेती से बहुत प्रेम हो गया है. इसका मतलब यह है कि कंपनियों का दखल खेती पर बढ़ेगा. वे कर्ज और ऐसी तकनीकि को खेतों तक ले जाएंगे जिससे उनके व्यवसाय में बढ़ोत्तरी होती हो. विकास का यह पिरामिड उल्टा है. किसानों को लूटने की योजना बना रही कंपनियां कहती हैं कि खेती का विकास करने जा रही हैं. आईआईएम छाप इन व्यवसाईयों को नहीं मालूम भारत की कृषि परंपरा बहुत समृद्ध है. लेकिन शोर ऐसा कि असली बात दब जाएगी और खेती का विकास करने के लिए शहर बैठे-बैठे योजनाएं बन जाएंगी. और लूट-पाट का एक अंतहीन सिलसिला शुरू हो जाएगा.

आंध्र में जिन दिनों किसान आत्महत्याओं की खबरें आनी शुरू हुई तो देश में कृषि मंत्री राजनाथ सिंह थे. उन्होंने घोषणा की कि वे किसानों को मिनलेवाले कर्ज को दोगुना करेंगे. विदर्भ के अपने दौरे में वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी कहा कि वे किसानों को सस्ता कर्ज मुहैया कराएंगे. कल 15 अगस्त के अपने भाषण में उन्होंने फिर यह बात दोहराई कि कर्ज को दोगुना कर देंगे. अभी तक का जो कृषि संकट दिखाई दे रहा है उसके मूल में कर्ज ही है. बैंकों ने कंपनियों के साथ मिलकर एक ऐसा मकड़जाल बना लिया है जिसमें किसान फंसता है तो आत्महत्या के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं बचता जिससे वह इस मकड़जाल से बाहर आ सकें. शहर के किसी आईआईएम छाप स्कूल से पढ़ा कोई एमबीए डिग्रीधारी लड़का गांव पहुंचता है और अपना टार्गेट पूरा करने में लग जाता है. यह टार्गेट कितना भारी पड़ता है किसी उपभोक्ता के लिए इसका अंदाज तो शहरी लोगों को भी है.

कर्ज की नई व्यवस्था का असली फायदा कंपनियों को होता है. उनकी बैंलेंसशीट मजबूत होती है. देश की जीडीपी में बढ़ोत्तरी होती है. लेकिन किसान और आम आदमी मारा जाता है. खेती में कर्ज खेती और खेतिहर दोनों का नाश कर रहा है. आत्महत्याओं का कारण भी यही है. यह झूठ क्यों बोला जा रहा है कि कर्ज खेती की सभी समस्याओं का समधान है? कर्ज और कंपनियों का हस्तक्षेप ही खेती की समस्या है. इसे समाधान कैसे मान लें?

One thought on “किसानों का विकास मत करिए….प्लीज

  1. भारत की कृषि परंपरा बहुत समृद्ध है. लेकिन शोर ऐसा कि असली बात दब जाएगी और खेती का विकास करने के लिए शहर बैठे-बैठे योजनाएं बन जाएंगी. और लूट-पाट का एक अंतहीन सिलसिला शुरू हो जाएगा.
    बहुत सही बात है संजय भाई। खेती और किसानों के कल्याण के नाम जबरदस्त धोखा चल रहा है।

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