पीएम और सीपीएम

प्रकाश कारात ने कह दिया है कि “हम परमाणु समझौते से सहमत नहीं हैं और इसे इस रूप में स्वीकार नहीं कर सकते.” आज दिन में तीन बजे 7 रेसकोर्स रोड पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, प्रणव मुखर्जी, प्रकाश कारात और सीताराम येचुरी के बीच जो बैठक हुई उसमें सीपीएम ने साफ कर दिया कि वर्तमान परमाणु समझौते को वे किसी भी रूप में स्वीकार नहीं कर सकते. अब कांग्रेस को फैसला करना है कि वह क्या रूख करती है.

परमाणु समझौते पर देर से ही सही लेकिन सीपीएम ने कड़ा रूख अख्तियार कर ही लिया. वैसे सीपीएम के एक नेता ने दो दिन पहले यह संकेत दे दिया था नरमी दिखाई जा सकती है. उस नेता का नाम है सीताराम येचुरी. सीताराम उदार कम्युनिस्ट हैं और सत्ता का महत्व समझते हैं. हो सकता है कांग्रेस ने उन्हें तैयार कर लिया हो कि प्रधानमंत्री के गोलमोल बयान को आधार बनाकर आमराय कायम कर ली जाए. लेकिन सख्त प्रकाश कारात के कड़े रूख ने यूपीए सरकार और कांग्रेस दोनों को उलझन में डाल दिया है. बुरी हालत है हमारे पीएम की जिसके एक तरफ अमरीका है तो दूसरी ओर सीपीएम. प्रकाश कारात के इस बयान के बाद दो ही रास्ते बचते हैं. या तो सरकार परमाणु समझौते से पीछे हटे या अपनी कुर्बानी की तैयारी शुरू कर दे. क्या कोई तीसरा रास्ता भी है जो अभी नहीं दिख रहा है?

3 thoughts on “पीएम और सीपीएम

  1. कम्युनिस्टों के भरोसे जनतांत्रिक सरकार? इनका बस चले तो ये सारे देश को वेस्ट-बंगाल बना दें. इन्हें परमाणू समझौता पसंद नहीं… ये भी तो पता चले इन्हें उसमें क्या पसंद नहीं. क्या इन्हें परमाणू परिक्षण करने का शौक हैं. मेरे खयाल से एक परिक्षण ही ज़रुरत से ज्यादा है. Even one is too many. हम बात कर रहे हैं विध्वंसक तकनीक की. वो हमारे पास है.

    क्या अब हम मौका छोड़ देंगे विध्वंस की जगह विकास लाने का… क्योंकि कम्युनष्टों को अमरीका से एलर्जी है?

    इससे भी बुरा समझौता इनके बाप चीन के साथ होता तो कुत्ते की तरह दुम हिलाते आते ये लोग.

    इनकी देशभक्ती का इतिहास गवाह है, और भविष्य मर्सिया होगा.

    जय हिन्दुस्तान

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  2. भाजपा द्वारा परमाणु समझौते का विरोध तो समझ में आता है, किन्तु ये कम्युनिस्ट क्यों विरोध कर रहे हैं?

    जब भारत ने अपना दूसरा परमाणु परीक्षण किया था तब इन लोगों ने इसका नख-शिख विरोध किया था। जब अमेरिका से समझौता हो गया तो अब इनको परमाणु परीक्षण से प्यार हो गया? कहीं ये डर तो नही रहे कि भारत अमेरिका से घनिष्टता बनायेगा तो रूस और चीन में बैठे इनके आका इनको फटकार लगाना शुरू कर देंगे?

    इनको तो इरान, पाकिस्तान और फिलिस्तीन की चिन्ता पहले रहती है; भारत का हित तो वे उतना ही सोचते हैं जितना चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी।

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  3. मैं तो इनका विरोध देख देख कर इतना थक गया हूँ कि टिप्पणी करने की ताकत भी नहीं बची. अब आराम करता हूँ.

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