विद्वता और साधना के शिखरपुरूष

हिमालय की तराई में बसे ऋषिकेश के बाहरी हिस्से पशुलोक में एक बांध बना है. बांध के पास वीरभद्र रोड पर दर्जनों कुटियों का समूह दिखता है. मुख्य सड़क से अंदर जाने के लिए एक पगडंडी बनी है. पगडंडी आपको जहां पहुंचाती है उसका नाम है स्वामी राम साधक ग्राम. इन्हीं कुटियों में से एक कुटिया उस महान साधक की है जिनके प्रयास से यह आश्रम अस्तित्व में आया है. कोई तामझाम नहीं, कोई आडम्बर नहीं और अगर कोई बताए नहीं कि स्वामी जी का निवास यही है तो आपको विश्वास भी नहीं होगा. क्योंकि आमतौर पर मुखिया के निवास में कुछ तो ऐसा विशिष्ट होना चाहिए जो उसके मुखिया होने का संकेत करे. लेकिन स्वामी वेदभारती की सहजता के आगे आडंबर कर मुखिया दिखनेवाली मानसिकता हार जाती है. स्वामी वेद भारती मुखिया हैं,और उन सबके मुखिया हैं जो धरोहर स्वामी राम उन्हें सौंपकर गये थे. लेकिन यह नेतृत्व चेतना के धरातल पर है. और इसी धरातल पर वे दुनियाभर में फैले अपने शिष्यों का मातृवत लालन-पालन करते हैं.

हिमालय की कंदराओं में विकसित योग परंपराओं को धारणकर लोकोपयोगी रूप में पूरी दुनिया में फैलानेवाले स्वामी वेद भारती ने आश्रम का नामकरण साधकग्राम के रूप में ही क्यों किया? विद्वता और साधना के शिखर पर बैठे ऐसे किसी महापुरूष के आश्रम का नाम सिद्धआश्रम होना चाहिए. फिर साधकग्राम क्यों? बिना इस छोटी सी बात को समझे स्वामी वेदभारती को समग्रता में नहीं समझा जा सकता. स्वामी वेदभारती अपने हर कर्म को गुरूकार्य मानते हैं. सिद्ध होकर गुरूकार्य नहीं किया जा सकता. गुरूकार्य पूरा करने के लिए सेवाभाव बहुत जरूरी है. और सेवाभाव तो साधक का अनिवार्य कर्तव्य है. इसलिए स्वामी वेद भारती आज भी साधक हैं और उनका आश्रम साधकग्राम.
संभवतः सहजता की यह विलक्षणता बहुत पहले स्वामी राम ने उषर्बुध आर्य में देख ली थी. 1969 में यही उषर्बुध स्वामी राम से मिले थे. और उसी समय स्वामी राम ने कहा था “ऋषिकेश का आश्रम आपको चलाना है.” स्वामी राम के शिष्यों को यह समझ में नहीं आया कि वे क्या कह रहे हैं. क्योंकि जिस ऋषिकेश के आश्रम की जिम्मेदारी स्वामी राम उषर्बुध आर्य को सौंप रहे हैं वहां जिम्मेदारी संभालने के लिए आश्रम है कहां? स्वामी राम जब विदेश से लौटे तो उन्होंने एक आश्रम बनाया. यहीं ऋषिकेश के पशुलोक में. वह आश्रम आज भी स्वामी राम के आभामंडल से ओत-प्रोत है. स्वामी राम के जाने के बाद स्वामी वेद भारती ने गुरूकार्य साकार करने के लिए अपना केन्द्र ऋषिकेश को बना लिया.
उषर्बुध का जन्म एक संस्कृतनिष्ठ परिवार में हुआ था. पांच साल की उम्र से उन्हें ध्यान-साधना की शिक्षा मिलने लगी थी. छह साल के उषर्बुध को पाणिनी के 4000 सूत्र कंठस्थ हो चुके थे. नौ वर्ष की उम्र में भगवद्गीता, उपनिषद और भारतीय दर्शन के छह अंगों का अध्ययन पूरा हो गया. अब समय था लोगों के बीच जाने का.और नौ वर्ष की उम्र से बालक उषर्बुध ने प्रवचन देना शुरू कर दिया. 1947 से 1952 के बीच वे देश के कई हिस्सों में गये और न केवल 15-20 हजार की सभा में प्रवचन किया बल्कि दर्शन पर उत्तर भारत के कई विश्वविद्यालयों ने भी उनकी विशेष कक्षाओं का आयोजन किया. 13 वर्ष की उम्र में एक लेख छपा जो बालक उषर्बुध पर नहीं विद्वान उषर्बुध पर था. 13 वर्ष की उम्र में ही उनके पैर देश की सीमाओं को लांघ गये. अब वे विश्वधरोहर हो गये थे. 1952-53 में केन्या, तंजानिया और युगाण्डा के भारतवंशियों के बीच यात्रा करने के पूर्व ही हरिद्वार और काशी के विद्वतजनों ने उषर्बुध को विद्वान की उपाधि दे दी थी. बचपन में विद्वता की उपाधि पानेवाले उषर्बुध उम्र के शिखर पर पहुंच कर स्वामी वेद भारती साधक हो गये, सेवक हो गये. मन में एक सवाल उठता है कि असाधारण क्या है? वही न जो जीवन के विपरीत ध्रुवों पर मान्यताओं के विपरीत आचरण करता है. सिद्धि भी यही है.

स्वामी वेदभारती विद्वता और साधना का संगम हैं. परा और अपरा के मध्य सेतु हैं. लौकिक और पारलौकिक के द्रष्टा हैं. स्वामी श्री कहते हैं हमारे और परमसत्ता के मध्य कोई और बाधक नहीं है. हमने खुद हजार तरह की रूकावटें खड़ी कर रखी हैं. वे इस बात की चिंता शायद ही कभी करते हों कि चुनौतियां क्या हैं? उनकी चिंता है इन चुनौतियों से निपटने के जो उपकरण हैं वे लोगों को पता हैं या नहीं? शायद इसीलिए वे अपनी बात दो मिनट के ध्यान से शुरू करते हैं और दो मिनट के ध्यान पर खत्म करते हैं. वे जहां जाते हैं दो मिनट का ध्यान जरूर करवाते हैं. बातचीत में भी बार-बार दो मिनट के ध्यान की ओर आपका ध्यान खींचते हैं. संभवतः मानवता के सामने आज जो चुनौतियां आ खड़ी हुई हैं उसपर बहस करने से वे दूर नहीं होगी. उन समस्याओं का उपाय बताना होगा. रोग पर बात करने से रोग खत्म नहीं होता. रोग खत्म होता है रोग का इलाज करने से. स्वामी वेद भारती ध्यान को मनुष्य की हर समस्या का समाधान मानते हैं. उनका स्पष्ट मत है ज्ञान पर बहस की जरूरत नहीं है. जरूरत है उस साधना की जिससे ज्ञान का उद्भव होता है. आज की मानवीय बुद्धि ज्ञान पर लंबी बहस भले ही कर ले लेकिन ज्ञान प्राप्ति की साधना के लिए समय नहीं निकालता. तो क्या दो मिनट का ध्यान मनुष्य के लिए ज्ञान की साधना है?

स्वामी वेद भारती कहते हैं कि बुद्धि का स्वभाव है कि हम बार बार जो कुछ उसे स्मरण करवाते हैं वही उसकी स्मृति बन जाती है. इसलिए बार-बार अगर हम दो मिनट के ध्यान का अभ्यास करते हैं तो अपने आप हमारी अंतर्यात्रा शुरू हो जाती है. हम अपने मूल केन्द्र की ओर बढ़ने लगते हैं. एक बार यह यात्रा शुरू होती है तो मनुष्य की मनोगत समस्याओं का समाधान अपने आप हो जाता है. यह हमें ही अनुभव करना होगा कि हमारी अधिकांश समस्याएं मनोगत हैं. जैसे-जैसे हम मनोगत समस्याओं से उबरने लगते हैं हमारे चित्त का दर्पण साफ होने लगता है. इसका बहुत ही सकारात्मक असर हमारे शरीर पर होता है. मन की ग्रंथियां शिथिल होती हैं तो शरीर के रोग भी विदा होने लगते हैं. स्वामी वेदभारती यह कहते ही नहीं इसे अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं में सिद्ध करके दिखाया भी है.
बुद्धि से आगे चेतनाशक्ति की असाधारण क्षमताओं का उपयोग करके क्या कुछ किया जा सकता है स्वामी वेद भारती इसके सजीव उदाहरण हैं. दुनियाभर की 17 भाषाओं में धाराप्रवाह रूप से लिखते-पढ़ते और बोलते हैं. स्वामी वेदभारती ने दुनिया की लगभग हर संस्कृति का गहराई से अध्ययन किया है. दुनिया की संस्कृतियों का इतनी बारीकी से अध्ययन औऱ विश्लेषण करनेवाला दूसरा विरले ही मिलेगा. उन्होंने दुनिया के हर छोटे-बड़े धर्म संप्रदाय और उनकी रीति-नीति का अध्ययन किया है. उन्होंने जिन लोगों को ध्यान की शिक्षा दी है उनमें हिन्दू, ज्यू, बौद्ध, मुसलमान, ईसाई और सिक्ख सभी शामिल है. ध्यान की इस शिक्षण प्रक्रिया में किसी भी मतावलंबी की मूल धारणा को बदले बिना स्वामी वेदभारती ध्यान की शिक्षा और मंत्र दीक्षा करते हैं. स्वामी वेदभारती ईसाई धर्म के ध्यान परंपरा का गहराई से अध्ययन किया है और अपने ईसाई शिष्यों की दीक्षा में उनकी मूल भावना को कभी विचलित नहीं करते. स्वामी वेद भारती के लगभग 40 घंटे से ज्यादा के प्रवचन उपलब्ध हैं जो उन्होंने ईसाई ध्यान पद्धतियों पर दिये हैं.

इसी तरह जरथ्रुस्त की शिक्षा में ध्यान की विधियों पर स्वामी वेदभारती न केवल उपदेश करते हैं बल्कि जरथ्रुस्त समुदाय के लोगों को उसी विधि में दीक्षित भी करते हैं. प्राचीन ग्रीक, तेरावाद, जेन सहित पूरब और पश्चिम की ध्यान विधियों पर स्वामी वेदभारती लगातार लिखते-बोलते रहते हैं. स्वामी वेदभारती एक साथ 2 लाख लोगों को ध्यान में उतार सकने की सिद्धि रखते हैं. परिस्थिति चाहे जैसी हो, समय कोई भी हो.

समय-यात्रा
1947-1952 उत्तर भारत में भ्रमण. विभिन्न कालेजों और विश्वविद्यालयों में प्रवचन.
1952-1953 भारतीय समुदाय के लोगों के निमंत्रण पर तंजानिया, युगाण्डा और केन्या की यात्रा. इस काल में पूर्वी अफ्रीका में अप्रवासी भारतीयों का इतिहास लिखा.
1953-1956 आध्यात्म और दर्शन पर इंग्लैण्ड में जगह-जगह प्रवचन.
1956-1962 दक्षिण अमेरिका के गुयाना, सूरीनाम और त्रिनिडाड की यात्रा. गुयाना में एक आश्रम की स्थापना जिसके माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में विद्या का प्रचार.
1962-1965 इंग्लैण्ड की यात्रा.
1965-1967 बीए (आनर्स) एमए और डीलीट की उपाधि प्राप्त की.
1967-1973 मिनिसोटा विश्वविद्यालय संस्कृत और भारतीय धर्म की अध्ययन सामग्री तैयार की. इसी दौरान 1972 में मिनिसोटा विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद प्रोफेसर से सम्मानित किया. विश्वविद्यालय के काम-काज के साथ श्री स्वामीजी ने अपनी यात्राओं को भी जारी रखा. फीजी, मारिसस, पूर्वी अफ्रीका और दक्षिण भारत की यात्राएं की.
1969 स्वामी राम से मुलाकात
1970 स्वामी राम ने योग-दीक्षा दी. इसी साल मीनियापोलिस(अमेरिका) में स्वामी वेद भारती ने ध्यान केन्द्र की स्थापना की और अमरीका स्थित हिमालयन इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट आफ योग साईंस एण्ड फिलॉसफी का संविधान तैयार किया. और स्वामी राम के साथ मिलकर अध्यापन शुरू किया.
1973 स्वामी राम के कहने पर विश्वविद्यालय से त्यागपत्र दे दिया. और पुनः विश्वभ्रमण और आध्यात्मिक प्रचार-प्रसार के कार्य में लग गये.
1981 स्वामी राम ने उन्हें अपने ऋषिकेश आश्रम का अध्यक्ष नियुक्त किया.
1996 नवंबर में स्वामी राम की महासमाधि के बाद स्वामी श्री को स्वामी राम आश्रम का उत्तराधिकारी घोषित किया गया. तब से वे लगातार साधकों का मार्गदर्शन कर रहे हैं.
1999 महामंडलेश्वर की उपाधि से विभूषित.
2002 ऋषिकेश में ही एक अन्य आश्रम स्वामी राम साधक ग्राम की स्थापना की. साधक ग्राम में कई तरह की गतिविधियों से ध्यान-योग और दर्शन पर अध्ययन, अध्यापन और अनुसंधान कार्य चल रहे हैं.
2007 साधना और शिक्षण के साठ वर्ष पूरे किये.

स्वामी वेद भारती की पुस्तकें, आडियो
योग सूत्र आफ पतंजलि (दो खण्ड)
लाईट आफ टेन थाउजेन्ट सन्स
सबटलर दैन द सबटल
सुपरकांसेस मेडिटेशन
फिलासफी आफ हठ योगा
मेडिटेशन एण्ड द आर्ट आफ डाईंग
गॉड
महाभारत भीष्म
पेरेनियल साइकालजी आफ भगवदगीता
मंत्र एण्ड मेडिटेशन
योगी इन द लैब

इसके अलावा साधकों के उपयोग के लिए स्वामी वेद भारती ने कई छोटी-छोटी पुस्तिकाएं लिखीं है. स्वामी वेद भारती ने ध्यान और दर्शन पर जो प्रवचन किये हैं उसके लगभग 3000 घंटे का आडियो कैसेट अब उपलब्ध है. पतंजलि योग सूत्र पर ही 120 कैसेटों का एक सेट तैयार किया गया है. इसके अलावा लगभग 100 कैसेट में योग शिक्षण, ध्यान शिक्षण और चिकित्सा से संबंधित विवरण उपलब्ध है. उनके द्वारा लिखे गये लगभग 40 हजार पृष्ठों का दूसरी भाषाओं में अनुवाद का काम भी चल रहा है.

कुछ महत्वपूर्ण स्थान जहां स्वामी वेद भारती ने प्रवचन किया है
स्वामी वेदभारती अमरीका, यूरोप, भारत और चीन सहित दुनिया के विभिन्न विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों, चर्चों, और शोधसंस्थानों में व्याख्यान दे चुके हैं.
भारतीय विद्या भवन, लंदन और बंगलौर
नेहरू सेंटर, लंदन
संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्यालय
विश्वधर्म संसद, केपटाऊन (2000) और बर्सिलोना (2004)
शेक्सपियर ग्लोब थियेटर
साईट फॉर प्लेटो अकादमी, एथेंस
इजरायल और फिलीस्तीन(2004)
बुर्किनाफासो में अफ्रीका और भारत में आध्यात्म विषय पर संवाद(2002)
ऊता, साल्टलेक सिटी में बिशप ओटिस के साथ संवाद
चीन में ताओइस्ट एसोसिएशन के साथ संवाद
केलाग स्कूल आफ मैनेजमेन्ट, शिकागो
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर, राट्रेडैम, हालैण्ड
कामनवेल्थ क्लब, सैन फ्रांसिस्को
इंस्टीट्यूट आफ नोएटिक साइंसेस, कैलिफोर्निया
इंडस्ट्रियल सोसायटी ग्रुप, लंदन
यूनेस्को इंस्टीट्यूट आफ हाइड्रोलिक इंजिनियरिंग, हालैण्ड

संपर्क
स्वामी राम साधक ग्राम
वीरपुर खुर्द, वीरभद्र रोड
पोष्ट-पशुलोक
ऋषिकेश, 249203
उत्तराखंड
फोनः 0135 2453447, 2452978, 2450093
ईमेल- ahymsin@gmail.com

स्वामी राम का आश्रम
साधना मंदिर
पोष्ट-पशुलोक
ऋषिकेश, 249203
उत्तराखंड
फोनः 0135 2431485, 2435799
ईमेल- sadhanamandir@vsnl.com

उत्तर अमेरिका में
द मेडिटेशन सेंटर,
631, यूनिवर्सिटी एवेन्यू, एनई
मिनियापोलिस, एमएन 55413, यूएसए
ईमेल- info@themeditationcenter.org

यूरोप में
हिमलायन योगा मेडिटेशन(नीदरलैण्ड) सोसायटी
ईमेल- hymns@euronet.nl

पूर्वी एशिया में
हिमालयन सेंटर फॉर योगा मेडिटेशन आफ सिंगापुर
ईमेल- wyoongk@singnet.com.sg

स्वामी वेद भारती से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण वेबसाईट
http://www.swamiveda.org/
http://www.bindu.org/
http://www.themeditationcenter.org/
http://www.youtube.com/user/SwamiVeda

6 thoughts on “विद्वता और साधना के शिखरपुरूष

  1. ek aisee jankari jiski awaeskta thee,
    maza aa gya.
    khaskar es dhum-dharake wali life-style me aise jankari ki awaeskta hai.
    Girindra
    9868086126

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  2. इस लेख द्वारा एक महान हस्ती के बारे में जानने का मौका मिला. भारत के महान लोगों के प्रति ध्यान खीचने के लिये इस तरह लिखते रहें — शास्त्री जे सी फिलिप

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
    http://www.Sarathi.info

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  3. दो मिनट का ध्यान और उसे ‘आदत’ बनाने वाली बात बहुत पसन्द आयी।

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  4. स्‍वामी वेद भारती को नमन.

    आपका आभार एवं साधुवाद इस जानकारी भरी पोस्ट के लिये.

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