मदनोत्सव की यह भाषाई पुकार

कोई यह कहे कि मैं साहित्य का विरोधी हूं तो मुझे इस पर सख्त एतराज होगा. मैं भी साहित्य का वैसा ही रसिक हूं जैसे आप हैं. इलाहाबाद से लेकर बंबई तक कई रातें कवि सम्मेलनों में गुजारी हैं और तुलसीदास जी ही नहीं मुंशी प्रेमचंद और श्रीलाल शुक्ल के लिखे को इबादत की तरह पढ़ता हूं. मेरे लिए साहित्य उर्जा का का स्रोत है. लेकिन वह उर्जा ग्रहण करने के बाद मैं अपने कार्य में लग जाता हूं. उस उर्जा को कभी अपने ऊपर ग्रहण नहीं बनने देता. श्रीलाल शुक्ल जी का एक व्यंग्य संग्रह छपा है. जहालत के पचास साल. मैं राजकमल प्रकाशन गया और अशोक माहेश्वरी से मैंने कहा मुझे यह किताब पढ़नी है. उन्होने कहा ले जाओ. मैंने कहा पैसा देकर पढ़ना है लेकिन आपने 350 रूपये कीमत रखकर अच्छा नहीं किया. कूड़ा करकट बिके 10-20 रूपये में और जिस साहित्य को सबको पढ़ना चाहिए उसकी कीमत 350 रूपये. मुझे तो उन्होंने छूट दे दी लेकिन यह छूट कितनों को मिलेगी? आज भी मन बोझिल होता है तो श्रीलाल शुक्ल की वही किताब उठा लेता हूं. कुछ न कुछ ऐसा पढ़ने को मिल जाता है कि खिलखिलाकर हंसी छूट जाती है. क्या ऐसे साहित्य का विरोधी कोई हो सकता है? लेकिन मन हल्का हुआ तो फिर? मैं भी साहित्य लिखूं?
मुझे यह गवारा नहीं. साहित्य जन्मजात स्वभाव होता है और प्रारब्धवश प्रकट होता है. लेकिन दूसरी ओर नरेन्द्र मोहन के बारे में उनके एक कर्मचारी पत्रकार ने टिप्पणी की थी कि वह कैसी कविता है जो हर रविवार को ही पैदा होती है और उनके अपने अखबार के रविवारी पन्ने पर छप जाती है. साहित्य बोध न कराए तब बोझ है. मेरा आशय यही है. बड़े भाई अनूप शुक्ल की टिप्पणी आखिर में आयी है कि लगता है मैंने यह पोस्ट जल्दबाजी में लिखी है. और लिखते हैं”साहित्य अगर समृद्ध है तो वो रोजी-रोटी के अवसर कम करेगा-यह समझ नहीं आता।”
अनूप भैया इसका एक कारण तो मुझे यह समझ में आता है कि प्रकाशन और प्रसार दोनों साहित्य लेखन के छापन में डूब गये. कामकाजू और समसामयिक विषयों पर हिन्दी में लिखा जाए इसकी कभी चिंता ही नहीं की. इसके लिए किसी एक व्यक्ति को दोषी नहीं कहा जा सकता. लेकिन प्रकाशक भी गलत थे. मैं दरियागंज में रहता हूं जो कि प्रकाशकों का अड्डा है. आज हर प्रकाशक साहित्य प्रकाशन के बोझ से उबरना चाहता है. मेरी जो बात होती है वह बता रहा हूं. वे अन्य विषयों पर किताब छापना चाहते हैं. लेकिन उनको वही फल खाने को मिल रहा है जिसका बीजारोपड़ किया था. मीडिया के अलावा लेखकों का टोटा पड़ा हुआ है. समसामयिक विषयों पर लिखनेवाला कोई मिलता नहीं और अब कुछ प्रकाशकों ने अनुवाद करके अब तक “त्यज्य” समझेजानेवाले विषयों पर किताब छापना शुरू किया है. भाषा प्रेम के कारण नहीं बाजार ने मजबूरी पैदा कर दी है. लंबे साहित्यिक राजनीति का दुष्परिणाम कोई और नहीं प्रकाशक खुद भुगत रहे हैं.
जैसा कि आमतौर पर होता है श्रीश की टिप्पणी लगभग आखिर में ही आती है. वे पूछते हैं “लेकिन क्या देखता हूँ कि यहाँ डॉक्टर से लेकर सॉ्फ्टवेयर इंजनियर तक कविता करने में लगे हैं।” विकल्प रजनीश मंगला देते हैं “रोने धोने से भी कुछ नहीं होगा। हिन्दी को एकबार तो खुद को साबित करना ही होगा कि वो विज्ञान, तकनीक, शोध के लिए उपयुक्त भाषा है, बातों से नहीं यथार्थ में।” ऐसे में यह सवाल तो लाजिमी है कि हिन्दी के असंख्य साहित्यकारों के बीच एक ही गुणाकर मुले क्यों पैदा होते हैं जो विज्ञान पर काम करते हैं?
भाषा जब पेट भरने के साधन पैदा कर देगी तो साहित्य और कविता दोनों मुझे मदनोत्सव में ले जाने के लिए स्वतंत्र हैं और तब शायद मैं भी कविता करूंगा. अभी मदनोत्सव की यह भाषाई पुकार मुझे रास नहीं आ रही क्योंकि भाषा के सामने अस्तित्व की चुनौती है. मेरी आंखों के सामने वे सैकड़ो नौजवान है जो सिर्फ इसलिए खारिज हो जाते हैं क्योंकि उन्हें अंग्रेजी नहीं आती. ऐसे युवक लाखों करोड़ो हैं लेकिन सैकड़ों से मैं मिलता हूं इसलिए उन्ही का उद्धरण दे रहा हूं. जब वे गिटपिट अंग्रेजी बोलने की बजाय अपनी भाषा में पढ़लिख कर, काम कर रोटी और सम्मानबोध दोनों प्राप्त करने लगेंगे तब शायद भाषा और हमारा दोनों का अस्तित्व बचेगा. अंग्रेजी और अंग्रेजियत की मानसिकता के दौर में पैदा जरूर हुआ हूं लेकिन इस अंग्रेजी और अंग्रेजियत के प्रभुत्व और गुलामी के बीच मरना नहीं चाहता. आशा करता हूं कि जब मेरा आखिरी वक्त आयेगा तब तक हिन्दी सहित भारतीय भाषाएं अंग्रेजी को उसकी औकात बता चुकी होंगी. यह भावावेग नहीं, सपना है.
इसलिए भाषा पर नहीं भाषा में बहुत काम करने की जरूरत है. तिल-राई भर कर सका तो अपना काम हो गया. बाकी रामजी की इच्छा.

7 thoughts on “मदनोत्सव की यह भाषाई पुकार

  1. कूडा कर्कट बिकेगा
    द्स रुपैया मे,
    बौद्धिक साहित्य बिकेगा
    पांच सौ रुपिया मे.
    विधि रहेगी यह हिन्दी की,
    जब तक छापाजगत में
    राज करेगी
    फिरंगी की भासा !!

    — शास्त्री जे सी फिलिप

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
    http://www.Sarathi.info

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  2. अच्छा है। पिछली पोस्ट में भी हमने साहित्य विरोधी न समझा था भैये आपको। हमने अपनी समझ से बताया था कि हम जहां हैं वहीं से शुरू करके नेट पर हिंदी को समृद्ध करने के लिये लेख लिखने शुरू करें। विकिपीडिया भी एक जरिया है। इसके लिये मैंने लेख लिखा था
    http://hindini.com/fursatiya/?p=195
    साथ में रमानाथ अवस्थीजी की कविता भी:
    कुछ कर गुजरने के लिये
    मौसम नहीं, मन चाहिये!

    हिंदी के बारे में आपके देखे सपने साकार हों।

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  3. आपके सपने में मेरा भी सपना शामिल है।
    और इस सपने को “हम” पूरा होता देख कर ही जाएंगे!!
    इसे पूरा करने के लिए कोशिश भी “हमें” ही करनी है!!

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  4. आप जो सपना देख रहे हैं ।उसे पूरा होना ही चाहिए।आप ने बिल्कुल सही लिखा कि जो अग्रेजी नही जानते उन के बारे मे कहा-

    ” वे सैकड़ो नौजवान है जो सिर्फ इसलिए खारिज हो जाते हैं क्योंकि उन्हें अंग्रेजी नहीं आती. ऐसे युवक लाखों करोड़ो हैं लेकिन सैकड़ों से मैं मिलता हूं इसलिए उन्ही का उद्धरण दे रहा हूं. जब वे गिटपिट अंग्रेजी बोलने की बजाय अपनी भाषा में पढ़लिख कर, काम कर रोटी और सम्मानबोध दोनों प्राप्त करने लगेंगे तब शायद भाषा और हमारा दोनों का अस्तित्व बचेगा.”

    यह बात बिल्कुल सच है। क्यूँकि हम भी उन मे से एक हैं जो अग्रेजी ना आने के कारण,कभी भी अपनी बात ऊँची आवाज मे नही कह पाएं और अपने ही देश में सब से पीछे खड़े रह गए।

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  5. आपका स्वपन यथार्थ मे बदलेगा. आईये, हम सब अपने अपने हिस्से का कार्य करें. जल्द ही वह दिन आयेगा. शुभकामना.

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  6. मैंने कहा पैसा देकर पढ़ना है लेकिन आपने 350 रूपये कीमत रखकर अच्छा नहीं किया. कूड़ा करकट बिके 10-20 रूपये में और जिस साहित्य को सबको पढ़ना चाहिए उसकी कीमत 350 रूपये

    jante hain..kai raseek to bus isee karan nahi padh pate hain..
    main to kai baar kitaab ke dukan se issee karan lauta hun ki jeb jabaab de deti hai..
    sawal zabar dast hai..
    aap log sayaad kuch upaay kar payen to meharbanii hogee.
    Girindra
    9868086126

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