खुदरा व्यापार, मिथक और यथार्थ

खुदरा व्यापार पर मेरी पिछली पोस्ट के बारे में रंजन भाई ने सवालों का गुलदस्ता भेजा है. उनके सवालों का मैं आभारी हूं क्योंकि इसी बहाने मैं उन सवालों का जवाब दे सकता हूं जो अक्सर कईयों के मन में उठते हैं. पहले रंजन के सवाल –

क्या रिटेल का व्यापार करना गुनाह है? गैर कानुनी है? प्रर्दशन करना है तो सरकार के खिलाफ करो, तोड फोड क्यों..? अगर गैर कानुनी है तो पुलिस / अदालत जाओ, तोड फोड क्यों..? राची मे, इंदोर मे भीड ने तोड फोड कि, क्यों… आपकी तस्वीर दर्दनाक है, लोकतन्त्र मे हिसां पर उतारु भीड क्या सलुक करना चाहिये ?

सबसे पहला और मौलिक सवाल क्या बंड़ी कंपनियों द्वारा रिटेल का व्यापार करना गुनाह है? अगर बड़ी कारपोरेशन रिटेल के कारोबार में उतरती हैं तो ऐसा क्या अनघा टूटेगा कि हम चिल्लाए जा रहे हैं कि इसे बंद करो. एक आम उपभोक्ता चाहता है कि रिटेल के कारोबार में बड़ी कंपनियां उतरें जिससे प्रतिस्पर्धा का माहौल बने और उसे लाभ मिले.

यथार्थ यह है कि उपभोक्ता आम नहीं होता. वर्तमान आर्थिक प्रणाली में आम आदमी उपभोक्ता है ही नहीं. उपभोक्ता एक खास वर्ग होता है जो पूंजी प्रवाह के मध्य या फिर परिधि में खड़ा होता है. (अभी तक भारत में खुदरा बाजार का जो हिस्सा संगठित कारोबारियों के हाथ में है उसका 82 प्रतिशत कारोबार देश के छह बड़े मेट्रो में होता है.) खुदरा कारोबार का वर्तमान माडल भारतीय उपभोक्ता के स्वभाव से भी मेल नहीं खाता. बचत संस्कृति जिसके भरोसे हम अपनी तथाकथित गरीबी में भी अपने मुताबिक जी सकते हैं वह संस्कृति हमारी बहुत बड़ी पूंजी है. बाजार के प्रति हमारा व्यवहार है जरूरत का सामान खरीदना. जबकि नये खुदरा व्यापार की रणनीति है सामान खरीदकर जरूरत का निर्माण करना. यह हमारे बाजार व्यवस्था और उनके बाजार व्यवस्था का मूलभूत फर्क है. फिक्की द्वारा जारी इंडिया रिटेल रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि रिटेल को सफल व्यवसाय बनाने के लिए जरूरी है कि चार स्तरों पर कार्य किया जाए. इसमें सरकार में लाबिंग, उत्पादन पर अधिकार, ढांचागत अतिक्रमण के साथ-साथ यह भी कहा गया है कि भारतीय उपभोक्ताओं में खर्च करने की प्रवृत्ति नहीं है. भारतीय खर्चीले हों इसलिए अरबों रूपये खर्च करने की योजनाओं पर कार्य करने की जरूरत है.

मिथक
दुनिया में सबओर अगर रिटेल का कारोबार सफल है तो भारत में विरोध क्यों जबकि यह इतना बड़ा बाजार है कि यहां सबको स्थान मिल सकता है.

यथार्थ
अमेरिका, यूरोप का उदाहरण लेने की जरूरत नहीं है. दिल्ली में पिछले महीने हुए सर्वे बताता है कि जहां रिलांयस फ्रेश स्टोर खुला वहां की दुकानदारी पर फर्क पड़ा है. पूरी रिपोर्ट पढ़ें. फिर भी हमें एक बात नहीं भूलना चाहिए. आमतौर पर व्यापारी वर्ग देश में किसी भी प्रकार के व्यवस्थागत बदलवाल में न्यूट्रल रहता है. इस बार ऐसा नहीं है. जगह-जगह जो प्रदर्शन हो रहे हैं वे व्यापारी वर्ग ही आयोजित कर रहे हैं और रेहड़ी तथा छोटे दुकानदार उनके साथ शामिल हैं.

मिथक
उपभोक्ता की चांदी हो जाएगी.
यथार्थ
उपभोक्ता के सामने शुरूआत में भले ही विकल्प दिखें लेकिन केन्द्रीकरण के बढ़ते ही कंपनियों द्वारा उपलब्ध करवाई जा रही सुविधा जी का जंजाल बन जाती है. जिन सेवाओं को नब्बे के दशक में खुले बाजार में छोड़ दिया गया था उनका क्या हाल है? क्यों आज उपभोक्ता अदालतों में सबसे ज्यादा टेलीफोन कंपनियों और निजी लोन बांटनेवालों के खिलाफ शिकायतों का अंबार लगा हुआ है? खुले बाजार का फायदा उठा रहे लोग उपभोक्ता अदालत क्यों पहुंच गये? इसका मतलब है बाजार प्रभावी हो तो वह उपभोक्ता का शोषण करता है. अमरीका और यूरोप में यह समस्या शायद इतनी जटिल न हो क्योंकि खुलेपन की यह बंद अर्थव्यवस्था 300 साल में “विकसित” हुई है. इसलिए सामाजिक ढांचा शायद पहले ही चरमारा चुका है और जो हो रहा है उसे यथार्थ मानकर स्वीकार कर लें. खामियों के बावजूद भारत एक जीवंत सामाजिक व्यवस्था है. हम यह पागलपन क्यों करें?

मिथक
बिचौलिये खत्म होंगे तो चींजे सस्ती होंगी

यथार्थ
फिक्की ने जो रिपोर्ट प्रकाशित की है उसमें सबसे बड़ी चुनौती है आधारभूत ढांचा, संचालन खर्च और मानव संसाधन. यानि बड़ी रिटेल कंपनियों को पता है कि अपने लावलश्कर के साथ वे सामान को उतने सस्ते में नहीं बेंच सकते जिसका कि दावा कर रहे हैं. कास्ट कटिंग मेजर अपनाने के उपाय अभी से सोचे जा रहे हैं जबकि बड़ी कंपनीयों द्वारा ठीक से शुरूआत भी नहीं हुई है. यह बड़ा मिथक है कि मंडी व्यवस्था के कारण देश में मंहगाई है. अभी हम उस व्यवस्था का गुणगान और समर्थन कर रहे हैं जो आयी ही नहीं. अमरीका में रहनेवाले बंधु बताएंगे कि अगर अमरीका इतना महान है तो वहां फूड कूपन क्यों बांटे जाते हैं? कंपनियों के अपने कायदे-कानून होते हैं. बिचौलियों के कारण कई बार मिलावट और कालाबाजारी के मामले पकड़ में आते हैं लेकिन यह भी हकीकत है कि मंडी व्यवस्था और बिचौलियों के ही कारण देश का अन्न स्वराज अभी भी बहुराष्ट्रीय निगमों के हाथ में गिरवी नहीं है. अमरीका के 80 फीसदी से अधिक खाद्य उत्पाद और व्यवसाय पर कब्जा रखनेवाली करगिल और मोनसेंटों की तर्ज पर हम आईटीसी और रिलांयस क्यों खड़ा करना चाहते हैं जो हमारे अन्न स्वराज को खत्म कर दें?

मिथक
खुदरा कंपनियां ताजा माल बेचती हैं

यथार्थ
खुदरा कंपनियां कभी भी ताजा माल या ताजी सब्जियां नहीं बेंचती. यह तो उन सहकारी समितियों के लिए भी संभव नहीं था जो कोआपरेटिव आंदोलन से पैदा हुए थे. वे समितियां भी भंडारण पर अच्छाखासा धन खर्च करती है. फिर रिटेल कंपनियां तो उनसे भी दो कदम आगे हैं. कास्ट कटिंग मेजर पर काम करते हुए मुकेश अंबानी जामनगर के अपने बगीचों के आम अगर केरल ले जाना चाहेंगे या इलाहाबाद की मिर्च आसाम में बेचना चाहेंगे तो वह ताजा कैसे हो सकता है? रिलांयस 30,000 करोड़ का निवेश कर रहा है. यह पैसा कोई माल बनाने और हाईपर मार्केट खड़ा करने में खर्च नहीं हो रहा है. यह पैसा खर्च हो रहा है परिवहन व्यवस्था, भंडारण, अनुबंध और खरीद पर. बात साफ है रिलांयस फ्रेश में कभी भी कुछ भी फ्रेश नहीं होगा, हां वह फ्रेश दिखेगा जरूर क्योंकि कीटनाशकों ओर रसायनों का प्रयोग करके उसको फ्रेश लुक दे दिया जाएगा.

मिथक
किसानों और छोटे उत्पादकों को बेहतर मूल्य मिलेगा.

यथार्थ
मध्य प्रदेश के काटन बेल्ट का एक किस्सा बताता हूं जो एक किसान ने दिल्ली में एक प्रेस कांफ्रेस में बताई थी. खाद-बीज कंपनियों के प्रतिनिधि आये. उन्होंने किसानों को खाद, बीज, कीटनाशक दिया और यह आश्वासन भी कि फसल पैदा होने पर वे ही खरीदेंगे. फसल पैदा हुई लेकिन वे खरीदने नहीं आये. किसानों के सामने बड़ी मुश्किल. अंततः उन्होंने विरोध स्वरूप अपनी फसल जला दी. फिर आंदोलन छेड़ दिया लेकिन इन बातों का छोटे किसान के लिए कोई खास मतलब नहीं होता. अमरीका और यूरोप के किसान आंदोलन चला सकते हैं क्योंकि वे इतने ताकतवर हैं किसी भी कारपोरेशन से टकराने में सक्षम हैं. भारत में ऐसा नहीं है. यहां औसत किसान की जोत सवा एकड़ के आस-पास है. सवा एकड़ जोत का किसान सवा सौ करोड़ के रिलांयस से क्या टकराएगा?

अब वह आखिरी सवाल जो सवाल रंजन भाई कर रहे हैं कि कानून की सहायता लें, दंगा न करें. दिल्ली में सीलिंग चली तो कानून का ही पालन किया गया. बाद में क्या पता चला कि सीलिंग पर अड़े सुप्रीम कोर्ट के जज दिल्ली के बिल्डरों से पैसा खाकर बैठे थे. हाईकोर्ट के एक दूसरे जज जो सीलिंग पर हल्ला बोल रहे थे उनका लड़का पार्श्वनाथ बिल्डर में डायरेक्टर बना बैठा है. आप अदालतों को पवित्र गाय क्यों मानते हैं? अदालतों में मी लार्ड बना बैठा आदमी भी आदमी ही होता है. और कानून की मनमानी व्याख्या क्या हो सकती है इसका खामियाजा अब तक वे लाखों लोग भुगत चुके हैं जो किसी बड़ी कंपनी की सेवा लेते हैं और किसी कारणवश उनका कोई बकाया रह जाता है. अचानक आप देखते हैं आपके पास नोटिस आना शुरू हो जाता है. बात साफ है कानून उसके लिए है जिसकी जेब में पैसा है.

आखिरी बात. जो लोग विरोध कर रहे हैं वे हिंसा में उतारू भीड़ हमें इसलिए नजर आते हैं क्योंकि हम उनसे अपना कोई जुड़ाव नहीं रखते. वे भीड़ नहीं हमारे ही देश के नागरिक हैं. और उनको अपने तरीके से अपना विरोध दर्ज करने का अधिकार है. अगर आपके पेट पर कोई लात मारे, आपको अपने घर से बेघर करे, आपकी रोजी-रोटी छीन ले और यह सब वह कानून और प्रशासन की संरक्षण में करे तो आप बताईये आप क्या करेंगे?

वैसे रंजनभाई के सवाल का जवाब आप भी दे सकते हैं…..

5 thoughts on “खुदरा व्यापार, मिथक और यथार्थ

  1. अदालतें पवित्र गाय तो कतई नहीं है. इनकी कुरसियों पर भी आदमी ही बैठे हैं जो अपने टुच्चे स्वारथ के लिये फैसले सुनाते हैं.
    कानून तो बड़े आदमी की जेब में रहता है. न माने तो किसी भी दिन का अखबार देख लीजिये

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  2. बिलकुल सही जवाब दिये हैं संजय जी,
    एक उदाहरण मैं भी देना चाहूँगा जो कि मैं पहले भी सागर भाई की पोस्ट पर दे चुका हूँ – इन्दौर में एक दिन “बिग बाजार” में मंडी में आने वाले टमाटरों के सारे ट्रकों को हाथोंहाथ खरीद लिया, ऐसा दो-तीन दिन तक लगातार किया गया, सारे इन्दौर में टमाटरों की भारी किल्लत हो गई, टमाटर “बिग बाजार” के अलावा और कहीं नहीं मिल रहे थे, अब क्या “किशोर बियाणी” साहब मुफ़्त में टमाटर बाँटने के लिये बैठे हैं… यह है भविष्य में होने वाला असली खेल…

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