भविष्य का क्रूर साम्राज्यवादी- मुकेश अंबानी

मुकेश अंबानी का आहार बहुत सीमित है. दो-तीन चपाती और कुछ गुजराती सब्जियां, दालें वगैरह. वे केवल शाकाहारी नहीं है बल्कि सात्विक शाकाहारी हैं. उनके घर में आज भी भोजन कोई शेफ नहीं पकाता. भोजन पकाने के लिए महराज हैं. कह सकते हैं कि उनकी शारीरिक भूख वैसी है जैसी किसी एक सामान्य कामकाजी व्यक्ति की होती है. लेकिन वे एक सामान्य कामकाजी इंसान नहीं हैं. मुकेश अंबानी की इच्छाएं असीमित हैं. आज ही एक खबर देखी कि अब वे अपनी रेलगाड़ी चलाना चाहते हैं. क्यों? तो जवाब है कि रिटेल व्यवसाय में 10 हजार टन माल की आवाजाही में जो धन खर्च होगा उतना पैसा अगर अपनी रेल चलाने पर खर्च कर दिया जाए तो पूरी व्यवस्था हाथ में रहेगी. यानी भारत सरकार से ऐसा अनुबंध हो जाए जिसमें पटरियां सरकार की रहें लेकिन उसपर कंटेनरवाली ट्रेन रिलांयस की चले.

यह खबर बहुत कुछ कहती है अगर हम सुनना चाहे तों. यह खबर कहती है कि रिलांयस राज में दूसरों के लिए कोई जगह नहीं होगी. उत्पादन, भंडारण, परिवहन, बिक्री सबकुछ एक हाथ में होना चाहिए. रिलांयस रिटेल और एसईजेड के तहत खरीदी गयी जमीन में बहुत साम्य है. लंबी अवधि की रणनीति यह है कि खेती पर रिलांयस दो तरह से कब्जा करेगा. पहला तरीका है अनुबंधवाली खेती. पंजाब में इसकी शुरूआत हो चुकी है. खबर है कि एक लाख एकड़ जमीन रिलांयस अनुबंध के तहत हासिल करने की फिराक में हैं. इसे आप कांन्ट्रेक्ट फार्मिंग भी कह सकते हैं. लेकिन इससे भी ज्यादा मुफीद सौदा है अपनी खुद की खेती करना. मोटा-मोटा अनुमान है कि सीधे तौर पर मुकेश अंबानी के पास डेढ़ लाख एकड़ जमीन है. (ठीक आंकड़े मिलना मुश्किल है क्योंकि हर रोज इसमें कितने हजार एकड़ और शामिल हो रहे हैं कुछ पता नहीं.) और इस जमीन पर कोई भूमि सुधार कानून अथवा सीलिंग आदि लागू नहीं होता. तो कानूनी प्रश्रय में प्राप्त मुकेश अंबानी इतनी जमीन का करेंगे क्या?

जाहिर तौर पर वे कोई उद्योग नहीं लगाएंगे. क्योंकि एसईजेड एक्ट के तहत कुल अधिगृहित जमीन का मात्र 15 प्रतिशत हिस्सा उद्योग के लिए आरक्षित होगा. रिलांयस का गुड़गाव वाला प्लान मैंने देखा है. ठीक से तो कुल अधिगृहित जमीन का सात प्रतिशत भी उद्योग के लिए आरक्षित नहीं है. तो मुकेश अंबानी खेती करेंगे. बची खुची जमीन पर रियल एस्टेट का कारोबार होगा. क्योंकि आनेवाले समय में जमीन से जुड़े कारोबार ही शीर्ष पर रहेंगे फिर चाहे वह खेती हो या रियल एस्टेट का निर्माण. मुकेश अंबानी रिलांयस के लिए भविष्य की तैयारी कर रहे हैं.

उनकी इस असीमित भूख के पीछे करगिल और मोनसेंटों जैसी अमरीकी कंपनियों की प्रेरणा है जो अमरीकी खाद्य कारोबार के नब्बे फीसदी से भी अधिक पर काबिज हैं. भारत का विकास इसी तरीके से होता रहा तो आनेवाले समय में भोजन, पानी, स्वास्थ्य और आवास ही व्यवसाय के केन्द्र में होंगे. इन क्षेत्रों में जो व्यवसाय कर रहा होगा उसका भविष्य निर्विवादरूप से उज्वल होगा. क्योंकि इन सेक्टरों पर जिस कंपनी का कब्जा होगा सबसे अधिक मुनाफे वाली कंपनी वही होगी. मुकेश अंबानी दूर की कौड़ी फेंक रहे हैं. इस लिहाज से वे दूरद्रष्ट्रा व्यवसायी हैं. लेकिन आप नैतिकता, गांधी, भारतीयता, मानवता आदि शब्दों में उलझे तो मुकेश अंबानी आपको भविष्य के क्रूर साम्राज्यवादी नजर आयेंगे. जो सरकार को सबसे ज्यादा टैक्स देता है, गरीबों के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं चलाता है, धर्म, राजनीति और जनवादी संगठनों के ठेकेदारों को चंदा वगैरह देता है, संपादकों और मीडिया मालिकों को खबर के साथ-साथ और भी बहुत कुछ देता है. इसलिए मुकेश अंबानी के बिना भारत की कल्पना करना मुश्किल होगा. हां तब शायद आप भूल जाएंगे कि मुकेश अंबानी की इस दरियादिली के लिए देश को क्या कीमत चुकानी पड़ी है. क्या हम अपना रिलायंसी भविष्य देख पा रहे हैं?

4 thoughts on “भविष्य का क्रूर साम्राज्यवादी- मुकेश अंबानी

  1. दोस्त रोक सको तो रोक लो.

    अच्छे-बुरे परिणाम आयेंगे.

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  2. पेट की भूख शारीरिक परिश्रम करनेवाले की ज्यादा बड़ी हो सकती है,पर असीमित फ़ायदे की भूख — सामाजिक चेतना से विमुख अधिकाधिक लाभ का उन्माद — जिसके दिल-दिमाग में हमेशा छाया रहता है,उससे सावधान रहने की ज़रूरत है .

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  3. इच्छाएं तो सभी की असीमिति ही हैं.कोई पूरी कर पाता है और कोई नहीं….

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  4. तिवारी जी
    तथाकथित “धीरूभाईज्म” जो मैनेजमेंट छात्रों को पढाया जा रहा है, वह यही है – अपने प्रतिद्वंद्वी को निर्ममता से कुचलो, सांसद-विधायक-पार्षद जो बन सके खरीदो (अधिकारी अपने-आप बिकने को तैयार हो जायेंगे), फ़िर मनमर्जी से कानून की धज्जियाँ उडाओ, मीडियाकर्मियों को उपहार-दारू आदि देकर अपनी जेब में रखो, बस जीत तुम्हारी है, भाड़ में गई नैतिकता, सच्चाई, ईमानदारी… कोई मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति भी बता सकता है कि अकूत सम्पत्ति इन तीनों बातों को कब्र में डाल देने के बाद ही मिलती है…

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