हमारे अज्ञान की जड़े गहरी हैं

समाज और राज्य की अलग-अलग भूमिका और इन दोनों के आपसी संबंध हमेशा दार्शनिक बहस का मुद्दा रहे हैं. इस विषय पर पश्चिमी चिंतन बहुत सीमित अनुभूतियों और अवधारणाओं पर टिका हुआ दिखता है. पश्चिमी दर्शन के मूल में या तो किसी समाज के किसी दूसरे द्वारा जीत लिये जाने का कोई ऐतिहासिक तथ्य होता है या यूरोप में प्राचीनकाल से नागरिकों और गुलामों के बीच स्थापित हुए रिश्तों की अवधारणा या फिर यह सिद्धांत कि जिनके हाथों में उत्पादन और विकास के साधन होते हैं वही राज्य को चलाया करते हैं.

लेकिन भारत में राज्य की कल्पना कुछ अलग अवधारणाओं पर आधारित रही है. व्यक्ति को केन्द्र में रखकर फैलते राज्य की अवधारणा की चर्चा अक्सर गांधी जी किया करते थे. गांधी जी को इस सहज भारतीय अवधारणा की कल्पना थी. उन्होंने भारतीय इतिहास में बहुत खोजबीन कर यह निकाला होगा. लेकिन भारत के इतिहास पर आजकल हो रहे शोध से गांधीजी की भारतीय समाज के बारे में सहज समझ की पुष्टि दिखायी दे रही है. दो सदियों के ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय समाज और राज्य के आपसी रिश्ते बिल्कुल छिन्न-भिन्न हो गये. उत्तर और पश्चिम भारत के बहुत सारे हिस्सों में तो राज्य के समाज से अलग पड़ने की प्रक्रिया इन इलाकों के मुस्लिम शासकों के अधीन आने के साथ ही शुरू हो गयी थीं. बहुत हद तक मुस्लिम शासकों के तौर-तरीके गैर भारतीय अवधारणाओं पर आधारित थे. मुस्लिम शासित इलाकों में राज्य और समाज के आपसी रिश्तों के टूटने से दोनों एक दूसरे से अलग होकर एक दूसरे को किसी तरह झेलते हुए दोनों का ही विकास अवरूद्ध हुआ.

भारत के यूरोप से हारने और भारतीय समाज के यूरोपीय अधिपत्य में आने का बड़ा कारण राज्य और समाज की यही कमजोरी रही होगी. लेकिन भारत पर यूरोप की जीत का असल इससे कहीं ज्यादा गहरा था. यह ठीक है कि यूरोप के लोगों ने हमारी सभ्यता और हमारे लोगों का वैसा विनाश नहीं किया जैसा कि उन्होंने अमेरिका के लोगों और उनकी सभ्यता का किया था. अमेरिका की तो पूरी की पूरी संस्कृति और जनसंख्या ही खत्म कर दी गयी. आजकल यह हिसाब लगाया जाता है कि सन 1500 के आस-पास अमेरिका की आबादी 10 करोड़ के करीब रही होगी. यह संख्या तब के यूरोप से ज्यादा थी. लेकिन वे लोग कहां गायब हो गये, कुछ पता नहीं. भारत में ऐसा नरसंहार नहीं हुआ. लेकिन यूरोप के हाथों भारत की हार के जो नतीजे निकले हैं वे अमेरिकी हार से कम विनाशकारी नहीं हैं.

यूरोप के अधीन आने का परिणाम है कि हमारे समाज का शिष्ट तबका आम आदमी से कट गया. हालत ऐसे थे कि किसी तरह जीवन चलाए रखने के लिए समाज के विखंडित वर्गों ने अपने आप को एक सीमा में समेट लिया. असल में ब्रिटिश प्रशासन के प्रभाव के कारण हमारे यहां समाज के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा हो गया. कारयता, अव्यवस्था और दरिद्रता का बोलबाला बढ़ने लगा. दूसरी ओर राज्य समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से पूरी तरह कट गया. न राज्य का कोई उद्येश्य बचा और न ही उसके कार्य करने की दिशा. नतीजतन समाज की थोड़ी सी भी हलचल होने पर उनको लगता था कि उनपर बहुत बड़ा खतरा आ खड़ा हुआ है और राज्य किसी भी क्षण चरमरा कर गिर सकता है. ब्रिटिश प्रशासकों के मन में यह डर 1820 के आसपास ही समा गया था या फिर 1857-58 से वे डरते रहे हों या फिर 1893 के राष्ट्रव्यापी गौहत्या के विरूद्ध फैल रहे आंदोलन ने उनके मन में ऐसा डर भरा हो या फिर 1930-31 के नमक सत्याग्रह के दिनों में उन्हें लगता हो कि उनका राज्य कभी भी ढह जाएगा. इसलिए राज्य की स्थिरता को लेकर ब्रिटिश प्रशासन की चिंता समझ में आती है.

लेकिन यह समझना मुश्किल है कि अंग्रेजों के चले जाने के बाद भी भारतीय राज्य के मन में यह डर कैसे बना रहा कि समाज में किसी भी हलचल से राज्य खतरे में पड़ जाएगा. राज्य की क्षणभंगुरता के बारे में ऐसा ही डर अब भी बना हुआ है. इस डर का कारण यही हो सकता है कि भारतीय राजतंत्र के मूल में कहीं कोई गंभीर गड़बड़ है.
राज्य समाज और उसके लोगों का मुख्य उपकरण होता है. इसलिए जब हमें आजादी मिली तो हमारा पहला काम यही होना चाहिए था कि किसी तरह राज्य और समाज के रिश्तों को दोबारा जोड़ा जाए. ऐसा करने का एक देशी तरीका था. इस तरीके पर चलने के लिए हमें राज्य और उसके संस्थानों को ऐसे मूल्यों और नियमों के अनुरूप ढालना चाहिए था जिसे भारतीय लोग समझ पाते और उसके उपकरण उनके अनुकूल होते. कह सकते हैं कि धर्माधारित व्यवस्था भारतीय स्वभाव का हिस्सा है. परंतु जिन लोगों के हाथ में भारतीय राज्य की बागडोर आ गयी थी वे इसके लिए तैयार नहीं थे.
लेखक परिचय
धर्मपाल (1922-2006) का जन्म उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में हुआ था. भारत से लेकर ब्रिटेन तक लगभग 30 साल उन्होंने इस बात की खोज में लगाये कि अंग्रेजों से पहले भारत कैसा था. इसी कड़ी में उनके द्वारा जुटाये गये तथ्यों, दस्तावेजों से भारत के बारे में जो तथ्य पता चलते हैं वे हमारे मन पर अंकित तस्वीर को पलट देते हैं. उनकी प्रमुख किताबे हैं- साइंस एण्ड टेक्नालॉजी इन एट्टींथ सेंचुरी, द ब्यूटीफुल ट्री, भारतीय चित्त मानस और काल, भारत का स्वधर्म, सिविल डिसआबिडिएन्स एण्ड इंडियन ट्रेडिशन, डिस्पाइलेशन एण्ड डिफेमिंग आफ इंडिया.

2 thoughts on “हमारे अज्ञान की जड़े गहरी हैं

  1. …अंग्रेजी राज में शिष्ट समाज आम आदमी से कटता गया…क्या अब हिंदी की वैचारिकता ऐसी अटकलबाजियों के सहारे ही चलेगी? पेशवाई राज्य में अछूतों के लिए गले में हांड़ी, हाथ में झाड़ू लेकर चलने का प्रावधान अंग्रेजों ने तो नहीं बनाया था। जिस महार रेजीमेंट ने 1857 में दुबारा हिंदुस्तान जीतकर अंग्रेजों को सौंपा वह राज-समाज की ठेठ भारतीय अवधारणा से ही उपजी थी- इस हकीकत को न धर्मपाल बदल सकते हैं न संजय तिवारी। धर्मपाल जैसे संडे हिस्टोरियन की भूमिका इतिहास के अध्ययन में केवल अनुपूरक की ही हो सकती है। इसके बजाय उन्हें किसी गुप्त रहस्य के खोजी के रूप में प्रस्तुत करके इतिहास का स्थानापन्न बनाना केवल अतीतजीवी कुलीन वर्ग का हितसाधन करेगा। वह भी केवल मरीचिका के रूप में, क्योंकि असत्य, अर्धसत्य या चुने हुए मनचाहे सत्य से किसी का वास्तविक हितसाधन कभी संभव ही नहीं है…

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  2. पढ़ रहे हैं आपके लेख धर्मवीरजी का लिखा हुआ। चंद्रभूषणजी की टिप्पणी के बारे में आपके जवाब का इंतजार है!

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