अस्पृश्यता की जड़ें

धर्मपाल के लेख “हमारे अज्ञानता की जड़े गहरी हैं” को अधूरा छोड़ते हुए मैं यह लेख दे रहा हूं. चंद्रभूषण ने यह सवाल उठाया है कि “पेशवाई राज्य में अछूतों के लिए गले में हांड़ी, हाथ में झाड़ू लेकर चलने का प्रावधान अंग्रेजों ने तो नहीं बनाया था। जिस महार रेजीमेंट ने 1857 में दुबारा हिंदुस्तान जीतकर अंग्रेजों को सौंपा वह राज-समाज की ठेठ भारतीय अवधारणा से ही उपजी थी- इस हकीकत को न धर्मपाल बदल सकते हैं न संजय तिवारी। धर्मपाल जैसे संडे हिस्टोरियन की भूमिका इतिहास के अध्ययन में केवल अनुपूरक की ही हो सकती है। इसके बजाय उन्हें किसी गुप्त रहस्य के खोजी के रूप में प्रस्तुत करके इतिहास का स्थानापन्न बनाना केवल अतीतजीवी कुलीन वर्ग का हितसाधन करेगा। वह भी केवल मरीचिका के रूप में, क्योंकि असत्य, अर्धसत्य या चुने हुए मनचाहे सत्य से किसी का वास्तविक हितसाधन कभी संभव ही नहीं है…” इस सवाल पर अनूप शुक्ल की पूरक
टिप्पणी ” पढ़ रहे हैं आपके लेख धर्मवीरजी का लिखा हुआ। चंद्रभूषणजी की टिप्पणी के बारे में आपके जवाब का इंतजार है!”

इसलिए धर्मपाल के ही लिखे एक लेख से इन सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करते हैं.

अस्पृश्यता की जड़े
धर्मपाल

आज हिन्दुस्तान में हमारे अपने बारे में जो तस्वीर बनी है वह बहुत हद तक अंग्रेजों द्वारा बनाई गयी है. ऐसा नहीं है कि वह कोई साजिश वगैरह के तहत किया गया हो. उन्हें राज करना था तो कुछ तो ऐसा करना था कि राज-काज स्थाई हो. लेकिन एक कारण और रहा है. उनका अपना संसार जिस प्रकार चलता था उसी से उनकी दृष्टि बनी थी और वे हमको भी उसी दृष्टि से देखते थे. इसलिए हमारे लिए जरूरी है कि हम पहले यूरोप को समझें. इससे हमें यह समझ में आ सकता है कि आज हमारे समाज के बारे में जो तस्वीर हमारे मन में बनी है वह ऐसी क्यों है? यहां मैं भारत में अस्पृश्यता की भावना की खासतौर से चर्चा करूंगा.

1750 से अंग्रेजों ने भारत पर अपना प्रभुत्व जमाना आरंभ किया था. तभी से अस्पृश्यता की भावना बढ़ी और अधिक से अधिक लोगों को अस्पृस्य माना जाने लगा. तभी से अंग्रेजों ने भारत की स्मृतियों में से अपनी मान्यता और काम के उद्धरण लेने शुरू कर दिये और हमें कहा कि आपके शास्त्र यही कहते हैं. शुरू के दिनों में जब उनके पांव यहां जमने लगे तो उन्होंने बाकी के शास्त्रों का अंग्रेजी में अनुवाद भले ही रोक दिया हो लेकिन मनुस्मृति का अनुवाद जारी रखा. हम अंग्रेजों से 200-250 साल सीधे संपर्क में रहे लेकिन हमारे अधिक पश्चिमीकृत लोगों को भी यूरोप व इंग्लैंण्ड की पुरानी सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक व्यवस्था के बारे में अधिक जानकारी नहीं है. 1900 इस्वी तक तो इग्लैण्ड में ऊंच-नीच की धारणा व्यापक थी. इग्लैण्ड के 90 प्रतिशत लोग “लोअर आर्डर” में माने जाते थे. वैसे ही जैसे पिछले 200 सालों में हमारे यहां अधिकांश लोग पिछड़े और अस्पृश्य माने जाने लगे.

भारतीयों की यह मान्यता रही है कि हमेशा से यानी बहुत प्राचीन काल से वे भारत के वासी रहे हैं. शताब्दियों से इग्लैण्ड व यूरोप में ऐसी कोई मान्यता नहीं है. आज से हजार वर्ष पहले तक तो यूरोप के अधिकांश क्षेत्रों में यूरोप के बाहर से और यूरोप के एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र पर आक्रमण होते रहे. वहां पहले से बसे अधिकांशतः लोगों को समाप्त कर दिया जाता था. जो बचे रह जाते थे उनको दास बना लिया जाता था. इग्लैण्ड से बाहर का अंतिम आक्रमण उत्तर यूरोप के नारमन लोगों का हुआ. उन्होंने 1066 ईस्वी के करीब इग्लैण्ड पर विजय प्राप्त की और 25-30 वर्षों में ही यहां की पूरी राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था बदल डाली. इसका परिणाम यह हुआ कि इग्लैण्ड में पहले से बसे लोग दासत्व की स्थिति में पहुंच गये. उनसे जमीन इत्यादि सभी कुछ छीन लिया गया और 50 हजार के करीब जो नारमन वहां आकर बसे उन्होंने वहां के 95 प्रतिशत साधन को अपना मान लिया और केवल 5 प्रतिशत संसाधन मूल निवासियों के पास बचा जिनकी आबादी 10 लाख थी.

इस बदलाव को स्थाई करने के लिए जो व्यवस्थाएं बनाई गयीं उन्हीं को अग्रेज “रूल आफ ला” की शुरूआत कहते हैं. कमोबेश ऐसा ही कुछ अंग्रेजों ने भी किया जहां भी उन्होंने उपनिवेश बनाया. चाहे वह उत्तर अमेरिका हो, अफ्रीका के देश हों, आष्ट्रेलिया न्यूजीलैण्ड हों या भारत या भारत के आस-पास के देश हों. जो राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक तंत्र भारत में पिछले 200 सालों में बना है वह इसी अंग्रेजी “रूल आफ लॉ” की देन है. जो नारमन लोगों ने इग्लैण्डवासियों के साथ किया वही उन्होंने वहां किया जहां वे विजयी रहे.

दलित कहे जानेवाले लोगों की बात जब मैंने सोची तो मुझे लगा कि अंग्रेज भारत में कुछ ऐसा नहीं कर रहे थे जो अपने देश में नहीं करते थे. 1900 तक इग्लैण्ड में यह भावना व्याप्त है कि लोअर आर्डर को तो गरीब ही रहना चाहिए. सबके पास संपन्नता हो जाएगी तो हमारे ईसाई होने का क्या मतलब रह जाएगा? इस बारे में इंग्लैण्ड में जो मान्यताएं हैं वह हमें देखनी चाहिए. इस बारे में इंग्लैण्ड के आंकड़े महत्वपूर्ण हैं.

इधर जिन दस्तावेजों को मैंने देखा है उससे मेरी समझ में भारत में व्यापक अस्पृश्यता पिछले 200-300 सालों में ही बढ़ी है. मनुस्मृति में अवश्य कहा गया है कि जो अपने वर्ण से गिरता है वह अंत में अस्पृश्य बनता है. महाभारत में अश्वत्थामा भी पांडवों के बच्चों की हत्या के बाद शायद ऐसे ही अस्पृश्य माना गया. पुराणों में दिये गये भृगु-भरद्वाज के संवाद से लगता है कि वर्णों के आपसी संबंध के बारे में भारत में भिन्न-भिन्न विचार हमेशा ही रहे हैं.

1700 से लेकर 1750 तक दक्षिण में “अस्पृश्य” जैसे कोई खास समूह नहीं हैं. जिन्हें आज दलित कहा जाता है वे तो उस समय सेनानी लोग हैं. गांव की अपनी पुलिस है और ये लोग पुलिस का काम करते थे. स्थानीय सेना में भी ये लोग थे. पेरियार, चर्मकार पुलिस का काम करते थे. ये बहादुर सिपाही न केवल रक्षा करते हैं बल्कि जमीन के झगड़ो को भी सुलझाने का काम करते हैं. इसके साथ ही जमीन और अनाज मापने का काम भी ये लोग करते हैं. 1770 ईस्वी का एक दस्तावेज है जिसको वारेन हेस्टिंग्स ने मद्रास से कलकत्ता वापिस जाने से पहले तैयार करवाया था. उसमें ये आज दलित कहे जानेवाले लोग कह रहे हैं कि “हम महान सैनिक हैं, हां हम घोड़ों की जीन भी बनाते हैं.” अब ब्राह्मण उनके बारे में क्या कहता है इससे तो बात बनती नहीं. उनकी अपनी नजर में उनकी सेल्फ इमेज ठीक थी.

इस प्रकार जिन्हें हम अस्पृश्य कहते हैं उनकी अपनी सेल्फ इमेज ठीक थी. ये मान्यताएं सही है या नहीं, इतिहास में बैठती है या नहीं यह अलग सवाल है. इन सब पर तो काम होना चाहिए. हमारे इतिहासकारों को सोचना चाहिए. अब ग्रीक मिथकों में जो कुछ मिलता है उससे तो यह खराब नहीं है. आज हमारे विद्यालयों में ग्रीक मिथकों को तो माना जा सकता है और उस पर बड़ी-बड़ी डिग्रीयां दी जा रही हैं, बड़े-बड़े स्कालर तैयार होते हैं तो इन सब पर क्यों नहीं बनते? डिग्रीयां क्यों नहीं मिलतीं? अगर काम हो तो केवल दक्षिण के अध्ययन का उदाहरण बार-बार देने की जरूरत नहीं होगी. हर जिले में ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे.

3 thoughts on “अस्पृश्यता की जड़ें

  1. जी आप के आकड़े महत्तवपूर्ण हैं बहुत ही अच्छी जानकारी प्राप्त हुई पढ़कर ।

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  2. यह सही है कि यूरोप में आम जनता की स्थिति बहुत खराब थी व चर्च भी स्थिति को वैसे ही बनाए रखना चाहता था । यदि पुराना अंग्रेजी साहित्य पढ़ा जाए तो यह सब देखने को मिलता है । किन्तु मुझे नहीं लगता की हमारे अपने दलितों की बुरी हालत के लिए हम जिम्मेदार नहीं हैं । जब तक हम अपनी गल्ती नहीं मानते सुधार असंभव है । रोग को पहचानने से ही निदान होता है न कि बहाने बनाने से या अपनी गल्तियों को दूसरे के सिर मढ़ने से ।
    घुघूती बासूती

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  3. संजय जी, इधर दो-एक दिन हाथ थोड़ा बझा हुआ है। वैसे इस विषय से जुड़ी मेरे दिल की बुनियादी बात यहां घुघूती बासूती जी कह चुकी हैं। धर्मपाल जी के दक्षिण भारतीय समाज से संदर्भित अछूत विषयक आनुमानिक टिप्पणी से कहीं ज्यादा विद्वत्तापूर्ण और शोधपरक डॉ. भीमराव अंबेडकर की किताब ‘अछूत कौन थे…’ के चुनिंदा अंश अभय तिवारी जी के ब्लॉग पर पड़े हुए हैं। फिर भी इस बारे में दो-एक बातें अपनी ओर से कही जा सकती हैं। समय मिलते ही यह करने का प्रयास करूंगा।

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