और वहीं पर मौत आ जाए

आख़िरी इच्छा
गुज्जर नाले के ही रहने वाले अयूब अली ने कहा कि पाकिस्तान में सारी उम्र
तकलीफ़ में गुज़री है, “मन करता है कि भारत जाकर आख़िरी दिन वहीं पर ही गुज़ारूँ.
बँटवारे के बाद फ़िर कभी मुड़कर भी अपने शाहजहाँपुर को नहीं देखा, अब तो मन में एक
ही अरमान है कि शाहजहाँपुर जाऊँ और वहीं पर मौत आ जाए.”

बँटवारे के बाद अपने लिए एक अलग देश का सपना आँखों में लिए मुसलमानों का पाकिस्तान पलायन हुआ. ये लोग भारत में अपना सार घर-बार छोड़कर पाकिस्तान आए थे लेकिन पाकिस्तान में इन उर्दूभाषी लोगों को मुहाजिर कहा गया और इनमें से बहुत सारे लोग जिस हालत में आए थे आज भी उसी हालत में कराची की मैली-कुचैली गलियों में जीवन बिता रहे हैं.

लगभग 50 फ़ीसदी मुहाजिर मुफ़लिसी की हालात में कराची तथा सिंध में रहते हैं. साठ साल बीत जाने बाद भी उनकी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है. ग़रीबी से जूझते ये लोग बड़ी संख्या में कराची के गुज्जर नाला, ओरंगी टाउन, अलीगढ़ कॉलोनी, बिहार कॉलोनी और सुर्जानी इलाकों में रहते हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार पाकिस्तान की आबादी लगभग 16.5 करोड़ है. जिसमें मुहाजिरों की संख्या लगभग आठ प्रतिशत है. ये वो लोग हैं जो विभाजन के समय पाकिस्तान आए थे. इसके अलावा 44.68 फ़ीसदी पंजाबी, 15.42 फ़ीसदी पश्तून, 14.1 फ़ीसदी सिंधी, 10.53 फ़ीसदी सिरायकी, 3.57 फ़ीसदी बलोच तथा 4.66 फ़ीसदी अन्य समुदाय हैं.


विभाजन की पीड़ा
कराची के गुज्जर नाले के निवासी और भारतीय शहर कानपुर से आए, 78 साल के मोहम्मद अनवर बँटवारे के दर्द को याद करते हुए कहते हैं, “जब हम पाकिस्तान पहुँचे तो पहले हमे थार के मरुस्थल में बनाए गए एक शिविर में रखा गया, जहाँ हम मजबूरी में ट्रेन के भापइंजन से निकला गरम पानी पीते थे.”

अनवर ने बताया कि कानपुर में घर, ज़मीन, जो भी था सब कुछ छोड़कर केवल एक चादर लिए पाकिस्तान आए थे. मुआवज़े में सरकार की ओर से कुछ भी नहीं मिला. मुआवज़े में घर या संपत्ति उन्हीं को मिली जिनके आगे-पीछे कोई हाथ था. या जिन्होंने लूटा उनको ही सब मिला.”

मोहम्मद अनवर ने कहा, “हम तो इस्लाम का झंडा लेकर अए थे और सोचा था कि मुसलमानों के लिए एक अलग देश बन रहा है तो कुछ सुख की सांस लेंगे पर यहाँ तो तकलीफ़ ही तकलीफ़ हैं”.

बँटवारे के समय जब मोहम्मद अनवर ने कानपुर छोड़ा था तब उन की उम्र 17 साल थी, और फिर ग़रीबी के कारण उन्हें कानपुर लौटना नसीब नहीं हुआ. उन्होंने बताया, “भारत जाने के लिए इतने साधन नहीं हैं, पेट की चिंता करें या अपने मादरे-वतन कानपुर देखने की. दिल तो बहुत करता है, पर क्या करें, ग़रीबी ने दीवार सी खड़ी कर दी है.”

विस्तार से संबंधित लेख बीबीसी हिन्दी पर पढ़ें.

2 thoughts on “और वहीं पर मौत आ जाए

  1. भारतीय महासंघ का सपना ऐसी ही पीड़ाओं से निकला है और मुझे पूरा यकीन है कि जब जर्मनी एक हो सकता है, कोरिया एक होने की तरफ कदम बढ़ा सकता है, तो मूलत: एक ही तरह की संस्कृति से निकले भारत-पाकिस्तान को कोई एक होने से नहीं रोक सकता। एक संघीय ढांचे में जब पश्चिम बंगाल और तमिनाडु बंधे रह सकते हैं तो सिंघ और बलूचिस्तान के जुड़ने में कोई मुश्किल नहीं होनी चाहिए। हां, केंद्रीय ढांचा कुछ कुछ यूरोपीय संघ की तर्ज पर होना चाहिए। मुद्रा एक हो, विदेश नीति एक हो, डाक सेवाएं केंद्रित हों और सेना एक हो।

    Like

  2. न जाने कितनों की ये कसक है। काश भारत-पाक महासंघ की बातें कभी साकार हो सकें।

    Like

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s