आदिवासी भोले हैं, उन्हें छोड़ दो

  • जशपुर और दिल्ली से राकेश सिंह
  • जशपुर में शैलेन्द्र पाण्डेय

जशपुर के इस इलाके में आने के बाद लगता है गरीबी को नयी परिभाषा गढ़नी चाहिए. क्योकिं जिस परिभाषा में हम गरीबी को मापते हैं उस परिभाषा की गरीबी यहां अमीरी है. आदिवासियों तक यह बात पहुंच गयी है कि पैसा जीवन में बहुत जरूरी होता है. आदिवासियों तक यह बात पहुंचाई है ईसाई मिशनरियों ने. सेवा कार्य के नाम पर आदिवासी क्षेत्रों में कुकुरमुत्ते की तरह फैले पादरी और नन्स ने आदिवासी जीवनशैली को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है. ईसाई मिशनरियों के कारण आदिवासी रहन-सहन और जीवनशैली में फर्क को आधुनिकता कहकर स्वीकार भी कर लें तो आदिवासियों की सोच में जो बदलाव आये हैं उसको क्या कहें? और इस सोच में आये बदलाव के कारण सबसे ज्यादा घाटे में आदिवासी ही हैं. आधुनिकता की छद्म चकाचौंध ने उन्हें बाजार के ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया जहां सभ्य लोगों की नजर में हर आदिवासी दोयम दर्जे का मजदूर है और उसके जल-जंगल पूंजीपतियों के संसाधन. रही बात औरतों और लड़कियों की तो वे देह बाजार की सबसे “बिकाऊ माल” हैं.
आदिवासी समाज बहुत हिम्मती और स्वाभिमानी होता है, लेकिन वह जितना हिम्मती और स्वाभिमानी होता है उतना ही सहज, सरल और भावुक भी. ऐसे लोगों को जीवन में आदर्श के तौर पर देखना चाहिए. लेकिन हमारा सभ्य समाज इन लोगों को संसाधन के तौर पर इस्तेमाल करता है. उनको भी और उनके पर्यावरण को भी.

इस लिहाज से छत्तीसगढ का जशपुर का इलाका बहुत महत्वपूर्ण है. यहां ईसाई मिशनरियों का सबसे बड़ा अड्डा है. जितना यहां की प्रकृति उदार है उतने ही यहां के लोग. शायद इसीलिए यहां मिशनरियों को अपना पैर जमाने में ज्यादा दिक्कत नहीं हुई. मिशनरियों के काम-काज का विरोध करनेवाले जब यहां पहुंचे तो वे भी उसी तरह सफल हुए जैसे मिशनरियां सफल हुई थीं. और इस तरह यह पूरा इलाका जंग के मैदान में बदलता चला गया. आज ईसाई मिशनरियां आदिवासियों को उसी तरह से बदलने में लगी हुई हैं जैसे अफ्रीका में उन्होंने 150 साल पहले किया था. इसके परिणाम क्या हैं? अफ्रीका तो नहीं गया लेकिन जशपुर में परिणाम भयावह हैं.

यहां एक ग्रामीण विकास केन्द्र काम करता है. उसने कुछ लड़कियों के बारे में केसस्टडी की है. मसलन रमा कुजूर को ही लें. रमा कुजूर (बदला हुआ नाम) की उम्र सोलह साल है. वह जशपुर के गांव जमटोली की रहनेवाली है. आधुनिकता के प्रभाव में उसकी समझ यह बना दी गयी थी कि शहर जाना और पैसा कमाना अपने पैर पर खड़ा होने जैसा कोई काम होता है. इसलिए 22 मई 2006 को अपने गांव के दो लोगों बंटूराम और राजकुमारी के साथ दिल्ली आ गयी. यहां वह दो महीने तक पूर्वी दिल्ली के शकूरपुर इलाके में लगभग दो महीने रही. जहां उसे रोका गया उसका नाम था गणेश प्लेसमेंट एजंसी. एजंसी के दफ्तर के बारे में उसने जो बताया वह इस प्रकार है-

“सभी लड़के लड़कियों को छोटे-छोटे कमरों में एक साथ रखा जाता है. यहां सबको शराब पिलाई जाती है. जो मना करता है उसकी मार-पिटाई होती है. सभी नये सदस्यों को ब्लू फिल्म और जानवरों की फिल्में दिखाई जाती हैं. अगर कोई न देखे और सोने लगे तो उसे डंडे से मारकर जगाया जाता है और फिल्म दिखाई जाती है. सभी को मांस और शराब का सेवन अनिवार्य है. इसके बाद प्लेसमेंट संचालक स्वयं नई आयी लड़कियों के साथ बलात्कार करता है. गर्भ न रूके इसके लिए दवाई खिलाई जाती है. संचालक यहां आनेवाली लड़कियों से झूठ-मूठ की शादी भी रचाता है.

राजू और अशोक नामक दो लड़कों ने 14 साल की एक लड़की के मना करने पर इतना मारा कि वह अपनी याददाश्त खो बैठी. उसे अंबेडकर अस्पताल में भरती कराया गया. उसकी हालत थोड़ी सुधरने में दो महीने लगे. लेकिन जैसे ही वह थोड़ी ठीक हुई उसे फिर से काम पर लगा दिया गया. कोठियों में काम करनेवाली लड़कियों को एक सप्ताह के लिए वापस बुला लिया जाता है. फिर सप्ताह भर उनके साथ बलात्कार किया जाता है. आठ दस दिन बाद उन्हें वापस कोठियों में काम करने के लिए भेज दिया जाता है. प्लेसमेंट एजंसियां लड़कियों का बाल खींचकर पटक देते हैं. और लात-घूंसों से मारते हैं. अगर किसी लड़की को गर्भ हो जाता है तो सरकारी अस्पताल में कहा जाता है कि इसका पति इसे छोड़कर भाग गया है और अस्पतालवाले भी उनसे मिले होते हैं. जिन लड़कियों को बीयरबार में भेजा जाता है प्लेसमेंट एजंसीवाले उनके लिए सब कपड़े-गहने भी खरीदते हैं. सार्वजनिक पार्कों में भी हम लोगों को ले जाया जाता था और सेक्स का अभ्यास कराया जाता था. कई बार लड़कियों को इतना मजबूर किया जाता है कि वे आत्महत्या कर लेती हैं.”

(जारी…)

3 thoughts on “आदिवासी भोले हैं, उन्हें छोड़ दो

  1. सही रपट!!
    यह मिशनरियां ज्यादातर जशपुर, रायगढ़, अंबिकापुर के आदिवासियों के बीच ज्यादा सक्रिय है बस्तर में कम , शायद इसलिए कि बस्तर में नक्सलियों का आतंक अधिक है तो फ़िर वहां “समाजसेवा” कैसी।

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  2. यह सही है यहां मिशनरियां काफी सक्रिय हैं लेकिन इनका केन्द्र बिन्दु कुनकुरी है. यहां का कैथेड्रल इसी में जुटा हुआ है कि किस तरीके से धर्मान्तरण हो. साथ ही इसके बगल में स्थापित स्कूल लोयोला की अपस्तोलिक भी काफी महती भूमिका निभाती है.

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  3. इसाईयत और धर्म-परिवर्तन पर गांधीजी के विचार

    आर- ए- ह्यूम को १३ फरवरी १९२६ को उन्होंने पञ में लिखा था, मैं ईसामसीह को ईश्वर का ढएकमाञ पुञ या ईश्वर का अवतार नहीं मानता, लेकिन मानव जाति के एक शिक्षक के रूप में उनके प्रति मेरी बडी श्रध्दा है। गाँधी की नजर में ईसा महान थे, महानतम नहीं।

    गाँधी ने यह भी अस्वीकार किया कि धर्मांतरण ईश्वरीय कार्य है।उन्होंने ए-ए- पाल को उत्तर देते हुए हरिजन के २८ दिसम्बर १९३५ के अंक में लिखा कि ईसाई धर्म प्रचारकों का कहना है कि वे लोगों को ईश्वर के पास में खींच रहे हैं और ईश्वरीय कार्य कर रहे हैं- तो मनुष्य ने यह कार्य क्यों ईसा के हाथों से ले लिया है। ईश्वर से कोई भी कार्य छीनने वाला कौन होता है तथा क्या सर्व शäिमान ईश्वर इतना असहाय है कि वह मनुष्यों को अपनी ओर नहीं खींच सकता। गाँधी जी ने २ मई १९३३ को पं- जवाहर लाल नेहरु को पञ में लिखा हिदूत्व के व्दारा मैं ईसाई, इस्लाम और कई दूसरे धर्मों को प्रेम करता हूँ। यह छीन लिया जाये तो मेरे पास रह ही क्या जाता

    शहर भर जानता था कि नवीन धर्म में दीक्षित होमे के बाद वह संस्कारी हिनदू ईसा के नाम पर शराब पीने लगा, गोमांस खाने लगा और उसने अपना भारतीय निवास छोड दिया।

    है। वे स्पष्ट कहते हैं कि हिनदू धर्म की सेवा और हिनदू धर्म की रक्षा को छोड़कर मेरी दूसरी कोई प्रवृति नहीं है।

    यहाँ गौरतलब है कि गाँधी ने हिनदू धर्म की उदारता और सहिष्णुता ग्रहण करके ही अन्य धमों के प्रति सहिष्णु भाव रखा था। श्री रामचन्द्र के प्रभाव से गाँधी ने जैन धर्म की उत्कृष्णताओं को अपने जीवन का अंग ढइसी प्रकार बनाया था।

    ईसाई मिशनरियों को गाँधी जी ने यहाँ तक कह दिया था- जो भारतवर्ष का धर्मपरिवर्तन करना चाहते हैं, उनसे यही कहा जा सकता है कि हकीम जी पहले अपना इलाज कीजिए न।

    वे आगे कहते हैं, भारत को कुछ सिखाने से पहले यहाँ से कुछ सीखना पडेगा। गाँधी ने बडी पीडा में भरकर एक प्रसंग में व्यक्त किया है कि- मुझे याद है, जब मैं भी जवान था उस समय एक हिनदू ईसाई बन गया था। शहर भर जानता था कि नवीन धर्म में दीक्षित होमे के बाद वह
    संस्कारी हिनदू ईसा के नाम पर शराब पीने लगा, गोमांस खाने लगा और उसने अपना भारतीय निवास छोड दिया।

    गाँधी ने ईसाई मिशनरियों द्वारा चिकित्सा एवं शिक्षा के क्षेञ में किए गए कायों की कई बार प्रशंसा की थी, किन्तु उन्होने इसके मूल में विद्यमान प्रलोभनों तथा उनके धर्म परिवर्तन के उद्देश्य पर गहरी चोट करते हुए
    एक मिशनरी को कहा- जब तक आप अपनी शिक्षा और चिकित्सा संस्थानों से धर्म परिवर्तन के पहलू को हरा नहीं देते, तब तक उनका मूल्य ही क्या है।

    मिशन स्कूलों और कालेजों में पढने वाले छाञों को बाइबिल की कक्षाओं में भाग लेने के लिए बाध्य क्यो किया जाता है। यदि उनके लिए ईसा के संदेशों को समझना जरूरी है तो बुध्द और मुहम्मद के संदेश को
    समझना जरूरी क्यों नही है।

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