ईसा जरूरी हैं तो मोहम्मद और बुद्ध क्यों नहीं?

(आदिवासी भोले हैं, उन्हें छोड़ दो लेख पर आयी अनुनाद सिंह की उम्दा टिप्पणी.)
आर- ओ- ह्यूम को १३ फरवरी १९२६ को उन्होंने (महात्मा गांधी ने) पत्र में लिखा था, मैं ईसामसीह को ईश्वर का एकमात्र पुत्र या ईश्वर का अवतार नहीं मानता, लेकिन मानव जाति के एक शिक्षक के रूप में उनके प्रति मेरी बडी श्रध्दा है। गाँधी की नजर में ईसा महान थे, महानतम नहीं। गाँधी ने यह भी अस्वीकार किया कि धर्मांतरण ईश्वरीय कार्य है। उन्होंने ए-ए- पाल को उत्तर देते हुए हरिजन के २८ दिसम्बर १९३५ के अंक में लिखा कि ईसाई धर्म प्रचारकों का कहना है कि वे लोगों को ईश्वर के पास में खींच रहे हैं और ईश्वरीय कार्य कर रहे हैं- तो मनुष्य ने यह कार्य क्यों ईसा के हाथों से ले लिया है। ईश्वर से कोई भी कार्य छीनने वाला कौन होता है तथा क्या सर्व शक्तिमान ईश्वर इतना असहाय है कि वह मनुष्यों को अपनी ओर नहीं खींच सकता।

गाँधी जी ने २ मई १९३३ को पं- जवाहर लाल नेहरु को पत्र में लिखा हिदुत्व के द्वारा मैं ईसाई, इस्लाम और कई दूसरे धर्मों को प्रेम करता हूँ। यह छीन लिया जाये तो मेरे पास रह ही क्या जाता है. वे स्पष्ट कहते हैं कि हिन्दू धर्म की सेवा और हिन्दू धर्म की रक्षा को छोड़कर मेरी दूसरी कोई प्रवृति नहीं है। यहाँ गौरतलब है कि गाँधी ने हिन्दू धर्म की उदारता और सहिष्णुता ग्रहण करके ही अन्य धमों के प्रति सहिष्णु भाव रखा था।

श्री रामचन्द्र के प्रभाव से गाँधी ने जैन धर्म की उत्कृष्णताओं को अपने जीवन का अंग इसी प्रकार बनाया था। ईसाई मिशनरियों को गाँधी जी ने यहाँ तक कह दिया था- जो भारतवर्ष का धर्मपरिवर्तन करना चाहते हैं, उनसे यही कहा जा सकता है कि हकीम जी पहले अपना इलाज कीजिए न। वे आगे कहते हैं, भारत को कुछ सिखाने से पहले यहाँ से कुछ सीखना पडेगा। गाँधी ने बडी पीडा में भरकर एक प्रसंग में व्यक्त किया है कि- मुझे याद है, जब मैं भी जवान था उस समय एक हिन्दू ईसाई बन गया था। शहर भर जानता था कि नवीन धर्म में दीक्षित होमे के बाद वह संस्कारी हिन्दू ईसा के नाम पर शराब पीने लगा, गोमांस खाने लगा और उसने अपना भारतीय निवास छोड दिया।

गाँधी ने ईसाई मिशनरियों द्वारा चिकित्सा एवं शिक्षा के क्षेञ में किए गए कायों की कई बार प्रशंसा की थी, किन्तु उन्होने इसके मूल में विद्यमान प्रलोभनों तथा उनके धर्म परिवर्तन के उद्देश्य पर गहरी चोट करते हुएएक मिशनरी को कहा- जब तक आप अपनी शिक्षा और चिकित्सा संस्थानों से धर्म परिवर्तन के पहलू को हरा नहीं देते, तब तक उनका मूल्य ही क्या है। मिशन स्कूलों और कालेजों में पढने वाले छाञों को बाइबिल की कक्षाओं में भाग लेने के लिए बाध्य क्यो किया जाता है। यदि उनके लिए ईसा के संदेशों को समझना जरूरी है तो बुध्द और मुहम्मद के संदेश को समझना जरूरी क्यों नही है?

7 thoughts on “ईसा जरूरी हैं तो मोहम्मद और बुद्ध क्यों नहीं?

  1. बहुत बढ़िया, बहुत सही!!
    आभार कि आपने इसे एक पोस्ट के रुप में यहां प्रकाशित किया!!

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  2. सम्बन्धित मसले पर पढ़ें। महापुरुषॊं के उद्धरण सन्दर्भ सहित हों ऐसी उम्मीद की जाती है।

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  3. यह बहुत ही स्पष्ट तरीके से लिखा गया विचारोत्तेजक लेख है. एक बार में ही पूरा पढ गया. इसे यहां प्रकाशित करने के लिये आभार — शास्त्री जे सी फिलिप

    आज का विचार: हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है.
    इस विषय में मेरा और आपका योगदान कितना है??

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  4. प्रसंशा के लिए शब्द नहीं है. उम्दा टिप्पणी को प्रकाशित करने के लिए साधूवाद.

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  5. अफलातून जी से पूछना चाहूंगा कि ‘सन्दर्भ’ का अर्थ क्या किसी पुस्तक, अखबार या किसी अन्य श्रोत का नाम लिख देना ही होता है? मुझे तो लगता है कि सन्दर्भ में यह भी आता है कि अवसर क्या था, बात किस बारे में हो रही थी, श्रोता कौन था, स्थान क्या था; आदि.

    विवेकानन्द जी को जितना मैने पढ़ा है, उन्होने भी मिशन्रियों को बहुत कोसा है. एक जगह तो मैने उनको यह कहते हुए पाया है कि इसाई मिशनरियाँ उनकी हत्या करना चाहती हैं।

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