जानिये टीआरपी का खेल

हिन्दी चैनल टीआरपी के मारे हैं. पत्रकार बेचारे हैं. लेकिन यह टीआरपी क्या है? इसलिए अगली बार जब आप चैनल समीक्षा करें तो इस बात का ध्यान रखें कि टीआरपी तैयार कैसे होती है? कैसे एक अनजान सी संस्था पूरे के पूरे समाचार जगत को इंडस्ट्री बना देती है और अपने फायदे के लिए प्रयोग करती है….

वैसे तो कार्यक्रमों की रेटिंग का खेल खुद दूरदर्शन ने ही शुरू कर दिया था. उसका दर्शक अनुसंधान विभाग यानी डार्ट विभिन्न कार्यक्रमों की साप्ताहिक रेटिंग बताता था. लेकिन 1994 के आस-पास निजी क्षेत्र में मार्केट रिसर्च एजंसियों इनटैम और टैम का प्रवेश हुआ. इन दोनों एजंसियों ने निजी चैनलों की मदद से डार्ट को अप्रासंगिक बना दिया. बाद में इनटैम और टैम का विलय हो गया. आज टीवी इंडस्ट्री 7 हजार करोड़ रूपये की है. इसमें सालाना 23 फीसदी का विकास हो रहा है. और पूरे बाजार को एक ही एजंसी संचालित करती है उसका नाम है- टेलीविजन आडियेन्स मेजरमेन्ट(टैम). कहने को एक और एजंसी एमैप भी काम करती है लेकिन उसका कोई खास प्रभाव नहीं है.

सवाल है कि क्या टैम का विश्लेषण ठीक होता है? हिन्दी चैनल रोना रोते हैं कि टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग प्वाईंट) का खेल है. कुछ भी करो टीआरपी गिरनी नहीं चाहिए. लेकिन यह टीआरपी बनती कैसे है? टीआरपी तय करने के लिए टैम ने चौदह राज्यों के 73 शहरों में एक पीपल मीटर लगा रखा है. इन मीटरों से औसत सात हजार सैंपल इकट्ठा किये जाते हैं. यह पीपल मीटर ज्यादातर मंहगी कालोनियों और उच्च मध्यवर्गीय इलाके में लगा होता है. इसलिए जो आंकड़े इकट्ठा किये जाते हैं वे आमतौर पर सात हजार लोगों की पसंद होते हैं. लेकिन इन आंकड़ों को समूचे दर्शक वर्ग की पसंद कहना वैसे ही नाइंसाफी होगी जैसे शेयर बाजार के चढ़ने पर देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत घोषित कर देना.

टैम के आंकड़ों को कई वजहों से खारिज किया जा सकता है. एक, ये सैंपल एक खास दर्शक वर्ग की समझ से इकट्ठा किये जाते हैं. दो, इन आंकड़ो के साथ छेड़छाड़ संभव है. तीन, भारत में “कोस-कोस पर पानी बदले चार कोस पर बानी” वाला देश है यहां इतने कम सैंपल से सटीकता से कोई विश्लेषण असंभव है. इन 73 शहरों में भी टैम का जोर केवल दिल्ली और मुंबई के दर्शकों पर सबसे ज्यादा है. इसलिए दिल्ली और मुंबई की कोई छोटी सी घटना भी देखते-देखते राष्ट्रीय खबर बन जाती है और बिहार की बाढ़ को खानापूर्ति के तौर पर दिखाया जाता है.

चैनलवालों की मजबूरी यह है कि विज्ञापन एजंसियां टैम के सर्वे को ही विज्ञापन देने का अपना आधार बनाती हैं. इसलिए न चाहते हुए भी उन्हें टीआरपी को मानना पड़ता है. दूसरी बड़ी समस्या यह है कि टीवी में प्रिंट की तरह रिकार्ड नहीं रखा जा सकता. और किसी भी चैनल ने इस दिशा में काम नहीं किया है कि बजाय किसी टैम के ऊपर निर्भर रहने के वे अपना रिकार्ड खुद रखें. यानि चैनल खुद भी अपना पीपल मीटर लगा सकते हैं. ऐसे में चैनलों को टैम की टीआरपी पर निर्भर रहना पड़ता है.

कुल खेल इतना ही है. सैद्धांतिक विश्लेषण हम चाहे जितना करते रहें.

साथ में अजय शर्मा समकाल से

5 thoughts on “जानिये टीआरपी का खेल

  1. जो हमे अच्छा लगे.
    वो सबको पता चले.
    ऎसा छोटासा प्रयास है.
    हमारे इस प्रयास में.
    आप भी शामिल हो जाइयॆ.
    एक बार ब्लोग अड्डा में आके देखिये.

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  2. बढ़िया जानकारी, शुक्रिया!!

    इस बीच खबर आई है कि टी आर पी, सांप, भूत-प्रेत और चुड़ैल के पीछे दौड़ने वाले एक चैनल ने अपना छह महीने का किराया नही दिया है।
    अगले बंदे ने अखबार में नोटिस छपा दी जो कि अभी अभी देखने को मिली!!

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  3. बहुत अच्छी जानकारी, धन्यवाद!

    हम हमेशा सोचते थे कि ये टीआरपी क्या बला है, आपने विस्तार से बताया।

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  4. टीआरपी के इस खेल को पर्दाफाश करने के अभियान को लगातार जारी रखना होगा।

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