बौराये घोड़े पर सवार

खुदरा कारोबार की योजना में शामिल पूंजीपति बौराये घोड़े पर सवार हैं और किसी भी प्रकार की दलील को उलटने के तर्क उनके पास मौजूद हैं. क्या ऐसा इसलिए हो रहा कि भारतीय उपभोक्ता बनियागीरी से तंग आ चुका है और उसे मुक्ति चाहिए? खरीदने, खाने और उपभोक्ता होने के हक-अधिकार का सम्मान चाहिए? बातें दोनों ही सच हो सकती हैं. लेकिन यह सच अधूरा सच होगा. कंपनियों के अभी तक के अनुभव हमें यही बताते हैं कि पवित्रता, नैतिकता, समूह का अस्तित्व बाजार के सिद्धांतों के सामने टिकते नहीं.

हाल में ही फिक्की ने इंडिया रिटेल रिपोर्ट 2007 जारी की है. कीमत है 1500 रूपये. जाहिर सी बात है मैं उसे खरीद नहीं सकता था. लेकिन उस रिपोर्ट को एक बार देखना जरूरी था. फोन किया तो उन्होंने कहा पत्रकारों को हम यह रिपोर्ट मुफ्त में दे रहे हैं. मुफ्त का सौदा पत्रकारों के साथ शायद इसलिए कि वे (पत्रकार) मान लें कि भारत में रिटेल सेक्टर में जो भी प्रयोग हो रहे हैं वे भारत के हित में हैं. और पत्रकार बिरादरी बिना चूं-चपड़ किये एकमत से खुदरा कारोबार को भारतीय उपभोक्ताओं के लिए क्रांतिकारी बताने में लगा हुआ है. शुक्र है इस देश का भविष्य पत्रकार भी नहीं तय करते इसलिए विरोध की गुंजाईश बची हुई है.

रिपोर्ट में आंकड़े-तथ्य लेखा-जोखा और यह दलील बहुतायत में है कि खुदरा कारोबार भारतीय उपभोक्ताओं के लिए फायदेमंद है. लेकिन कहते हैं कि अपराधी लाख सावधानी बरते कोई न कोई सबूत छोड़ जाता है. इस रिपोर्ट में भी कुछ सबूत हैं जो यह साबित करते हैं कि खुदरा कारोबार में उतरनेवाले कंपनी अधिपतियों के इरादे नेक नहीं हैं. मसलन भारतीय और विदेशी कारपोरेट्स के लिए खुदरा में जो सबसे बड़ी चुनौती मानी गयी है वह यह कि भारतीय खर्चीला नहीं होता. अब बड़ी मुश्किल है. सारा आयोजन करके बैठ जाएं और खरीदार ही न आये तो? दिल्ली में अचानक एक-डेढ़ सालों में सौ-सवा सौ माल्स बन गये लेकिन खरीदार ही न आया. फिर कानून का गैरकानूनी रूप से सहारा लिया गया. 15 साल से कोर्ट में दफ्न एक केस को जिंदा किया गया. यह केस दिल्ली रेसिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन ने किया था कि हमारे पास पार्किंग नहीं है. घरों के आस-पास से दुकानों को बंद करवाईये. सभरवाल साहब ने संज्ञान लिया और दिल्ली में सीलिंग का दौर शुरू हो गया. माल्स की दुकाने बिक गयीं. खरीदार भी आने-जाने लगे. बात बन गयी.

तो बड़ी मुश्किल यह है कि भारतीय स्वभाव से उपभोक्ता नहीं है. जो उपभोक्ता बन गये हैं वे बचत करते हैं. खुदरा कारोबारियों के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती है. इसे तोड़ने के लिए हजारों करोड़ की योजनाओं पर काम किया जायेगा. आदमी को यह समझाया जाएगा कि खरीदना जीवन की सार्थकता है. भले ही जो आप खरीद रहे हैं वह आपके लिए सार्थक हो या न हो. छूट, विज्ञापन, प्रमोशन जैसे कुछ रास्तों पर काम हो रहा है. और भी रास्ते तलाशे जा रहे हैं कि भारतीय कंपनी उत्पादों पर खर्च कैसे करे. आप जितना खर्च करते हैं उतना ही आपकी सार्थकता है. और अगर खर्च केवल कंपनियों के उत्पादों पर खर्च करते हैं तो आपका जीवन धन्य है. विज्ञापनों के प्रभाव में आकर छद्म आवश्यकताएं बनाईये और फिर उन्हें पूरा करने के लिए अपना पूरा जीवन होम कर दीजिए, आप विकसित मनुष्य की श्रेणी में पहुंच जाएंगे.

One thought on “बौराये घोड़े पर सवार

  1. इस विषय को मुझ जैसे इस विषय में अपढ व्यक्ति को समझाने के लिये एक दो लेख लिख दें तो बडी मेहरबानी होगी — शास्त्री

    जिस तरह से हिन्दुस्तान की आजादी के लिये करोडों लोगों को लडना पडा था, उसी तरह अब हिन्दी के कल्याण के लिये भी एक देशव्यापी राजभाषा आंदोलन किये बिना हिन्दी को उसका स्थान नहीं मिलेगा.

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