चिट्ठाकार भी इंसान होता है

हिन्दी चिट्ठों पर अक्सर ब्लागर मीट की चर्चा होती रहती है. एकाध बार दिल्ली में यह भेंट-मुलाकात हुई तो मैं जा नहीं पाया. आज अनूप शुक्ल पूना जाते हुए दिल्ली रूके तो मैथिली गुप्त ने कई सारे ब्लागरों को बुलावा भेजा कि आप आईये फुरसतिया जी दिल्ली में हैं. उनके इस उत्साह ने मुझे भी प्रेरित किया कि मैं जाऊं. मैं गया भी. लेकिन उत्साह से गया ऐसा नहीं कह सकता. जाने से पहले थोड़ी हिचक और संकोच था. जब मैं पहुंचा तो मैथिली गुप्त, अनूप शुक्ल, यशवंत सिंह, आलोक पुराणिक, राजेश रोशन, काकेश, अरुण अरोरा, मसिजीवी, सचिन, सिरिल और एक महिला चिट्ठाकार सुनीता “शानू” वहां पहले से मौजूद थे. परिचय हुआ. बाद में जगदीश भाटिया, सृजनशिल्पी, अविनाश दास, नीरज दीवान भी आ गये.

बातचीत हुई. एक दूसरे को समझते क्या इत्ती देर में लेकिन आमने-सामने होने पर एक बात साफ हो गयी ब्लागर भी इंसान ही होता है. कई बार माध्यम हमारे बीच इतनी बड़ी बाधा खड़ी कर देते हैं कि अच्छा खासा आदमी ब्राण्ड बन जाता है. बहुत सारे लोग नेताओं-अभिनेताओं के पीछे इसलिए भागते हैं कि अखबार-टीवी ने उन्हें आदमी से उठाकर ब्राण्ड बना दिया है. जब हम किसी चर्चित शख्सियत से यह मानकर दो-चार होते हैं कि वह भी इंसान है तो ज्यादा बराबरी पर संवाद करते हैं. छवि से संवाद करना मुश्किल होता है क्योंकि छवि हमारे मन में कई तरह के पूर्वाग्रह बना देती है. छवि से मुक्त होने के बाद जो बचता है वह इंसान होता है और इंसान से संवाद करना हमेशा आसान होता है.

मैं विस्फोट नहीं हूं. ठीक वैसे ही जैसे अनूप शुक्ल फुरसतिया नहीं हैं, अविनाश मोहल्ला नहीं है और आपका चिट्ठा आप नहीं हैं. यह हमारा काम है. जैसे बहुत सारे जीवन के पहलू हैं वैसे ही एक पहलू यह भी है. अब मुश्किल यह होती है कि हमारी छवि से हमारा परिचय गढ़ा जाता है. तब जब हम कभी मिलते हैं तो वह छवि टूटनी चाहिए. मिलनेवाले इंसान हों न कि ब्लागर. ब्लागर होना हमारी छवि है जिससे हमें एक परिचय मिलता है लेकिन मिलने के बाद आपस में यह परिचय टूटना चाहिए. घट फूटना चाहिए. आवरण उतरना चाहिए. खालिस हम बचें और आप.

कन्हैयालाल नन्दन वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं. जहां हम लोग मिले वहां से थोड़ी ही दूर पर वे रहते हैं. अनूप शुक्ल के मामाजी हैं. अनूप शुक्ल जाकर उन्हें ले आये. और चंद बातें उन्होंने बहुत अच्छी कहीं. भाषा में देशज शब्दों का प्रयोग हो. और बहुत जरूरी न होने पर हमें अपनी शब्दावली से शब्द मोती चुनने चाहिए. बोलियों का भाषा के साथ तालमेल का प्रयोग उस पीढ़ी ने खूब किया है जिस पीढ़ी में कन्हैयालाल नंदन आते हैं. फिर चाहे वो प्रभाष जोशी हों या धर्मवीर भारती. नई पीढ़ी तकनीकि के मकड़जाल में फंसते हुए भी अगर इस निधि को संग्रहित कर ले जाती है तो भाषा भी बचेगी और भाव भी.

चिट्ठाकारों की इस बैठक के बारे में और लोग लिखेंगे ही जिसमें शायद ज्यादा सटीकता और समग्रता से पूरा विवरण मिले. मैं तो इतना समझा, मेल-जोल और संवाद का महत्व कभी कम नहीं होता क्योंकि मेल-जोल और संवाद से पूर्वाग्रह टूटते हैं. छवियों के कारण इंसानियत का जो नुकसान होता है बातचीत, संवाद और मेलजोल उसकी भरपाई कर देते हैं.

7 thoughts on “चिट्ठाकार भी इंसान होता है

  1. आप लोग सचमुच मे भाग्‍यशाली हैं जो इतने सारे चिट्ठाकार एक शहर में रहते हैं और मिलम जाते हैं । समागम और सम्‍वाद सदैव ही सम्‍भावनाओं के द्वार खोलते हैं । पहले लोग अपनी ओर से मिलते थे, अब प्रतीक्षा करते हैं कि कोर्इ आकर उनसे मिले । फलस्‍वरूप सबने अपने-आने एकान्‍त बुन लिए हैं ।
    लोग कहते हैं – जिन्‍दा रहेंगे तो फिर मिलेंगे । मेरी मान्‍यता एकदम इससे उलटी है – मिलते रहिए ताकि जिन्‍दा रह सकें ।

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  2. मैं तो इतना समझा, मेल-जोल और संवाद का महत्व कभी कम नहीं होता क्योंकि मेल-जोल और संवाद से पूर्वाग्रह टूटते हैं. छवियों के कारण इंसानियत का जो नुकसान होता है बातचीत, संवाद और मेलजोल उसकी भरपाई कर देते हैं.

    –बिल्कुल सत्य वचन. काफी बेहतरीन मिलन हुआ ऐसा लगता है तस्वीरों से. इन्तजार है विस्तृत रपट का. आभार इन तस्वीरों और इतना उम्दा सोच को लाने का.

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  3. संजय जी, आप बिल्कुल सही कह रहे हैं।

    “मैं तो इतना समझा, मेल-जोल और संवाद का महत्व कभी कम नहीं होता क्योंकि मेल-जोल और संवाद से पूर्वाग्रह टूटते हैं. छवियों के कारण इंसानियत का जो नुकसान होता है बातचीत, संवाद और मेलजोल उसकी भरपाई कर देते हैं.”

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  4. यह सही है की हम ब्लॉग के आधार पर ब्लॉगर की छवि घड़ते है.

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  5. लोग तो लिखेंगे लेकिन आपने इतने सस्ते में काहे निपटा दिया। 🙂

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