हाईड एक्ट में क्या छिपा है?

जवाहरलाल कौल

हाईड एक्ट का सारांश “कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस” ने उपलब्ध करवाया है. अमेरिकी कांग्रेस पुस्तकालय द्वारा संचालित यह सेवा सरकारी उपक्रम है जो अमरीकी कांग्रेस को सेवा प्रदान करता है.

विधेयक का नाम है- हेनरी जे हाईडः संयुक्त राज्य-भारत शांतिमय परमाणु उर्जा सहयोग-2006. इसमें पहले तो भारत और अमेरिका के लोकतांत्रिक हितों की समानता की बात की गयी है और स्वीकार किया गया है कि दोनों देशों के बीच शांतिमय परमाणु व्यापार से दोनों देशों का ही नहीं और देशों का भी भला होगा. हालांकि इस एक्ट में 275 धाराएं हैं और अधिकतर धाराओं में समझौतों के विवरण दिये गये हैं. कुछ धाराएं भारत के संदर्भ में हैं और उन्हीं के कारण यह विवाद खड़ा हुआ है.

धारा 103 के अनुसार इस समझौते का उद्येश्य है कि भारत और पाकिस्तान में परमाणु हथियारों और दूसरे उपकरणों के लिए सभी विखंडनीय सामग्री को समाप्त करवाना. अमरीका को यह भी सुनिश्चित करना है कि भारत में आयात होनेवाली सामग्री से विखंडनीय धातु (यूरेनियम, प्लूटोनियम) तो नहीं तैयार हो रहा है.

धारा 104 के अनुसार अमरीकी राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वह अंतरराष्ट्रीय परमाणु उर्जा एजंसी आईएईए के मानकों के अनुसार मुख्य उपायों के पालन करने की शर्त पर भारत के साथ परमाणु सहयोग का समझौता करे. ये उपाय होने चाहिए कि ऐसे उल्लंघन न किये जाएं जिनके कारण 10 मार्च 1978 के पहले और बाद की गितिविधियों के कारण भारत को परमाणु निर्यात बंद कर दिया गया था.

धारा 105 के अनुसार अमरीकी राष्ट्रपति को अधिकार दिया गया है कि वे भारत और अंतरराष्ट्रीय परमाणु उर्जा एजंसी के बीच परमाणु व्यापार की व्यवस्था करें.

धारा 106 के अनुसार नाभिकीय नियंत्रक आयोग यानि एनआरसी को हिदायत दी जाती है कि वह या उर्जा सचिव किसी भी ऐसे उपकरण, सामग्री या तकनीकि का भारत निर्यात या पुनर्निर्यात करने का लाइसेंस न दें जिनका संबंध यूरेनियम को सघन करने, एक बार उपयोग में आये ईंधन के पुनर्शोधन या भारी पानी के उत्पादन से हो.

धारा 108 में अमरीकी राष्ट्रपति को निर्देश है कि वे कांग्रेस द्वारा नियुक्त समिति को भारत में हो रही किसी महत्वपूर्ण परमाणवीय गतिविधि के बारे में जानकारी देते रहें. इन गतिविधियों में किसी अतिरिक्त परमाणवीय सुविधा या उपकरण का विकास, किसी भी देश द्वारा भारत को किसी भी प्रकार की परमाणवीय तकनीकि या सामग्री का निर्यात और किसी दूसरे देश से भारत के परमाणवीय रिश्ते कायम होने की बात शामिल है. इसी धारा में यह भी कहा गया है कि अमरीकी राष्ट्रपति अमरीकी प्रयासों के बारे में सरकार को एक रिपोर्ट सौंपें जिसमें यह बताया गया हो कि हथियारों के उत्पादन की दर को कम करने के लिए भारत या पाकिस्तान ने क्या कदम उठाये हैं.

धारा 110 के अनुसार अगर राष्ट्रपति को लगे कि इस एक्ट के पारित होने के बाद भारत ने परमाणु हथियार यानी बम विस्फोट किया है तो धारा 104 और 105 में जिस तरह की छूट दी गयी है उसे निरस्त माना जाए.

इस एक्ट का असली उद्येश्य यही है कि भारत पर इस तरह से अंकुश लगाया जाए कि वह दोबारा परमाणु विस्फोट न कर सके. एक्ट की विभिन्न धाराएं यह साफ करती हैं कि राष्ट्रपति इस तरह की व्यवस्था करेंगे कि वे अमरीकी कांग्रेस को लगातार इसकी खबर देते रहेंगे कि भारत में कोई अतिरिक्त परमाणवीय गतिविधि तो नहीं हो रही है. कहीं भारत ने किसी और देश के साथ परमाणवीय व्यापार तो नहीं बढ़ा रहा है, भारत में विखंडनीय सामग्री का भंडार तो नहीं बढ़ रहा है? यूरेनियम का कितना उत्खनन हो रहा है, या विखंडनीय सामग्री की मात्रा में लगातार कमी आ रही है या नहीं?

सवाल है अमरीकी राष्ट्रपति भारत के बारे में यह सब जानकारी कैसे जुटाएगा? इसके लिए अमरीका को अपनी एक निगरानी प्रणाली बैठानी होगी जिसमें भारत के सभी परमाणु प्रतिष्ठान, यूरेनियम भंडार, परमाणु अनुसंधान केन्द्र, सुरक्षा केन्द्र शामिल होंगे. बिना इन प्रतिष्ठानों पर निगरानी किये अमरीकी राष्ट्रपति सारी सूचनाएं अपने देश के नागरिकों या कांग्रेस को नहीं दे सकता. ऐसा नहीं होता है तो एक ही रास्ता बचता है कि भारत सरकार समझौतों के तहत बाध्य होकर उपरोक्त सभी जानकारियां अमरीकी राष्ट्रपति को दे दे.

(वरिष्ठ पत्रकार जवाहरलाल कौल दिनमान और जनसत्ता से जुड़े रहे. जनसत्ता में सहायक संपादक के पद से मुक्त होने के बाद अब स्वतंत्र लेखन.)

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