आपदा को निमंत्रण है यह परियोजना

(सुप्रीम कोर्ट में सरकार के हलफनामें के बाद यह बहस और तेज हो गयी है कि वहां रामसेतु है या नहीं. सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट पूरा होना चाहिए या नहीं? अंग्रेजी के एक व्यावसायिक अखबार मिंट ने 4 किस्तों में रामसेतु मसले पर रिपोर्ट प्रकाशित की है. इसी रिपोर्ट का हिन्दी सार, रिकार्ड के लिए.-संजय तिवारी)

दिसंबर 2004 का वह दिन किसी को नहीं भूलता जब समुद्र की प्रचंड लहरों ने भारत और श्रीलंका के तटीय इलाके को थर्रा दिया था. लेकिन नुकसान उतना हुआ नहीं जितना हो सकता था. छोटे-छोटे उथले द्वीप समूहों की एक रेखा जिसे एडम्स ब्रिज या रामसेतु कह रहे हैं, ने मानों उस ज्वार को थाम लिया. हहराता समुद्र जब तक श्रीलंका या केरल के तटीय इलाकों को छूता यह अपना वेग खो चुका था. अंतरराष्ट्रीय सुनामी समाज के पूर्व अध्यक्ष टी सत्यमूर्ति कहते हैं ” इन प्रवाल द्वीप समूहों के कारण तटीय केरला बच गया था.”

2005 से मूर्ति सेतुसमुद्रम परियोजना को देख रहे हैं. उनका मानना है कि 24 घंटे की यात्रा बचाने के उद्येश्य से चल रही सेतुसमुद्रम परियोजना हमारे लिए खतरनाक साबित हो सकती है. ऐसा कहनेवाले वे अकेले नहीं हैं. कई और वैज्ञानिक हैं जो इस परियोजना में दिखाई जा रही जल्दबाजी से हैरान हैं. वे भी यही मानते हैं कि परियोजना शुरू करने से पहले विधिवत अध्ययन नहीं किया गया.

भूविज्ञानी कहते हैं कि जहां यह परियोजना चलाई जा रही है उस जगह पर सक्रिय ज्वालामुखी और प्लेट्स खिसकने का भी खतरा है. पर्यावरण विज्ञानी कहते हैं कि परियोजना से पर्यावरण चौपट हो जाएगा तो मेरीन से जुड़े विशेषज्ञ मानते हैं कि यह चैनल हमारे लिए आपदा साबित हो सकता है. जियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया(GSI) को भी ऐतराज है कि इतनी बड़ी परियोजना शुरू करने से पहले उन्हें एक बार भी नहीं पूछा गया.

जीएसआई के पूर्व निदेशक आर गोपालकृष्णन कहते हैं कि “इस सेतु के कारण ही 2004 में हजारों जिंदगियां बच गई थीं.” टी सत्यम मूर्ति बताते हैं कि 2004 में सुनामी आने के बाद सेतुसमुद्रम कारपोरेशन लिमिटेड ने उन्हें पत्र लिखा था और अपनी सलाह देने के लिए कहा था. वे ओट्टावा विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं और उन दिनों कनाडा में थे. पत्र उनके पास दो महीने बाद पहुंचा. तब तक जवाब देने का समय (28 फरवरी) निकल चुका था. फिर भी उन्होंने ईमेल से जवाब दिया और कहा कि अगर सेतुसमुद्रम परियोजना पर काम करते हुए इस चैनल को चौड़ा और गहरा किया गया तो इंडोनेशियन सुनामी को एक वैकल्पिक मार्ग मिल जाएगा. मैने साफ कहा था कि इतना बड़ा खतरा मोल नहीं लेना चाहिए. मैंने कहा कि मैं जो बात कह रहा हूं उसे कंम्प्यूटर सिम्युलेटर पर दिखा सकता हूं लेकिन मेरी बात सुनने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ.”

सेतुसमुद्रम परियोजना के लिए जिस अध्ययन को आधार बनाया गया है वह नागपुर की नीरी नामक संस्था ने किया है. नीरी ने जिन आंकड़ों को अपना आधार बनाया है वे नेशनल इंस्टीट्यूट आफ ओशियन टेक्नालाजी(Niot) के निदेशक एस काथिरोली द्वारा उपलब्ध करवाये गये हैं. कथिरोली ड्रिगिंग कारपोरेशन आफ इंडिया (डीसीआई) के बोर्ड आफ डायरेक्टर में भी हैं जो कि यहां उत्खनन का कार्य कर रहा है. जब वे Niot के निदेशक थे और उनके द्वारा दिये गये आंकड़ों को आधार बनाकर नीरी ने परियोजना का अध्ययन किया था उसके बाद ही डीसीआई को यहां उत्खनन कार्य के लिए 2600 करोड़ का ठेका मिला. कथिरोली की रिपोर्ट कहती है कि रामसेतु नाम के वहां किसी प्रकार के चट्टान नहीं है. लेकिन इसी साल की शुरूआत में उत्खनन के दौरान एक क्रेन से इतनी ताकतवर चट्टान टकराई कि उसकी आरी टूट गयी. बहरहाल कथिरोली कोई भी टिप्पणी करने से इंकार करते हैं.

अब जबकि चट्टानों को काटकर कहाने में दिक्कत का सामना हो रहा था तो सरकार ने निर्णय किया कि वह विस्फोटकों का इस्तेमाल करेगी. स्थानीय स्तर पर अफवाह है कि सरकार इस काम में नेवी की मदद ले रही है और रातों-रात पूरे पुल को उड़ाने की योजना बनी रही है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के 14 सितंबर तक लगाये गये अस्थाई स्थगन आदेश से अगर सरकार की कोई ऐसी योजना थी भी, तो वह फलीभूत नहीं हो सकी. अब नीरी कहता है कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने विस्फोट से पुल को उड़ाने का आदेश भी दे दिया तो वह अपनी संस्तुति वापस ले लेगी. क्योंकि यह पूरा इलाका समुद्री विविधता का स्वर्ग है. कुछ प्रजातियां तो प्रथम श्रेणी में आती हैं. अगर विस्फोट होता है तो उन प्रजातियों पर संकट खड़ा हो जाएगा. आपको भी यह मालूम होना चाहिए कि प्रथम श्रेणी की प्रजातियों में शेर, बाघ और चिंकारा जैसे जानवर आते हैं और उन्हें भारतीय वन्यजीव कानूनों के तहत संरक्षण प्राप्त है.

ग्रीनपीस की कार्यकर्ता अरीबा हामिद कहती हैं कि ” मन्नार की खाड़ी में 3600 प्रकार के दुर्लभ फ्लोरा-फौना हैं, पहले ही यहां की जैव विविधता खतरे में हैं. ऐसे में सेतुसमुद्रम परियोजना इस पर्यावरण के लिए घातक साबित होगी.” आज से सात साल पहले टी आर बालू भी इस बात से सहमत थे. तब वे तमिलनाडु के पर्यावरण मंत्री थे. दिसंबर 2000 में मन्नार बायोडाइवर्सिटी रिजर्व ट्रस्ट का उद्घाटन करते हुए कहा था ” मन्नार की खाड़ी में फ्लौरा-फाना की विविधता यहां की पूंजी हैं. जो शेवाल, समुद्री घास, मूंगा-घोंघा आदि के रूप में यहां सुरक्षित हैं. ” उस समय उन्होंने भी यह खतरा महसूस किया था कि इस इलाके में बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप से यहां की जैवविविधता को खतरा पैदा हो गया है. लेकिन अब वे ऐसा महसूस नहीं करते. अब वे सड़क और पोत परिवहन मंत्री हैं और उन्हें सेतुसमुद्रम परियोजना में व्यावसायिक फायदे नजर आते हैं, पर्यावरण का नाश नजर नहीं आता.
priyanka.p@livemint.com

6 thoughts on “आपदा को निमंत्रण है यह परियोजना

  1. इन तर्कों की वैधता का मूल्‍यांकन शायद एक विशेषज्ञता की मांग करता है, जिसका अभाव खुद में पाता हूँ पर इतना तय है कि वर्तमान में बड़े विकास प्रोजेक्‍टों को सदैव ही पर्यावरणीय आपत्तियों का सामना करना पड़ता है, पर्शवरणीय लॉबी का अपना लोकतांत्रिक स्‍पेस है तथा वह बने रहना चाहिए।
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    पर द्वीप समूह जैसा आपने बताया उसका अचानक ‘पुल’ हो जाना और पर्यावरणीय कार्यकर्ताओं की जगह हिंसक त्रिशूलधारी बजरंगियों का होना हमें तो ठीक नहीं लगता…
    पर्यावरण ही अगर तर्क है तो यमुना रिवरबैड पर अक्षरधाम मंदिर बनते समय ये पर्यावरणविद बजरंगी कहॉं थे।

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  2. यमुना का सवाल सही है और विरोधवश कभी अक्षरधाम नहीं गया. लेकिन सेतुसमुद्रम को ज्यादा गंभीरता से लेने की जरूरत है. यह परियोजना धोकाधड़ी वाला मामला लगता है.

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  3. साब मामला जो भी हो सेतु पुल हो या न हो,पर मसला है सिर्फ व्यवसाय का दुनियाँ की कितनी सारी चीजें बर्बाद हुई है….जितने आदिवासी मारे गये है,जितनी प्राकितिक संपदा नष्ट हुई है उसका कोई आंकलन नहीं है पर फायदा चंद लोगों का हुा है

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  4. आपका लेख रामसेतु संबंधी भिन्न पहलू पर नजर डालता है। धन्यवाद इसे प्रस्तुत करने के लिए।

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