अब बीरबल मट्ठा नहीं बेंचते

बीरबल चौरसिया पिछले 40 सालों से इंडियन एक्सप्रेस बिल्डिंग के सामने पान के बहुउद्देश्यीय खोमचे सहित मौजूद हैं. इसी खोमचे पर बैठे-बैठे उन्होंने आपातकाल और इंडियन एक्सप्रेस का उत्कर्ष भी देखा और इंडियन एक्सप्रेस समूह को जमींदोज होते भी देख रहे हैं. अब इस भवन में ज्यादातर निजी कंपनियों के दफ्तर हैं और एक्सप्रेस समूह ने अपने अखबारों के दफ्तर यहां-वहां भेज दिया है. ऐसा करने के पीछे कारण शायद इस जगह का व्यावसायिक महत्व है जोकि दिल्ली के केन्द्र आईटीओ पर होने के कारण बढ़ जाता है. बहरहाल बीरबल कल भी थे, आज भी हैं. पर अब शायद नहीं रहेंगे….

उन्होंने तय किया है कि अब वे गांव लौट जाएंगे. चालीस सालों के अपने संघर्ष में उन्होंने अपनी दो बेटियों को सी.ए. बनाया और बेटे को व्यवसायी. दोनों बेटियां ऊंची फर्मों में नौकरी करने लगी हैं और इतना पैसा पाती हैं कि बहुत खर्चीला जीवन जी सकती हैं. यानी उनकी नजर में अब बच्चों को सम्मानजनक जीवन दे दिया है. अब उनके सामने दिल्ली छोड़ने के अलावा कोई रास्ता नहीं है. लेकिन दिल्ली छोड़ने की उनकी योजना अभी शायद आकार न ले क्योंकि जाने से पहले वे एक ट्रैक्टर खरीदना चाहते हैं. खैर, बीरबल की यहां चर्चा दो कारणों से कर रहा हूं.

एक, उन्होंने मट्ठा बेचना छोड़ दिया है. पिछले चार सालों से वे गर्मियों में आम पना, बेल का शर्बत और मट्ठा तथा सर्दियों में गाजर की शिकंजी बेचते थे. हालांकि वे कोल्ड ड्रिंक्स भी रखते थे लेकिन जान-पहचान का कोई आ जाता तो उसे सलाह देते थे कि कोल्ड्र ड्रिंक्स से ज्यादा फायदेमंद है मट्ठा. फिर मट्ठे के फायदे भी बताते थे. जिनकी सुगर बढ़ी हो, गैस की शिकायत हो उन्हें नियमित सुबह खाली पेट मट्ठा पीना चाहिए. बहुत फायदा होता है. मैं इसे बीरबल का नुख्सा ही मानता था लेकिन एक दिन एक महर्षि महेश योगी के निजी वैद्य एस एन राजू जो कि बहुत अच्छे नाड़ी विशेषज्ञ हैं, उन्होंने भी यही बात कही तो मुझे लगा बीरबल सही कहते हैं. इसी तरह बेल के शर्बत और आम पना के बारे में उनकी जानकारी काबिले तारीफ है.

लेकिन अब यह उन्होंने बंद कर दिया है. अब वे खालिस कोल्ड-ड्रिंक्स ही बेचते हैं. कहते हैं उन कामों में बहुत झंझट है और समय भी नहीं मिलता. उनकी व्यस्तता बढ़ गयी है यह तो लगता है लेकिन बातचीत में कुछ और भी कारण समझ में आते हैं. दिल्ली सरकार और एमसीडी ने जिस तरह से उन्हें और अन्य रेहड़ीवालों को तंग कर रखा है उससे उन्हें अब यकीन हो चला है कि यह ढीहा जाएगा. अभी हाल में ही एमसीडी ने एक 9 पेज का परिपत्र इंटरनेट पर जारी किया है जिसे हर रेहड़ीवाले को भरकर जमा करवाना है. अब एक तो यह अंग्रेजी में है और दूसरे इंटरनेट पर. खैर किसी तरह जुगाड़ करके वह परिपत्र हासिल भी कर लिया तो अब उसे जमा करवाने के लिए आवास का प्रमाणपत्र चाहिए. उनके पास तो स्थाई आवास है, गाजियाबाद में शायद कोई रास्ता निकल आये लेकिन उन रेहड़ीवालों को अव्वल तो पता नहीं चलेगा कि इंटरनेट पर सरकार ने कुछ नये दिशा-निर्देश जारी किये हैं अगर पता भी चल गया तो दिल्ली में आवास का प्रमाणपत्र कहां से लाएंगे?

बकौल बीरबल सरकार का अघोषित ऐलान है कि रेहड़ीवालों दिल्ली छोड़ो. क्योंकि दिल्ली अब मालदारों का शहर होकर रहेगा. शायद इसी विरोध में उन्होंने मट्ठे, शिकंजी, बेल के शर्बत को तिलांजलि दे दी है.

5 thoughts on “अब बीरबल मट्ठा नहीं बेंचते

  1. मालदारों का नहीं बल्कि काम न करने वालों का शहर बन कर रह जाने वाला है. अधिकतर कामकाजियों ने यहां से अपने आपको समेटना शुरू कर दिया है. कम्युनिकेशन के हालात इतने अच्छे हो गये हैं कि कहीं भी हों, कुछ फर्क नहीं पड़ता. क्यों इस शहर में अवांछित बन कर रहें?

    इंशा जी उठो अब कूच करो इस शहर में दिल का लगाना क्या.

    मैं भी गोवा या भोपाल जाने की कल्पना करता रहता हूं

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  2. 9 पेज का परिपत्र इंटरनेट पर
    बहुत खूब गुरु सरकार ने आखिर मान ही लिया कि देश की सारी जनता इंटरनेट में पारंगत हो चुकी है. सभी को बधाई. ब्लागियों को तो कूट कूट कर बधाई.
    बढिया खींचे हैं. इन असली लोगों के बारे में लिखना जारी रखें

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  3. अपन कहा जायेगे जी ,हमारा तो जीना यहा मरना यहा,इसके सिवा जाना कहा..?

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  4. अच्छा है, लेकिन बीरबल चौरसिया के दिल्ली छोड़ने की उनकी योजना से दुख हो रहा है.

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