रामसेतु और भाजपा

आजकल राष्ट्रवादी पार्टी भाजपा के नेता रामसेतु बचाने का बीड़ा उठाये घूम रहे हैं. उनके वक्तव्य सुने तो लगता है कि उनसे ज्यादा रामप्रेमी कोई हो नहीं सकता जो श्रीराम की धरोहर को बचाने के लिए किसी भी हद से गुजर जाने के लिए तैयार हैं. लेकिन भाजपावालों जनता की स्मृति इतनी कमजोर नहीं है. वह जानती है कि इस तथाकथित सेतुसमुद्रम परियोजना को मंजूरी भी भाजपा के एक प्रधानमंत्री ने दी थी जिनका नाम है अटल बिहारी वाजपेयी. और उस समय यही भाजपाई सेतुसमुद्रम परियोजना के पक्ष में लामबंदी कर रहे थे.

1998 में में नीरी ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी और उस समय प्रधानमंत्री थे अटल बिहारी वाजपेयी. नीरी ने उस रिपोर्ट में कहा था कि “एडम ब्रिज ढांचे (जिसे रामसेतु कहा जा रहा है) का पुरातात्विक महत्व नहीं है लेकिन नहर की खुदाई के दौरान सांस्कृतिक और पुरातात्विक महत्व की वस्तुएं मिल सकती हैं।”

2003 में जिस सरकार ने परियोजना को हरी झंडी दिखाई उस सरकार के मुखिया अटल बिहारी वाजपेयी थे. मुझे याद है उस समय विश्व हिन्दू परिषद ने आपत्ति की थी और अटल-बिहारी वाजपेयी और अशोक सिंहल के बीच बढ़ती दूरियों का एक कारण सेतुसमुद्रम परियोजना को मंजूरी भी थी.

खास बात यह भी है कि जब नीरी के सामने स्थानीय लोग अलाइनमेंट बदले जाने का ज्ञापन दे रहे थे तब एनडीए सरकार का प्रमुख घटक दल भाजपा चुप थी। नीरी ने रामसेतु को तोड़ने वाले अलाइनमेंट को मंजूरी दे दी। यही नहीं अन्नाद्रमुक प्रमुख जे. जललिता अब सर्वोच्च अदालत जाकर योजना का काम रोकने की गुहार लगा रही हैं लेकिन तब उनके ही दबाव में वाजपेयी सरकार ने योजना को मंजूरी दी थी। तमिलनाडु विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर उसे केंद्र को भेजा था। जिस सेतुसमुद्रम परियोजना को लेकर बवाल मचा है उसकी नींव वाजपेयी ने वर्ष 2000-01 में रखी थी जब वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने योजना की तकनीकी सुलभता (फीजिबिलिटी) अध्ययन के लिए बजट में 4.8 करोड़ रूपए की घोषणा की थी। उसी फीजिबल रिपोर्ट पर मनमोहन सरकार ने तमिलनाडु के सांसदों खासकर डीएमके के दबाव में पहले परियोजना को कैबिनेट की मंजूरी दिलाई फिर दो जुलाई 2005 को परियोजना का उद्घाटन किया।

भारत-श्रीलंका के बीच उथले सागर को गहरा कर बड़े जहाजों के गुजरने लायक बनाने की योजना पर 1860 से ही विचार चल रहा है। उस वक्त भी मद्रास सरकार का ही दबाव था। अंग्रेजी हुकूमत ने 1860 से लेकर 1922 तक इस परियोजना के लिए नौ प्रस्ताव तैयार कराए थे। आजादी के बाद भारत सरकार ने भी नौ प्रस्ताव तैयार कराए। बाद में मार्च 1997 में तूतीकोरीन पोर्ट ने विभिन्न प्रस्तावों वाले छह अलाइनमेंट नीरी को सौंपे और उनका पर्यावरण अध्ययन करने को कहा था। नीरी ने दिसम्बर 1998 में अपनी रिपोर्ट पेश की। भाजपा आज जिस एक अलाइमेंट की बात कर रही है उसे वर्ष 1860 में अंग्रेज सरकार के कमांडर टेलर ने प्रस्तावित किया था। यह अलाइनमेंट पब्बन द्वीप से गुजरता। इससे रामसेतु को कोई नुकसान नहीं हो रहा था लेकिन नहर की खुदाई के दौरान सांस्कृतिक और पुरातात्विक वस्तुएं मिल सकती हैं। जनभावना को देखते हुए नीरी ने मंदिर को बचाते हुए अलाइनमेंट छह को मंजूरी दे दी जो घनुष्कोटि और मन्नार के बीच 35 किलोमीटर लम्बा है। यह अलाइनमेंट चार का ही संशोधित रूप है। नीरी ने अपनी रिपोर्ट के पैरा 35 में लिखा है कि “अलाइनमेंट छह से सामने वाले ढांचे का कोई पुरातत्विक महत्व नहीं है। हालांकि खुदाई के समय ढांचे के अस्तित्व के लेकर सांस्कृतिक व पुरातत्विक विवाद खड़ा हो सकता है।”
जिस अलाइनमेंट पर काम किया जा रहा है शायद सरकार ने वह इसलिए भी चुना है कि अमेरिका की नौसेना ने 19 जून को भारत और श्रीलंका की सरकारों को पत्र लिखकर साफ किया था कि वह दोनों देशों के बीच हुई ऐतिहासिक जल संधि को नहीं मानेगा इसलिए सरकार को अंतरराष्ट्रीय सीमा वाले अलाइनमेंट को स्वीकार करना पड़ा जिससे रामसेतु को तोड़ा जा रहा है।
भाजपावालों, सत्ता पाने के लिए राम को कितनी बार बाजार में नीलाम करोगे?

3 thoughts on “रामसेतु और भाजपा

  1. बहुत बढ़िया!!

    राजनीति में धर्म का घालमेल करने वालों की पोल खुलनी जरुरी है!!

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  2. पोल क्या बीजेपी वालों का तो आजकल सबकुछ खुला हुआ है।

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