अदालतें पवित्र गाय नहीं हैं

आज मिड-डे के दो पत्रकारों, एक कार्टूनिस्ट और मिड डे के प्रकाशक को दिल्ली उच्च न्यायालय ने चार-चार महीने की सजा सुनाई. हालांकि 10-10 हजार के निजी मुचलके पर उन्हें छोड़ दिया गया और अब वे 28 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे, फिर भी सवाल उठता है कि क्या न्यायपालिका पवित्र गाय हैं जिन पर अंगुली नहीं उठाई जा सकती?

यह बहुत गंभीर घटना है. इसलिए नहीं कि किसी पत्रकार को सजा सुनाई गयी है. बल्कि इसलिए कि ऐसे पत्रकारों को सजा सुनाई गयी है जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ जांच-पड़ताल की और ऐसे तथ्य सामने लाये जिससे दिल्ली में हुई सीलिंग के सवाल पर सब्बरवाल शक के घेरे में आते हैं. उनके बेटों ने जिस तरह से पैसा बनाया है उसकी खोजबीन मिड-डे के पत्रकारों ने ही की थी. आज देश की कई हिन्दी अंग्रेजी पत्रिकाएं इस बात को छाप चुकी हैं कि किस तरह सब्बरवाल दिल्ली में सीलिंग के आदेश दे रहे थे और उनके बेटे भवन निर्माण उद्योग में अपनी पैठ बना रहे थे.

क्या इंसान की बनाई किसी व्यवस्था पर इंसान सावल नहीं खड़े कर सकता? अगर किसी अदालत के निर्णय से मेरे जीवन पर फर्क पड़ता है तो क्या मुझे हक नहीं है कि मैं उसका विरोध करूं? और फिर अदालतें कितनी “माननीय” रह गयी हैं इस बारे में विचार करने की जरूरत है. ऐसे कुछ निर्णयों की जांच-पड़ताल होनी चाहिए जो जनभावना के खिलाफ होते हैं. उन निर्णयों के पीछे कौन से तत्व काम कर रहे होते हैं इस बारे में लोगों को पता लगना चाहिए. हाईकोर्ट कहता है कि पत्रकारों और अखबार के प्रकाशक ने लक्ष्मणरेखा पार कर दी है. क्या हाईकोर्ट बताएगा कि वह लक्ष्मणरेखा क्या है?

आखिर क्या कारण हैं कि सब्बरवाल पर पत्रकारों द्वारा उठाये गये सवालों पर जांच करने की बजाय उलटे पत्रकारों को ही दोषी माना जा रहा है. ऐसे दौर में जब पत्रकारिता खुद अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है पत्रकारों को इस तरह सजा देना मनोबल को तोड़ता है. ऐसे में जब पत्रकारिता भी पीआर एजंसियों के हवाले होती जा रही है, किसी ऐसे पत्रकार को मानहानि का दोषी करार दे देना जो एक अदालती फैसले की असली सच्चाई को सबके सामने लाता है, कहीं से स्वागतयोग्य नहीं है.

5 thoughts on “अदालतें पवित्र गाय नहीं हैं

  1. अमेरिका में सर्वोच्‍च है वहॉं कि न्‍यायापालिका, और भारत में सर्वोच्‍च है भारत का सविधान जो जरूरत पढने पर न्‍यायपलिका को व्‍यवस्‍थापतिका और कार्यपालिका से ऊँचा स्‍थान प्रदान करता है।

    संभव है कि आप जाने-माने पत्रकार होंगे पर शायद कानूनू नुक़्तों की जानकारी आपको कम ही है। भारत में लोकतंत्र पत्रकारों के बल पर नही चलता है चलता है स‍ंविधान के बल पर। नही तो पत्रकारों ने तो ने समाचारो की जगह गन्‍दगी(सेक्‍स,और वाहियात चीजे ) परोसने पीछे नही रहा होता। पत्रकारों को भी तो कामने खाने का जरिया ही सनसनी खबरे है। अब सन्‍सनी न्‍यायालय में खोजगे और कोर्ट सोंटा चला देगी तो आप कहोगे, यह सीधी गाय रही रही नही गई। काहे लिये गाय को सांड का रूप धारण करवाते हो भाई।
    पेंट पालने के लिये उमा खुराना जैसे बहुत मिलेगे, कम से कम अब गाय को सांड तो मत बनाओं भाई। 🙂

    Like

  2. महाशक्ति की टिप्पणी से साफ है कि उन्होंने पूरा नहीं पढ़ा. खासकर यह लाईन “ऐसे दौर में जब पत्रकारिता खुद अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है किसी साहसी पत्रकार को इस तरह सजा देना मनोबल को तोड़ता है.”

    Like

  3. जहां-जहां मनुष्‍य है, वहां-वहां मनुष्‍यगत कमजोरियां हैं । न्‍यायपालिका में भी मनुष्‍य ही बैठे हैं । वे भी कमजोरियों के पुतले ही हैं । यदि ऐसा नहीं होता तो अपील के प्रावधान करने ही नहीं पडते । यदि सर्वोच्‍च न्‍यायालय क निर्णयों के विरुध्‍द अपील करने के प्रावधान होते तो हम देखते कि वहां के भी कई निर्णय उलट दिए गए हैं ।
    भले ही ये ‘न्‍यायालय’ हैं लेकिन वे न्‍याय ही करते हैं – इस पर सन्‍देह व्‍यक्‍त कियका जा सकता है । हां, इसमें कोई सन्‍देह नहीं कि ये निर्णय देते हैं ।

    Like

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s