कानून का शासन या धर्म का अनुशासन

सात साल पहले की बात है. उन दिनों मैं बंबई में था. रोज वीटी स्टेशन से उतरकर पैदल कालबादेवी जाता था. रास्ते में क्राफर्ड मार्केट और पुलिस मुख्यालय है. जिस ओर पुलिस मुख्यालय है वहीं से सड़क घूम जाती है. रोड के घूमने के कारण भवन भी तिकोण में बना है. उस भवन की चारदीवारी के अधिकांश हिस्सों को लोगों ने पेशाबघर बना रखा था. मैं रोज वहां से निकलता था इसलिए मेरे लिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी. वहां बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा हुआ था कि यहां पेशाब करना मना है. यह दण्डनीय अपराध है. और वैसे भी पुलिस मुख्यालय है. लेकिन लोग मानते न थे. वहां से गुजरते हुए बड़ी बदबू भी आती थी.

एक-दो महीने मैं उधर से गया नहीं. शायद जरूरत न पड़ी हो. दो महीने बाद उधर से गुजरा तो मुझे बहुत सुखद आश्चर्य हुआ. वहां कोई पेशाब नहीं कर रहा था. दीवारें साफ-सुथरी थीं और कोई बदबू भी नहीं आ रही थी. और जानते हैं यह कैसे संभव हुआ? दीवारों पर सभी तरह के देवताओं के चित्र लगा दिये गये थे. हर धर्म के चित्र और आयतों की टाईल्स दीवारों पर लगा दी गयी थी. यह है भारत में धर्म का अनुशासन. कानून की नियमावली जो काम नहीं करवा सकी वह चंद रूपयों से खरीदी गयी टाईलों ने कर दिखाया. इसके बाद तो मैंने दिल्ली के कई सरकारी दफ्तरों की सीढि़यों पर ऐसे चित्र लगे देखे. इन चित्रों के कारण वहां सफाई बनी रहती है.

इस बात को समझने की जरूरत है. इसलिए कानून की बात करनेवाले लोगों को पहले मनुष्य के स्वभाव के बारे में समझना होगा. खासकर भारत में तो यह और भी जरूरी है. आम भारतीय स्वभाव से धार्मिक होता है. धर्म के रास्ते कही गयी बात उसे ज्यादा ठीक से समझ में आती है. ऐसा शायद इसलिए भी है क्योंकि भारतीय दिमाग से ज्यादा दिल की कही करता है. बौद्धिक विलास को भारत में सदा ही दूसरी श्रेणी का कार्य माना गया है. असल बात है श्रद्धा और विश्वास. बुद्धि विलास तो दूसरे दर्जे पर आता है. इसका कभी तिरस्कार नहीं किया गया लेकिन बुद्धि को कभी सबसे पहले भी नहीं रखा गया. जो दिल को भली लगे उसे स्वीकार करने में ज्यादा तर्क नहीं करना चाहिए. क्योंकि लाख तर्क के बावजूद आप जहां पहुंचते हैं वह वही होता है जिसके लिए आप तर्क करते हैं. इसलिए आम भारतीय ज्यादा तर्क नहीं करता. सीधे स्वीकार या अस्वीकार से अपना काम चलाता है.

कानून का शासन एक आम भारतीय को कभी समझ में नहीं आता. भारत में कानून का उपयोग न्याय पाने के लिए कम ही होता है. भारत में कानून का उपयोग परेशान करने के लिए होता है. दूसरों को फंसाने के लिए होता है. 100 में 10 केस ही ऐसे होंगे जहां न्याय की मांग की जा रही हो. नहीं तो सब फंसाने-गिराने का खेल है. गाधी जी बैरिस्टर थे. उनसे बेहतर इस न्याय प्रणाली को कौन जान सकता था. और हिन्द स्वराज में उन्होंने साफ कहा कि हमारे ज्यादातर झगड़े वकीलों के कारण हैं. वकील हट जाएं तो हमारे झगड़े भी खत्म हो जाएंगे. वैसे भी वकालत पेशा है और न्याय पाने की लड़ाई कभी पेशा नहीं हो सकती. न्याय का अधिष्ठान तो बहुत नैतिक होता है. नैतिक पुरूष ही न्याय-अन्याय का फैसला कर सकता है. पेशेवर तो अपना काम करता है. उसके बदले में उसे पैसे मिलते हैं इसलिए उससे यह उम्मीद करना कि वह न्याय की बात करेगा, उसके साथ सरासर ज्यादती होगी. और न्याय यानी क्या?
आदि काल से मानव समाज में हमेशा एक न्याय संहिता चली आ रही है. ऐसी संहिताएं सभी युगों में सभी संस्कृतियों में पायी जाती हैं. न्याय की जो पद्धति होती है उसका आधार होता है कानून. और कानून बनानेवाले हमेशा उस युग के लोग होते हैं. उस युग में जो शक्तिशाली समाज है, बोलनेवाला समाज है, राजनीतिक रूप से मुखर समाज है वह उस कानून को पास करवाता है.

आज जिन कानूनों के आधार पर हमारी अदालतें फैसला देती हैं वह कल का कानून नहीं हो सकता. समाज बदलेगा तो कानून भी बदलेंगे. आज से दस साल पहले कोई साईबर कानून की कल्पना नहीं कर सकता था. आज हमें इसकी सख्त जरूरत महसूस होती है. तो ऐसे ही समाज के काम काज में जब चीजें जुड़ती हैं तो हमें नयी संहिताओं की जरूरत होती है. और पुरानी चीजों के लिए बनाये गये कानून बेकार हो जाते हैं.

जिस प्रकार मनु की न्याय व्यवस्था पर हम आज प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं उसी प्रकार कोई भी न्याय संहिता जो किसी विशेष युग के समाज के लिए विकसित हुई है वह उसी युग विशेष के लिए प्रासंगिक होती है. न्याय का संबंध एक समय की वर्तमान सामाजिक स्थिति और मूल्यों की सही या गलत मान्यताओं से होता है. जब समाज में परिवर्तन आते हैं तो इन मान्यताओं में भी परिवर्तन आते हैं. इस लिहाज से कानूनों की परिभाषाएं भी बदल जाती हैं. लेकिन शास्वत सत्य को कभी दरकिनार नहीं किया जा सकता.

ये शास्वत सत्य मानवीय आधारों पर विकसित होते हैं. अनुभव से निकलते हैं और परंपरा में ढलते चले जाते हैं. जब किसी युग का कानून निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए ऐसे आडंबर रचता है कि शास्वत सत्य पर सवाल खड़े हो रहे हों तो ऐसे कानूनों को तिलांजलि दे देने में कोई हर्ज नहीं है. व्यवस्था तिलांजलि नहीं देता तो समाज उसको खारिज कर देता है.

3 thoughts on “कानून का शासन या धर्म का अनुशासन

  1. अच्छा लिखा है।

    किन क़ानूनों के संदर्भ में आपने इन विचारों को रखा है, यह भी खुलासा करते तो बेहतर रहता।

    क्या आपको भारत का संविधान वर्तमान संदर्भ में देश के कानूनों के ढांचे के लिए प्रासंगिक और पर्याप्त आधार नहीं लगता है? भारत में कोई भी क़ानून उस सीमा तक अवैध माना जाता है जिस सीमा तक वह संविधान के उपबंधों का उल्लंघन करता हो।

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  2. इस धर्म के अनुशासन वाली मानसिकता के चलते ही तो अपने देश में हर गली, चौराहे और पेड़ के नीचे अक्सर एक पत्थर पर गेरु पोत कर बजरंग बली विराजमान कर दिए जाते हैं जहां कुछ महीने/साल बाद चंदे से बना एक मंदिर नज़र आता है। फ़िर उस मंदिर से ट्राफ़िक में चाहे जितनी भी दिक्कत हो, होती रहे!!

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