अरे इन दोऊन राह न पाई

“जो हिन्दू भावनाओं का ख्याल रखकर नहीं बोलेगा तो उसकी बोली अंतिम होगी.” यह उस भाषण का एक अंश है जो राजघाट पर कल सुबह हो रहा था. दिल्ली के लगभग आठ संस्थाओं के प्रतिनिधि यहां मौजूद थे. लगभग हजार लोग थे. साधु-संत, बालक-बूढ़े, स्त्रियां-युवतियां और नौजवान. वे रामसेतु को तोड़े जाने का विरोध कर रहे थे. इसमें एक भी संस्था आरएसएस से जुड़ी हुई नहीं थी. सभी धार्मिक संस्थाएं थीं और उनके पीछे पूंजी का दान करनेवाला वणिक समाज था. बाकी जो लोग दिख रहे थे वे स्वयंप्रेरित कम ही लग रहे थे. फिर भी माहौल उन्मादी था.

देशभर में इस तरह की सभाएं होनी शुरू हो गयी हैं. ज्यादातर सभाओं के पीछे आरएसएस की प्रेरणा है लेकिन जो लोग इन सभाओं में आ रहे हैं वे आरएसएस से जुड़े हुए लोग हों यह जरूरी नहीं. यहां दिखनेवाले अधिकांश लोग सामान्य लोग हैं. जो यहां अपनी निर्मल भावना के साथ आते हैं. उन्हें यह शायद कभी समझ में नहीं आता कि उनको बरगलाया जा रहा है. उनके यहां तक लाने के पीछे एक राजनीतिक मकसद और सत्ता की भूख है. बरगलाने और सत्ता में बैठने के बीच इतना लंबा फासला होता है कि आम आदमी की स्मृति दोनों को जोड़ नहीं पाती. और तब तक गंगा में भी काफी पानी बह चुका होता है. जैसा कि राममंदिर आंदोलन के साथ भाजपा ने किया.

लालकृष्ण आडवाणी बेहद अधार्मिक व्यक्ति हैं. दुर्भाग्य से उन्हें उस भारत की समझ भी नहीं है जो गुप्त सरस्वती के रूप में प्रवाहित होती है. लेकिन उन्हें राम मंदिर आन्दोलन के नायक के रूप में प्रस्तुत किया गया. गलत नायक कितना घातक होता है इसका अंदाज तब लगता है जब यह पता चलता है कि सरकार में आने के बाद विवादित भूमि पर राम मंदिर के प्रस्ताव पर सबसे ज्यादा रोड़ा आडवाणी ने अटकाया. महंत रामचंद्र परमहंस दास अपने आखिरी दिनों में रोते-रोते कहते थे कि अब मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं है. तुमलोग सरकार में हो, गैरविवादित भूमि को ही न्यास के हवाले कर दो. जो कि केन्द्र सरकार कर सकती है. लेकिन भाजपा ने कोशिश भी नहीं की. सुना है अटल बिहारी वाजपेयी इसके लिए जरूरी कानूनी संशोधन और संवाद के लिए तैयार भी हो गये थे. लेकिन आडवाणी ने बात आगे नहीं बढ़ने दी.

अब वही आडवाणी रामसेतु का मुद्दा उठाना चाहते हैं. इस बार सीधे नहीं. नेपथ्य से. सलाहकार उन्हें सलाह दे रहे हैं कि एक रथयात्रा और हो जाए. हो सकता है चुनावों की संभावना प्रबल हो जाने पर आडवाणी जी कोई रथयात्रा के लिए डोल ही आयें. लेकिन पक्का है एक बार फिर देश छला जाएगा. राम से न भाजपा को कुछ लेना-देना है और न की कांग्रेस को. करूणानिधि को तो बिल्कुल हो ही नहीं सकता. कांग्रेस का हलफनामा एक चाल है और भाजपा का पैंतरा उस चाल का जवाब. करुणानिधि जैसे लोग ऐसे मौकों की तलाश में स्वाभाविक रूप से रहते हैं क्योंकि उन्हें अपने वोटबैंक की चिंता है. मारे तो जाएंगे रामभक्त.

एक बार फिर वही भाजपा और वही आडवाणी रामभक्तों में ज्वार उठाने की तैयारी कर रहे हैं. यह ज्वार तब तक रहेगा जब तक अगला चुनाव नहीं हो जाता. हो सकता है तब तक आडवाणी और अन्य भाजपाई रामनाम अलापते रहें लेकिन जिस दिन चुनाव होगा उस दिन के बाद न राम याद रहेंगे और न राम का काम. सबसे ज्यादा नुकसान उन रामभक्तो को होगा जो एक बार अयोध्या में भाजपा पर भरोसा कर धोखा खा चुके हैं. ये रामभक्त चुनावी प्रेक्षकों द्वारा बताये जा रहे “शिफ्टिंग वोटर्स” भर नहीं होते. वे जीती जागती चेतनाएं हैं और एक देश के सम्मानित नागरिक हैं.

आज जो नारे लग रहे हैं वे मन में उन्माद पैदा करते हैं. इसलिए नहीं कि हम बड़े उन्मादी हैं बल्कि इसलिए कि राम का नाम हमारी चेतना से जुड़ा हुआ है. राम ही हमारी चेतना हैं. भाजपाई टुच्चे और कांग्रेसी मूर्ख इस चेतना को नहीं समझ सकते क्योंकि वे लोग सत्ता के दो कौड़ी के खेल में अपनी चेतना कब की गवां चुके हैं. एक बार फिर छलने की तैयारी है. राम जी इस बार इनके पंजो से हमें बचा लेना……

One thought on “अरे इन दोऊन राह न पाई

  1. “भाजपाई टुच्चे और कांग्रेसी मूर्ख इस चेतना को नहीं समझ सकते क्योंकि वे लोग सत्ता के दो कौड़ी के खेल में अपनी चेतना कब की गवां चुके हैं. एक बार फिर छलने की तैयारी है.”
    ——-
    यह भी राम की माया है!

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