एक महिला रिपोर्टर की आत्महत्या

दिल्ली से चलनेवाले एक निजी चैनल “टोटल टीवी” की एक महिला पत्रकार ने 18 सितंबर को आत्महत्या कर ली. उस महिला रिपोर्टर का नाम था- प्रिया सिंह. खबर आयी और तरह-तरह से आयी. किसी अखबार ने लिखा कि उसका शारीरिक और मानसिक शोषण होता था जिससे आजिज आकर उसने आत्महत्या कर ली. किसी ने लिखा कि एंकर न बन पाने के कारण उसने आत्महत्या कर ली. एक अंग्रेजी अखबार लिखता है कि सुसाईड नोट में वह अपनी बहन को सलाह देकर गयी है कि पत्रकारिता मत करना क्योंकि तरक्की के लिए यहां बॉस को प्लीज करना पड़ता है. एक अखबार ने लिखा है कि वह नोएडा में अपने परिवार के साथ रहती थी. एक और अखबार ने लिखा है कि उसके पिता रिटायर आर्मी आफिसर हैं. जबकि हकीकत में वह अपने एक अन्य लडकी के साथ अकेली रहती थी और उसके पिता आर्मी में जेसीओ हैं और जम्मू में तैनात हैं.

प्रिया सिंह की आत्महत्या दोहरे सवाल खड़े करता है. पहला सवाल, मीडिया के पास क्या वह सुसाईड नोट है जिसको आधार बनाकर खबरें बनाई जा रही हैं? और अगर मीडिया अपने ही किसी साथी के बारे में लिखते समय तथ्यों को बिना देखे अफवाहों के आधार पर खबरे गढ़ रहा है तो बाकी देश-दुनिया की रिपोर्टिंग करते समय उससे किस खोजबीन और प्रामाणिकता की उम्मीद की जाए? दूसरा सवाल है कि क्या सचमुच टीवी पत्रकारिता महिलाओं के लिए निषिद्ध क्षेत्र बनता जा रहा है जहां आने पर सिर्फ मौत और जलालत ही हाथ लगती है?

प्रिया सिंह अपने सुसाईड नोट में जो लिखती हैं उसका आशय यह है कि वे साल सवा साल से टोटल टीवी में काम कर रही हैं. इस दौरान उन्हें काफी कुछ मिला था. लेकिन उनको लगता था कि आफिस के कुछ लोग उनकी तरक्की से खुश नहीं थे. वे लोग प्रिया सिंह की तरक्की से डरते ही नहीं बल्कि जलते थे. प्रिया सिंह ने दो नामों का जिक्र किया है- 1, उमेश जोशी और 2, तपनराय भारती. प्रिया सिंह उमेश जोशी पर आरोप लगाती हैं कि उमेश जोशी नहीं चाहते थे कि वह एंकरिंग करे अगर वह ऐसा करती है तो उमेश जोशी की बेटी यानी साक्षी जोशी की पूछ कम हो जाएगी. यही कारण था कि उमेश जोशी ने प्रिया सिंह के बारे में मेहता सर (चैनल के मालिक विनोद मेहता) को मिसगाईड किया. और आखिर में प्रिया सिंह लिखती हैं कि “मेरी मौत के लिए सिर्फ यही दोनों जिम्मेदार हैं.”

यानि मसला यह कि प्रिया सिंह ने आत्महत्या की तो उसका वैसा कुछ कारण नहीं था जैसा अखबारों ने लोगों को बताना चाहा. तो भला किस आधार पर अखबारों ने शारीरिक शोषण और दैहिक संबंधों की धारणाएं विकसित कर लीं? जबकि प्रिया सिंह का सुसाईड नोट कुछ और ही कहानी कह रहा है. शायद मीडिया के इस ओछेपन को प्रिया सिंह ने बहत कम समय में भाप लिया था. इसलिए सुसाईड नोट में पुलिसवालों से उसने एक गुजारिश की है कि ” मेरा यह सुसाईड नोट किसी मीडियावाले को न दिया जाए.”

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या टीवी पत्रकारिता में महिलाओं के साथ अन्याय और ज्यादती हो रही है? अगर हां तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? प्रिया सिंह की जिंदगी से बहुत कुछ समझ में आ जाता है. उनकी उम्र थी 24 साल. साल-सवा साल से वे पत्रकारिता करने आयी थीं. टोटल टीवी कोई राष्ट्रीय चैनल नहीं है लेकिन दिल्ली और आस-पास के राज्यों में उसकी अच्छी पैठ है. उन्हें पहले इंटर्न रखा गया फिर तीन महीने बाद पांच हजार रूपये पर नौकरी मिल गयी. उन्हें एजूकेशन बीट पर काम करना था. लेकिन लगता है कि उनका स्त्रीबोध उनके काम पर भारी पड़ गया. उन्हें एंकर बनना था. उन्हें ही क्यों हर लड़के लड़की को टीवी पत्रकारिता का एक ही अर्थ समझ में आता है एंकरिंग करना या फिर किसी तरह पर्दे पर दिखना है.

आजकल के लड़के-लड़कियों को सफलता इसमें दिखाई देती है कि वे पर्दे पर कितनी बार दिखती हैं या फिर उन्हें एंकरिग का मौका मिलता है या नहीं. जिस उमेश जोशी का जिक्र प्रिया सिंह ने अपने खत में किया है उसमें प्रिया ने उमेश जोशी की लड़की का नाम भी लिया है जिसे उमेश जोशी एंकर के तौर पर आगे बढाना चाहते हैं. यानी खुद उमेश जोशी की लड़की भी इस मोह से मुक्त नहीं हैं कि वह एंकरिंग करे. जबकि वे खुद वरिष्ठ पत्रकार हैं. इसके कारण हैं. एंकरिंग करना टीवी का सबसे सरल और आसान काम होता है और इससे चेहरे की ब्रांड वैल्यू बहुत ज्यादा बढ़ती है. स्कूल से डिग्री लेकर पत्रकार बने लड़के-लड़कियों को कौन समझाए कि पत्रकारिता का एक सिद्धांत यह भी है कि आप हमेशा पर्दे के पीछे रहते हैं. अगर सचमुच पत्रकारिता करनी है तो आपका काम ही आपकी पहचान होना चाहिए न कि आपका चेहरा.

प्रिया सिंह जुम्मा-जुम्मा साल भर से पत्रकारिता कर रही थी. इतना समय तो ठीक से शुरू करने में नहीं लगता. फिर उसे इतने कम समय में ही यह क्यों लगने लगा कि उसकी तरक्की में लोग बाधा बन रहे हैं? और इतनी निराश हुई कि प्राण ही त्याग दिये. यह सही है कि टीवी खबरों की दुनिया में फास्ट फूड माध्यम है लेकिन यहां काम करनेवालों को अपनी तरक्की के लिए फास्ट फूड कल्चर नहीं अपनाना चाहिए. वरना निराशा और कुंठा का ऐसा आवरण घेरता है जहां आत्महत्या के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता. प्रिया सिंह की ही तरह न जाने कितनी लड़कियां इस निराशा और कुंठा के भंवर में होंगी. उन्हें अपने और अपने कैरियर के बारे में नये सिरे से विचार करना चाहिए, वरना हमें फिर किसी खबर के लिए तैयार रहना होगा कि एक और महिला पत्रकार ने आत्महत्या कर ली.

7 thoughts on “एक महिला रिपोर्टर की आत्महत्या

  1. इस देश मे महिलाओ के हितो और सुरक्षा हेतु क़ानून बनाए गये है | कामकाजी महिलाओ के उत्पीड़न रोकने बड़ी बड़ी बाते क़ी जाती है परंतु इस तरह क़ी घटनाए बड़ती जा रही है | मीडिया कर्मी द्वारा आत्महत्या करना दुर्भाग्यपूर्ण है |

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  2. महिला पत्रकार की आत्महत्या पर अफ़सोस!! उपरवाला उन्हे ज़न्नतनशीं करे ( अगर ज़न्नत कहीं हो तो)!!

    बढ़िया विश्लेषण किया आपने!!

    मीडिया के ग्लैमर से अपनी आंखे चौंधियाकर येन-केन प्रकारेण एंट्री मार लेने की चाहत में जी रही नई पीढ़ी पीछे के अंधेरे के बारे मे भी सोचकर ही एंट्री ले तब तो वे संघर्ष कर पाते है, नही तो नही कर पाते!

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  3. आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा.
    ऎसेही लिखेते रहिये.
    क्यों न आप अपना ब्लोग ब्लोगअड्डा में शामिल कर के अपने विचार ऒंर लोगों तक पहुंचाते.
    जो हमे अच्छा लगे.
    वो सबको पता चले.
    ऎसा छोटासा प्रयास है.
    हमारे इस प्रयास में.
    आप भी शामिल हो जाइयॆ.
    एक बार ब्लोग अड्डा में आके देखिये.

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  4. While I agree with most of the arguments, I strongly disagree with the contention that only girls are tempted to be anchors. We all know that temptation has no gender. It is the hollowness of education system that is getting filled up with commercial accomplishment alone as the parameter of success that is at the root of it all. Lack of purposeful education that robs one of appreciation for existing as a beautiful ordinary human being that is suicidal. mediavigil.blogspot.com

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  5. संजय जी, आपकी बात एकदम सही है। लेकिन हिंदी समाज के संपादक जिस तरह दांत निपोरकर लार टपकाने लगते हैं उसमें किसी स्वाभिमानी लड़की का जी पाना दूभर हो जाता है। और यह बीमारी किसी एक नहीं, अनेक टीवी चैनलों की है। मैने तो रेडियो पत्रकारिता में भी यही बात देखी है। संपादकों में घुसे सामंती तत्व को नेस्तनाबूत किए कल्याण संभव नहीं है। आज जरूरत एकछत्र राज करनेवाले संपादक की नहीं, संपादक मंडल बनाने की है, ताकि एक की गलाजत दूसरे की महत्वाकांक्षाओं से बैलेंस हो जाए।

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