गांव-गांव झगड़े, गांव-गांव न्यायालय

कैबिनेट का यह फैसला दो-ढाई महीने पुराना हो चुका है कि हर गांव में न्यायालय होना चाहिए. काम चल रहा है. वित्त मंत्रालय से 324 करोड़ का बजट भी ले लिया गया है. सदन की मंजूरी मिलते ही इसे आगे बढ़ा दिया जाएगा. हो सकता है अगले साल तक ऐसे ग्राम न्यायालय गांवों में दिखने लगें. इन न्यायालयों को फौजदारी और दीवानी मामलों को देखने का अधिकार होगा. ठीक-ठीक रूपरेखा तो प्रस्तावित बिल को देखने के बाद ही पता चलेगा लेकिन मोटी रूपरेखा तो सामने आ ही गयी है. ग्राम न्यायालयों के पीठासीन अधिकारी न्यायाधीश की बजाय “न्यायाधिकारी” होंगे. यह भारतीय न्याय प्रणाली की सबसे निचली अदालत होगी. राज्य सरकारें अपने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से सलाह-मशविरा करके इन न्यायाधिकारियों की नियुक्ति करेंगी.

भारतीय ग्राम जीवन को चौपट करने की जो चौतरफा पहल हो रही है यह उसका विस्तार ही है. ग्रामीण न्यायालय का सपना जवाहरलाल नेहरू ने देखा जो यह मानते थे कि भारतीय ग्रामीण जाहिल और गंवार हैं. इनको शिक्षित करने की जरूरत है. उन्हें भारत की क्या समझ थी यह तो नहीं मालूम लेकिन भारत को शीर्षासन करके देखने की हमने परिपाटी बना रखी है. हम यह मानते हैं कि भारत व्यवस्था रहित भूभाग है. अंग्रेजों ने कहा कि भारतीयों के पास अपनी कोई व्यवस्था नहीं है और हमने अक्षरसह उसे मान लिया. इसलिए व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय सबकुछ नये शिरे से गढ़ने में लग गये.

मी लार्ड वाली न्याय प्रणाली गांवों का कल्याण करेगी इसमें संदेह है. इससे ग्रामीण व्यवस्था छिन्न-भिन्न होगी. पहले ही सरकारी हस्तक्षेप और लोकतंत्र बनाने की विदेशी समझ ने ग्राम्य जीवन का सत्यानाश कर रखा है. अब कंपनियां ग्रामीण इलाकों को अपना टार्गेट बनाकर काम कर रही हैं. ऐसे में काले कोट का गांव में प्रवेश फटे में टांग अड़ानेवाली बात साबित होगी. झगड़े कम होने की बजाय कलह बढ़ेगी और एक ग्रामीण इस चक्रव्यूह में उलझना जानता है इससे बाहर निकलने की तकनीकि उसे नहीं आती. उससे बाहर निकलने की तकनीकि काले कोट के पास होती है जो न्याय को व्यवसाय की प्रयोग करता है.

न्याय का यह व्यवसाय गावों को भारी पड़ेगी. इस नासमझी को क्या कहें जो सामाजिक न्यायवस्था को व्यावसायिक नजरिये से खारिज कर रहा है?

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