गोविन्दाचार्य

संभव है कि गोविन्दाचार्य ने राजनीति में अभी अपनी निर्णायक पाली न खेली हो? नियति अचानक उन्हें कोई मौका दे और एक बार फिर आंदोलनों के उजाड़ बियाबान से निकलकर राजनीति की हरियाली में दाखिल हो जाएं. चार-पांच सालों के परिचय में उनके बारे में मेरी यही धारणा रही है कि राजनीति उनके लिए सहज कर्म है. वे आंदोलनों का प्रतिफल भी राजनीतिक ही चाहते हैं. वे राजनीति के लिए ही बने हैं. वे राजनीति में ही रमते हैं. सात सालों के अपने अघोषित राजनीतिक निर्वासन का जो सदुपयोग उन्होंने समाज के करीब जाने में किया है अब उसे वे राजनीति में आजमाना चाहते हैं. उन्होंने समझा है कि राजनीति गैर सामाजिक आचरण करती है. इसलिए राजनीति में आमूल परिवर्तन की जरूरत है. सारी राजनीतिक सोच को मिटाकर नये सिरे से इबारत लिखनी होगी. ऐसे में बहुत कुछ बदलना पड़ेगा इसलिए इस बदलाव को शायद व्यवस्था परिवर्तन कहना ज्यादा तर्कसंगत होगा.

वे आजकल व्यवस्था परिवर्तन के कार्य में लगे हैं. इच्छा या अनिच्छा से यह तो पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता लेकिन वे व्यवस्था परिवर्तन की बात कर रहे हैं. इच्छा और अनिच्छा इसलिए कि वे राजनीति के धुरंधर हैं. मेरा जितना भी राजनीतिक संपर्क है उनमें गोविन्दाचार्य सबसे अधिक आकर्षक राजनीतिक व्यक्तित्व दिखाई पड़ते हैं. उनके साथ जो सबसे अधिक सकारात्मक पहलू है वो यह कि वे आम आदमी के लिए सदैह सहज सुलभ थे और हैं. गोविन्दाचार्य जिन दिनों भाजपा के महासचिव होते थे तब भी शीर्ष नेताओं को उन तक पहुंचने के लिए सीढ़ी लगानी पड़ती थी, अवरोधों को पार करना होता था लेकिन आम भाजपा कार्यकर्ता और सामान्य आदमी सीधे उन तक पहुंच सकता था. लेकिन दूसरे ही क्षण यह भी आपको एहसास हो जाता है कि वे जानते हैं कि राजनीति कोई भावनाओं का व्यापार नहीं है. इन दोनों धरातलों पर वे एक साथ खरे उतरते हैं.

व्यवहार के इस धरातल तक पहुंचने के लिए राजनीतिक रूप से सिद्ध होना जरूरी है. और वे हैं. इसलिए मैं मानता हूं कि राजनीति के इतर अगर गोविन्दाचार्य कोई अन्य बात करते हैं तो हमें उसके राजनीतिक पहलुओं का अनदेखा नहीं करना चाहिए. अगर गोविन्दाचार्य राजनीति शून्यता में जाकर कुछ कहते हैं तब यह सवाल अपने आप खड़ा हो जाता है कि ऐसा वे इच्छा से कह रहे हैं या अनिच्छा से?

राजनीति में भी वे अपनी इच्छा से आये थे. 1988 में उन्हें लालकृष्ण आडवाणी के सहायक के तौर पर आरएसएस ने नियुक्त किया. इसके पहले वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में काम कर चुके थे और बिहार छात्र आंदोलन में बिहार में अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन कर चुके थे. आज भी जेपी आंदोलन से जुड़े लोग मानते हैं कि बिहार में छात्रों के बीच गोविन्दाचार्य और रामबहादुर राय ने काम किया उसी का परिणाम है कि जेपी आंदोलन इतना सफल रहा. बहरहाल लालकृष्ण आडवाणी के निजी सहायक के रूप में काम शुरू करनेवाले गोविन्दाचार्य (गोविन्द जी) जल्द ही भाजपा के महासचिव बन गये.

भाजपा महासचिव के रूप में उनका काम-काज बहुत जटिल रहा. वे शीर्ष नेताओं के कोपभाजन भले ही बने हों लेकिन आम कार्यकर्ताओं के लिए वे स्टार थे. उनके कार्यकाल के दौरान ही भाजपा केन्द्र में सत्ता में आयी. वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय कहते हैं “अगर अशोक सिंहल और गोविन्दाचार्य के योगदान को भाजपा से बाहर कर दिया जाए तो भाजपा लगभग शून्य हो जाएगी.” अशोक सिंहल ने पार्टी के लिए आधार विकसित किया तो गोविन्दाचार्य ने उस आधार पर स्थाई निर्माण के उपाय किये. लेकिन सत्ता का दंश तो आखिरकार अपना असर दिखाता है.

केन्द्र में भाजपा सत्ता में आयी तो इन्हीं दो लोगों को किनारे कर दिया गया. गोविन्दाचार्य बाकायदा पार्टी से रूखसत हुए तो अशोक सिंहल भी निर्णायक रणनीतिकार की हैसियत से मुक्त हो गये. अशोक सिंहल ने हिन्दू राजनीति को नये सिरे से संगठित करने का काम शुरू किया तो गोविन्दाचार्य अपने अधूरे काम को पूरा करने निकल पड़े. सितंबर 2000 में उन्होंने देश में भूमंडलीकरण के प्रभावों पर अध्ययन शुरू किया. तब से लेकर अब तक वे लगातार इस बारे में लिख-पढ़ और बोल रहे हैं. उस समय प्रज्ञा संस्थान द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि “पहले यह तय हो जाना चाहिए कि आधुनिकीकरण है क्या? अगर आप पश्चिमीकरण को आधुनिकता मानते हैं तो मैं इसे मान्यता नहीं देता.”

वे आज भी यही अलख लगा रहे हैं………यात्रा जारी है…….

8 thoughts on “गोविन्दाचार्य

  1. हूँ! तो इसे सिर्फ विश्लेषण ही माना जाए या सूचना मान लें?

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  2. गोविंद जी क्या और कैसे करेंगे इस पर नजर रहेगी। ऐसे जटिल समय में संजय जी, आपने जो लिखा उससे नया नजरिया मिलता है।
    -dilipcmandal@gmail.com

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  3. नजर रहेगी यह जानने में कि गोविन्दाचार्य अतीत हैं या भविष्य!

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  4. ‘अपने’ गोविन्दजी की सेहत कुछ समय पूर्व खराब होने की खबर छपी थी। वे तनदुरुस्त और मनदुरुस्त हो गए हैं?

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  5. संजय जी
    गोविंदाचार्य के लिए राजनीति निश्चित तौर पर सहज कर्म है। गोविंदजी की सक्रिय राजनीति में आना अच्छी खबर हो सकती है। और, आज की तारीख में भाजपा में नेतृत्व की जिस तरह से लड़ाई चल रही है, उसमें गोविंदजी सबसे उपयुक्त पात्र भी हो सकते हैं। भाजपा के पुराने-नए कार्यकर्ता तो उन्हें अभी भी नेता माने बैठे हुए हैं। लेकिन, सवाल ये है कि क्या भाजपा के बड़े नेताजी लोग गोविंदजी को पचा पाएंगे। और, नहीं तो, मैं जितना गोविंदजी को जान रहा हूं वो, किसी भी और पार्टी में तो काम नहीं कर पाएंगे। भाजपा-संघ से अलग अलख जगाने का काम भले कर लें।
    harshvt@gmail.com

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  6. In a paper written for Seminar, Vir Sanghvi wrote, “Advani acknowledged his RSS roots and even invited the Sangh to send a theoretician (Govindacharya, a rather dour man who was always described in the press as the BJP’s think-tank) to help provide guidance to the party”in 2001. Sangvi’s comment about Govindacharya being dour seems quite strange, he comes across as quite affable. Perhaps, he chose to appear dour to English media.

    Sangvi writes, “Govindacharya told a foreign diplomat that the BJP would continue to be Advani’s baby”. The fact remains that even today one cannot think of BJP without thinking about Govindacharya. His presence in BJP made the party look deceptively different.In retrospect, as a self effacing man, actually he seemed to be the right man in the wrong party, his recent articulations betray his socialist colours in his non-political avatar but his past, his choice of words and his mannerisms are not letting him emerge as a socialist leader.

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  7. आपका यह लेख बडे महत्‍व का है। गोविंदजी के व्‍यक्तित्‍व से काफी प्रभावित हूं। सन 1993 से 2003 तक विद्यार्थी परिषद में काम करने का मौका मिला। वहां भी उनके काम से प्रभावित हुआ। अब 2003 से भाजपा में काम कर रहा हूं। उनके विचार और दस्‍तावेज प्रकाशस्‍तंभ है। उनके चिंतन के केन्‍द्र में हमेशा अं‍त्‍योदय की बात रही है। उनसे कभी बात नहीं हो पाई बस कार्यक्रमों में ही राम-राम हुई है। इतना कह सकता हूं गोविन्‍दजी बेहतर भारत के लिए उम्‍मीद की किरण हैं।

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  8. “वे आज भी यही अलख लगा रहे हैं………यात्रा जारी है…….”

    ईश्वर उनकी इस यात्रा द्वारा एक बहुत बडा लक्ष्य पूर्ण करने की मदद करें.

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