दुनिया से कह दो गांधी अंग्रेजी भूल गया

15 अगस्त को भारत में सत्ता हस्तांतरण हुआ तो महात्मा गांधी नोआखली में थे. कुछ पत्रकार उनसे संदेश लेने पहुंचे. उसमें बीबीसी रेडियो का प्रतिनिधि भी था. बीबीसी रेडियो के प्रतिनिधि ने कहा कि वे अपना संदेश अंग्रेजी में दें तो लोगों को आसानी होगी. उस समय महात्मा गांधी ने उस पत्रकार से कहा था “जाकर दुनिया से कह दो गांधी अंग्रेजी भूल गया.” एक ओर रात के अंधियारे में जवाहरलाल भारत के भाग्य को नियति से मिलवा रहे थे वहीं दूसरी ओर महात्मा गांधी बंटवारे की आजादी पर मरहम-पट्टी कर रहे थे.

महात्मा गांधी अंग्रेजी के बारे में क्या सोचते थे और हिन्दी को किस रूप में देखते थे, यह 21 जनवरी 1942 को उनके एक भाषण से ज्यादा स्पष्ट हो जाता है जो उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में दिये थे. उस भाषण का महत्वपूर्ण अंश-

“अंग्रेजों को हम गालियां देते हैं कि उन्होंने हिन्दुस्तान को गुलाम बना रखा है लेकिन अंग्रेजी के तो हम खुद ही गुलाम बन गये हैं. अंग्रेजों ने हिन्दुस्तान को काफी पामाल किया है, इसके लिए उनकी मैंने कड़ी से कड़ी टीका भी की है, परंतु अंग्रेजी की अपनी इस गुलामी के लिए मैं उनको जिम्मेदार नहीं समझता. खुद अंग्रेजी सीखने और अपने बच्चों को अंग्रेजी सिखाने के लिए हम कितनी-कितनी मेहनत करते हैं? अगर हमें कोई कह देता है कि हम अंग्रेजों की तरह अंग्रेजी बोल लेते हैं तो मारे खुशी के फूले नहीं समाते. इससे बढ़कर दयनीय गुलामी और क्या हो सकती है? इसकी वजह से हमारे बच्चों पर कितना जुल्म होता है? अंग्रेजी के प्रति हमारे इस मोह के कारण देश की कितनी शक्ति और कितना श्रम बर्बाद होता है? इसका पूरा हिसाब तो तभी मिल सकता है जब गणित का कोई विद्वान इसमें दिलचस्पी ले. कोई दूसरी जगह होती तो शायद यह सब बर्दाश्त कर लिया जाता मगर यह तो हिन्दू विश्वविद्यालय है. जो बातें इसकी तारीफ में अभी कही गयी हैं उनमें सहज ही एक आशा यह प्रकट की गयी है कि यहां के अध्यापक और विद्यार्थी इस देश की प्राचीन संस्कृति और सभ्यता के जीते-जागते नमूने होंगे.

मालवीय जी ने तो मुंहमांगी तनखाहें देकर अच्छे से अच्छा अध्यापक यहां आप लोगों के लिए जुटा रखे हैं. अब उनका दोष तो कोई कैसे निकाल सकता है? दोष जमाने का है. आज हवा ही कुछ ऐसी बन गयी है कि हमारे लिए उसके असर से बच निकलना मुश्किल हो गया है. लेकिन अब वह जमाना भी नहीं रहा जब विद्यार्थी जो कुछ मिलता था उसी से संतुष्ट रह लिया करते थे. अब तो वे बड़े-बड़े तूफान खड़े कर लिया करते हैं. छोटी-छोटी बातों के लिए भूख हड़ताल तक कर देते हैं. अगर ईश्वर उन्हें बुद्धि दे तो वे कह सकते हैं कि हमें अपनी मातृभाषा में पढ़ाओ. मुझे यह जानकर खुशी हुई है कि यहां आंध्र के 250 विद्यार्थी हैं. क्यों न वे सर राधाकृष्णन के पास जाएं और उनसे कहें कि यहां हमारे लिए तेलगू में हमारी सारी पढ़ाई का प्रबंध कीजिए? और अगर वे मेरी अक्ल से काम करें तब तो उन्हें कहना चाहिए कि हम हिन्दुस्तानी हैं हमें ऐसी जबान में पढ़ाईये जो सारे हिन्दुस्तान में समझी जा सके. और ऐसी जबान तो हिन्दी ही हो सकती है.”

3 thoughts on “दुनिया से कह दो गांधी अंग्रेजी भूल गया

  1. गांधीजी का इस प्रकार अंग्रेजी भूलना हम सबको प्रेरित करता रहे!

    आज उनकी जयन्ती और प्रथम अहिंसा दिवस पर शत-शत नमन!

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