भाषा को उगालदान मत बनाईये

हिन्दी भाषा पर अपने पहले लेख के बाद मैंने तय किया था कि इस विषय पर दोबारा नहीं लिखूंगा. लेकिन आज विकास ने अपने ब्लाग पर आईआईटी मुंबई के जिस वाणी ब्लाग का नाम सुझाया है उसे देखने के बाद एक बार फिर हिन्दी के साथ चिपके साहित्य समझ पर लिख रहा हूं.

कभी-कभी लगता है हर स्थान, व्यक्ति, विषय की जरूरत हमें एक खास समय में ही महसूस होती है. मसलन अगर आप पान खाते हैं तो उगालदान या फिर सिगरेट पीते हैं तो एशट्रे की जरूरत तभी महसूस होगी जब आपको राख झाड़नी हो या फिर पीक थूकना हो. मुझे लगता है कि हिन्दी को भी कुछ लोगों ने भाषा का उगालदान समझ लिया है कि कविता करनी हो तो हिन्दी याद आती है और व्यावसायिक या फिर जीवन के और विषयों के बारे में बात करनी हो तो अंग्रेजी का पल्लू पकड़कर विद्वता झाड़ने लगते हैं. मानों हिन्दी भाषा बनी ही है कविता करने के लिए. बाकी काम तो अंग्रेजी में हो ही जाएगा.

कल मुंबई से प्रमोद कुमार और अभय तिवारी आये थे. हम लोग काफी देर साथ थे. बड़ी बातें हुईं. प्रमोद जी की बातों से लगा ऐसे ही चलता रहा तो हिन्दी को खत्म होने से खुदा भी नहीं बचा सकते. हम लोग लाख कहते रहें कि हिन्दी का भविष्य बहुत उज्वल है लेकिन हकीकत में वह अंधकार में ही दिखाई दे रहा है. हमारे साहित्य लिखने से तो भाषा बचनेवाली नहीं. पहले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस बात की चिंता जाहिर की जा चुकी है कि इस सदी के अंत तक दुनिया में प्रचलित 50 से 90 फीसदी भाषाओं का अस्तित्व खत्म हो जाएगा. आदर्श स्थिति तो वह होगी जब दुनिया के सभी लोग एक ही भाषा में व्यवहार करने लगे.

आईआईटी वाले भी कविता करने के लिए हिन्दी को चुनते हैं इससे भाषा की कोई सेवा नहीं हो रही है. इससे तो अच्छा यह है कि वे भूल ही जाएं कि हिन्दी भी कोई भाषा होती है. वे अपना साहित्य भी अंग्रेजी में ही लिखें. जिस भाषा में वे लिख-पढ़ रहे हैं उसी भाषा में साहित्य भी लिखें तो वे ज्यादा अच्छे तरीके से अंग्रेजी की सेवा कर सकेंगे. ऐसी हिन्दी सेवा से तो हिन्दी को छोड़ देना हिन्दी पर ज्यादा उपकार होगा.

दुनिया में 35 करोड़ लोगों की मातृभाषा अंग्रेजी है लेकिन अकेले इंटरनेट पर ही 80 फीसदी सामग्री अंग्रेजी में मौजूद है. दुनिया में हिन्दी दूसरे नंबर की सबसे बड़ी भाषा है और 60 करोड़ लोग हिन्दी लिखते-बोलते हैं लेकिन इंटरनेट पर उनकी उपस्थिति न के बराबर है. अगर विकी को ही अपना आधार बनाकर देखें तो वहां हिन्दी 59 वें स्थान पर है. ऐसा इसलिए कि हिन्दी में केवल 13,692 लेख हैं जबकि अंग्रेजी में 2 लाख 34 हजार से ज्यादा लेख हैं.

जानते हैं यह कविता करने की मानसिकता ही है जो आईआईटी वालों को भी हिन्दी की तरफ खींचती है तो कविता करवाती है. इन आईआईटीवाले कवियों से मेरा एक निवेदन है कि आप हिन्दी में काम ही करना चाहते हैं तो ऐसा कुछ करिए कि भाषा को सचमुच थोड़ा लाभ हो. भाषा लोगों की मजबूरी बने. आपकी कविता पढ़ने के लिए कोई हिन्दी से नहीं जुड़ा रहेगा. हिन्दी से जुड़ेगा तब जब उसे हिन्दी में समग्रता का दर्शन होगा. क्यों नहीं आईआईटी वाले यह अभियान चलाते कि हम अपनी पढ़ाई लिखाई सब कुछ हिन्दी में करेंगे.

हम हिन्दीवालों के साथ सबसे बड़ी बाधा है तकनीकि की. आईआईटीवालों आप लोग तकनीकि के धनी हो, वही सब पढ़ते लिखते हो. हिन्दी ब्लागिंग को समृद्ध ही करना है तो तकनीकि को औजार बनाकर कुछ ऐसा करो कि भाषा सच्चे अर्थों में समृद्ध हो. आपको कविता ही करनी है तो डायरी लिखकर रख लो या आपस में कवि सम्मेलन करके एक दूसरे की वाह-वाह कर लो. जितनी हिन्दी सेवा करनी है कर लो कोई रोकने नहीं आयेगा. लेकिन एक बात जान लो शेक्सपियर भाषा के अलंकार हो सकते हैं भाषा की जरूरत नहीं. आप जैसे लोगों की भाषाई समझ ही है कि हिन्दी दोयम दर्जे की भाषा बनी हुई है.

बुरा मत मानना दोस्तों, आपका यह ब्लाग कतई प्रशंसनीय नहीं है. बड़ी निराशा हुई.

15 thoughts on “भाषा को उगालदान मत बनाईये

  1. ओउम शांतिः शांतिः शांतिः
    अगर आई आई आई टी वाले आज हिंदी में कविता कर रहे हैं तो कल विज्ञान की बातें भी लिखेंगे मित्र. घबराइए मत.

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  2. इष्ट देव सांकृत्यायन की बात से मैं भी सहमत हूँ.

    कोई हिन्दी का प्रयोग करना चाहता है, तो उसका समर्थन करना चाहिये – आगे हो सकता है लेख भी लिखें ।

    कवितायें दिल से लिखी जाती हैं – जो भाषा दिल के करीब होती है उसमें बात कहना अच्छा लगता है पर व्यवसाय में अलग मजबूरियाँ होती हैं।

    प्रोत्साहन ना भी दें, तो कम से कम, इसे बुरा तो नहीं बताना चाहिये क्योंकी उससे कुछ भी सार्थक नहीं होगा.

    दुर्गा

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  3. इष्ट देव की बात सही है। चलने से ही राह निकलेगी।

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  4. भाषा किसी की बपौती नहीं है. जो चाहे, जैसे चाहे प्रयोग करें.
    युवको का प्रयास सराहनीय है, आपको खराब क्यों लग रहा है समझ से बाहर है.

    आज जहाँ ज्यादातर युवा अंग्रेजी में बतियाना पसन्द करते है ऐसे में अगर ये हिन्दी को अपनाते है तो इन्हे प्रोत्साहन देना चाहिए.

    भाषा के सत्यानाश से डरते तो क्षमा करना, कभी कबीरदासजी दोहे न लिख पाते.

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  5. संजय भाई! इस तरह किसी को हतोत्साहित न करें।
    कहते हैं कि कविता मन की अभिव्यक्ति होती ह, अगर ये आई आई टी के युवा अपने अंग्रेजीदां वातावरण मे रहकर भी हिन्दी मे ही अपने मन की अभिव्यक्ति करना चाहते हैं तो यह निश्चित ही खुशी की बात है।

    हमें यह नही सोचना चाहिए कि कौन हिन्दी की कितनी सेवा कर रहा है, हमें यह पहले सोचना चाहिए कि कौन हिन्दुस्तानी हिन्दी का प्रयोग ज्यादा कर रहा है।

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  6. IIT के छात्र भी तो हमारी/आपकी तरह ही आम इन्सान है. उनके भी दिल है, भावनायें हैं. उनके पास भी भाषा की समझ है, तो फिर कविता करने से क्यूँ पीछे हटें. कल को कहा जाये कि आप हिन्दी गाना न गायें, चित्रकारी न करें.

    एक बार कविता के माध्यम से यह युवा आगे आयेंगे तो फिर विज्ञान पर भी लिखेंगे और तकनीक पर भी. कम से कम कहीं से बात तो शुरु हुई, संजय भाई और इस हेतु यह सभी साधुवाद के पात्र हैं.

    इतने सारे कवियों में कितने हिन्दी के शिक्षक या पत्रकार हैं? कोई इन्जिनियर है, कोई एकाउन्टेन्ट है, कोई डॉक्टर है, कोई गृहणी है- तो क्या वो सब कवितायें बंद करके अपने अपने क्षेत्र के हिन्दीकरण में लग जायें?

    वो भी होगा मगर वक्त लगेगा. बीज बो लेने दिजिये. सिंचाई होने दिजिये. बगिया जब खिलेगी. हरियाली सबको अच्छी लगती है और कितने ही उस हरियाली से प्रेरणा लेकर नव उद्यान लगायेंगे-तब आपके मन की बात भी पुरी हो जायेगी. ऐसा मेरा विश्वास है और वही इष्ट देव जी भी कह रहे हैं.

    आईये, इन नवयुवाओं को प्रोत्साहित करते हैं.

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  7. सबको अपने विचार कहने का हक है,
    क्या भाषा साहित्य लिखने के लिए ही होती है,

    मैं तो कहूँगा, उगालदान बनाना है तो हिन्दी (कोई भी मातृभाषा) ही चुनें, अंग्रेज़ी की अपेक्षा।

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  8. पहले तो ये लेख पढकर बहुत उदास हो गया…कि लोग ये समझ रहे हैं कि हमलोग हिंदी का प्रयोग केवल कविता के लिये कर रहे हैं। और भाषा को उगलदान बना रहे हैं…………लेकिन फिर टिप्पणियों से सतोष मिला। दरसल हमलोग केवल कविता तक ही नही रुकने वाले हैं , हमलोग रचनात्मक तरह से हिंदी का उपयोग करेंगे। कुछ ऐसी प्रतियोगिता जिससे की लोग इनकी ओर आकर्षित हो, मगर थोडा समय लगेगा…इसलिये शुरुआत कविता से ही किये हैं…जिससे पहले ये पता चले की हमारे संस्थान में हिंदी रचनात्मकता का कोष कितना है…और जैसा कि विकाशजी ने अपने ब्लोग पर उत्तर दिया है,आप भले मजाक समझें ,हमलोग तो अपना काम करते रहेंगे।

    आलोक कुमार
    त्रितीय वर्ष
    आय.आय.टी.मुंबई

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  9. ज्ञानदत्तजी की पोस्ट पर इसके लिंक से यहां आया। आपकी यह सोच ठीक नहीं है कि हिंदी को आई.आई.टी.वाले उगालदान बना रहे हैं। आई.आई.टी. में भी हमारे घरों के बच्चे ही जाते हैं। कोई किसी ब्रांच में कोई किसी ब्रांच में। सब तकनीक के धुरंधर नहीं होते और न सब कम्पयूटर के दिग्गज होते हैं। अपनी सहज अभिव्यक्ति का सबको अधिकार है। भाषा भी सीखते-सीखते आती है।

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  10. सबसे पहले मैं आपके लेख की भूरि भूरि प्रशंसा करता हूँ. परंतु आपकी कुछ बातें बिलकुल सतही हैं, जिनका प्रयोजन मेरी समझ में तो ना आया.

    मसलन, “आईआईटी वाले भी कविता करने के लिए हिन्दी को चुनते हैं इससे भाषा की कोई सेवा नहीं हो रही है.” पहली बात तो यह कि हमने कभी ना कहा कि हमारे क्षुद्र प्रयास से हिंदी भाषा की कोइ सेवा हो पायेगी. और दुसरी बात, क्या हिन्दी का प्रयोग आप जैसे महान विद्वानों तक ही सीमित रखनी चाहिये. संस्कृत की हालत पता है ना आपको?

    आपने हिन्दी की तुलना अंग्रेजी से की है. उसके अनेक कारण हैं. एक आप जैसे लोग भी हो सक्ते हैं. क्युँकि मुझे ज्ञात नहीं यदि किसी भी अंग्रेजी के ऐसे प्रयास पर किसी ने भर्त्सना की हो.

    “आप जैसे लोगों की भाषाई समझ ही है कि हिन्दी दोयम दर्जे की भाषा बनी हुई है.” – हमें अपनी भाषाई समझ पर कोई अभिमान नहीं. हमारी समझ छोटी हो सकती है, लेकिन उद्देशय नहीं. और हम यहाँ आये ही इसलिये थे ताकि हमारी सीमित समझ का विस्तार हो सके. मुझे अंदाजा था कि ऐसे प्रहार भी झेल्ने होंगे, जिसके लिये मैं और मेरे मित्र पूर्न्तया तैयार बैठे हैं. परंतु जो लोग अभी अभी अपनी डायरी से बाहर निकले हैं उन्हें इस तरह की गंदगी दिखाकर अपनी सांस्कृतिक बांबी का हिस्सा ना बनायें.

    और रही बात तकनीकी विकास की, तो वो हमारी नैतिक जिम्मेवारी है – जिसे हम सब निभाना चाहते हैं. परंतु एक छात्र की अपनी सीमाएँ होती हैं.

    और ऐसा कतई नहीं है कि हम हिंदी की तथाकथित सेवा नहीं कर रहे. ये जो गूगल आप हिन्दी में देखते हैं, इसके कई हिस्से मैने खुद अनुवादित किये हैं. और भी कितने opensource चीजें हैं, जिनमें यथाशक्ति मैं और मेरे मित्र अपना योगदान देते हैं. हाँ, ऊँचे शब्दों में इस्का जिक्र नहीं करते. क्युँकि अपने कर्तव्यों के निर्वाह के कारण मिली प्रशंसा हमें प्रिय नहीं.

    आप हमारे प्रयास को निराशाजनक कहें, मुझे कोइ फ़र्क नहीं पड़ता, लेकिन ऐसे कई नये लोग हैं जिन्हें फर्क पड़ जायेगा. और हिन्दी के कुछ पृष्ठ फिर घट जयेंगे और अंग्रेजी के कुछ पन्ने फिर बढ़ जायेंगे.

    ऐसे लेख मुझे प्रेरणा देते हैं, सो लिखते रहें. हिन्दी की सेवा का आपको भी हक है, चाहे जिस रूप में करना चाहें.

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  11. संजय जी,
    मैं आप के लेख बड़े चाव से पढ़ती हूँ, पर आज का लेख पढ़ कर बहुत दुख हुआ। वैसे तो बाकी सबने अपनी टिप्प्णियों में वो सब कह दिया जो मैं कहना चाहूंगी, पर कुछ सच्चाइयाँ मैं आप को बताना चाहूंगी जो आप को शायद पता न हों।मैं इन बच्चों से मिली हूँ पूरी एक शाम के लिए, इनके काव्य संध्या आयोजन के उपलक्ष में निर्णायिका के तौर पर आंमित्रत थी। मैं ने देखा कि ये बच्चे हिंगलिश नहीं बोलते, या तो शुध्द हिन्दी या खालिस अग्रेजी। ये लोग सिर्फ़ कविताएं करते हों ऐसा बिल्कुल नहीं हैं, तकनीकी ज्ञान को हिन्दी में रुपान्तरित कर रहें है, कहानी, नाट्क, लेख हर क्षेत्र में सक्रिय हैं। क्या आप ने इनकी कविताएँ पढ़ीं, इनकी उम्र को ध्यान में रखते हुए उन कविताओं की गुणवत्ता काबिले तारिफ़ है, ऐसा मुझे लगा। मेरे ब्लोग पर देखें मैने विस्तार से लिखा है। हाँ ये बात और है कि आप मेरी समझ पर प्रश्नचिन्ह लगा सकते हैं। संजय जी इन बच्चों ने सही दिशा की तरफ़ पहला कदम रक्खा है,कुछ कदम शायद ड्गमगाए फ़िर देखिए कैसे दौड़ेगें। ये युवा पीड़ी हमारे राष्ट्र का उज्जवल भविष्य हैं, थोड़ा विश्वास रखिए, ये पीड़ी हमें निराश नहीं करेगी। इनकी बदौलत कल को हम गर्व से कह सकेगें सिर्फ़ सिलिकोन वैली नहीं पूरा विश्व हमारा है, हर क्षेत्र में हम हैं सर्व श्रेष्ठ्। आइए इन बच्चों को आशिर्वाद दे कर गौरव मह्सूस करें। वैसे इन बच्चों में भारतिय संस्कार इतने कूट कूट कर भरे हैं कि जब इनसे विदा लेने का क्षण आया, हमारे आश्चर्य की सीमा न थी कि इन्होंने पावँ छू कर आशिर्वाद मांगा, जब की हम इनके लिए अन्जान थे और किसी प्रकार का अधिकार नहीं रख्ते थे

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  12. महाशय ,
    आपने यह तो बड़ी सरलता से कह दिया की हम आई आई टी वाले हिन्दी भाषा का मजाक उडा रहें हैं और हमें कोई अधिकार नही की हम अपनी मातृभाषा में अपने भावो की अभिव्यक्ति करें आपसे एक बात पूछना चाहूँगा बच्चा कितना भी बाहर धमाचौक्री मचाये कई खिलौनों से खेले परन्तु जब भी वो दुखी होप्ता है तो उसे बस अपने माँ के आँचल की ही आव्यश्यक्ता होती है और हिन्दी हमारी मातृभाषा , हमारी अभिव्यक्ति की मूल भाषा है और आप कहते है की हम अपने भावो की भावो की नाव हिन्दी की इस सरिता में छोरें ही नही क्योकि हम आई आई टी वाले अपने पठन पाठन में अंग्रेजी का प्रयोग करते हैं वैसे अपने प्रोफाइल में आपने भी इसी भाषा का प्रयोग किया है और आपने हम से जब यह कहा है की क्यों नही हम हिन्दी में ही पढ़ाई करें तो अप पत्रकारो से भी यह निवेदन है की आपको लोग अपनी पत्रकारिता केवल हिन्दी में ही किया करें और , आपको जैसे लेखकों से भी यह अपनी लेख केवल हिन्दी में ही लिखे आपको बता दू की क्रांति कभी आचानक ही नही आती है , आपको शायद पता ना हो परन्तु पहले आई आई टी की प्रवेश परिक्च्चा में केवल अंग्रेजी भाषा का ही प्रयोग होता था परंतु हम छात्रों नें ही हिन्दी में भी लेने को मजबूर किया और आज कई प्रतिभागी हिन्दी मध्यम से यहा पहुँचते हैं परन्तु हमें अपनी पढ़ाई के लिए अंग्रेजी का प्रयोग इसी लिए करना पड़ता है क्योकि हम बाकी जगहों पेर हो रहें तकनिकी विकास कार्यो से समंव्याया स्थापित कर सकें और उन्ही समंव्ययो का नतीजा है की आपको और हम अपनी भावनाएं हिन्दी में इस तरह कंप्यूटर पे एक दुसरे के सामने प्रस्तुत कर प रहें है और हमें केवल हिन्दी ही नही हिंदुस्तान भी देखना है और आपको पत्रकारों की भी ये नैतिक जिम्मेदारी है इन्फोसिस और तमाम और ऐसी कंपनी हैं जो आज हिंदुस्तान को लाभान्वित कर रही है ये उसी समंव्याय का नतीजा है और इसके बदले आप यही कहते है की अपनी माँ का आँचल न पक्दो ये गंदा हो रहा है आपसे ये सुनकर बड़ा कष्ट हुआ और ये जानकर की आपको पत्रकर है और भी ………इस अंधेरे में अगर मैं सूरज न सही एक जुगनू ही बन केर जल रहा तो आपको उसे भी बचने की जगह बुझाना क्यों चाहते हैं उम्मीद है आपको हमारी भावनाएं कुछ हद तक तो समझ में आई ही होंगी आपके समय के लिए धन्यवाद

    मनीष सौरभ

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  13. संजय जी, आपकी चिंता तो जायज़ है, आपको स्वतंत्रता भी है अपनी बात कहने की। बस… यहीँ समस्या का समाधान हो गया। उन छात्रों के लिये भी तो यही लागू है, उन्हें भी स्वतंत्र रहने दें और अपनी कहने दें। आज यदि कुछ कविता लिखते हैं और यदि मान भी लें कि बहुत सही नहीँ लिखते (यह आवश्यक नहीँ) पर आरंभ होने बाद ही तो परिष्कृत होने की संभावनाएं, विविधता की संभावनाएं होंगी। आज उन्हें करने दीजिये कविता पर परीक्षण, अभ्यास और उन्हें प्रोत्साहन दीजिये, बल्कि कभी आग्रह भी कीजिये कि गद्य लिखें, यात्रा-वृत्तांत लिखें, समीक्षा लिखें और लिखें कहानी भी। यह न तो वे और न ही अन्य लोग मानें कि ऐसा वे हिन्दी की सेवा के लिये करते है।

    दूसरी ओर आपकी विचारधारा जो हिन्दी के पतन के लिये है उससे मेरी सहमति है। यह विषय तो गंभीर है, विचारणीय है और न केवल यह, वरन ठोस प्रयासों की आवश्यकता है, जो कि राष्ट्रीय स्तर पर, भाषा के प्रति आपसी भेद भुला कर ही संभव हो।

    शायद यही मान लें कि ऐसा करने से उन छात्रों में जो प्रतिस्पर्धा जागेगी, कदाचित वह कुछ अन्य लोगों में हिन्दी के प्रति कुछ रुझान ही बढ़ाये।

    रही आई.आई.टी के हिन्दी के प्रति योगदान की बात – तो वह तो उन्होंने किया था, परंतु वह तो नाकाफ़ी ही था और यूनीकोड की दिशा में तो नहीं ही था।

    अधिक चर्चा तो शायद फिर कभी हो और फिर कभी अपने विचारों/टिप्पणियों का अंजुली भर योगदान हो।

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  14. आर्डर, आर्डर, आर्डर !
    ये क्या चमगोईयां मचा रखी है ? गोया लोकसभा का सत्र चल रहा हो !
    संजय जी, मैं एक अकबर-बीरबल का किस्सा बयान करने की अनुमति चाहूंगा.
    कोई विद्वान उनके दरबार में पहुंचा, सभी भाषाओं पर इतना समान अधिकार ( फ़ुरसतिया गुरू की परिभाषा से अलग ) कि कोई भीउसकी ‘मदरटंग’ भांपने में समर्थ न था ,उपस्थित प्रकांड पंडितों को अक़बर ने आदेश दिया इसके मूलनिवास की भाषा का पता कल तक लग जाना चाहिए वरना सबका सिर-क़लम !
    ( अक़बर बादशाह अपने राजकाज़ के काग़ज पत्तर कब देखते थे, यह शोध का विषय है )
    सो, बड़ी मुश्किल, तब तो नारको टेस्ट भी नहीं होता था ! गये बीरबल की शरण में,आश्वासन मिला परेशान न हों, सुबह तक पता चल जायेगा.
    कैसे ? रात में आगंतुक महोदय जब गहरी नींद में सो रहे थे, बीरबल ने एक घड़ा ठंडा पानी उनके ऊपर डाल दिया, ज़नाब हड़्बड़ा कर उठ बैठे, घबड़ा कर चिल्ला पड़े,”सूं छे ?”
    साफ़ हो गया कि गुजरात से आए थे .
    सो बंधु, रोने,हंसने,कराहने जैसी आदिम अभिव्यक्तियों के बाद मनुष्य द्वारा सुनी गयी पहली भाषा ही उसके व्यक्त करने का सहज माध्यम होती है.
    तो लालित्य जितनी अच्छी तरह अपनी भाषा में आप व्यक्त कर सकते हैं उतनी अन्य भाषा में सप्रयास कलाकारी करके भी नहीं सुगम नही होती .

    मैं माफ़ी चाहूंगा, आप इसको मुद्दा बनाने से बख़्स दें. पहले ही हम हिंदी के शुद्धिकरण के चक्कर में उसको आम आदमी से दूर ले जाते रहे हैं .
    हिंदी की निष्ठा जमीन के व्यक्तियों से विलग हो किताबी स्तर पर निहित हो टिक जाये, तो हिंदी मात्र दिवस,सप्ताह और पखवारों की शोभा ही
    बढ़ाती रहेगी. जैसा कि आम घरों में बनारसी साड़ियों के साथ होता है .
    चलने दो भाई, कुछ तो चल रहा है !
    मुझे तो अंग्रेज़ी बोलने वाले की हिंदी में दी हुई गाली भी स्वीकार है. अतिशयोक्ति नहीं, जापान में आप घूम रहे हों और पीछे से आई एक भद्दी पंजाबी गाली कितनी सोंधी लगती है यह तो आप सुन कर ही समझोगे .

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  15. sanjay ji isme aapki galti nahee hai..shaayad ye aapne tab likhaa jab aapko kisi baat se atyadhik kasht thaa…. aur shaaayd aap ye smajahte hain ki IIT me ham nahee koi paaschaatya jagat ke praani adhyayan kerte hain…. kaash aapne pahle aaker dekha hota aur fir lekh likhne baithte to shaayad jo likha hai wo naa likhte….. aap ne shaayad ye samajh liya hai ki hindi aapki jaagir hai..kshama chaahongaa itne kathor shabd ke liye..lekin hindi aapki jaagir nahee hai..hindi kisi blog me nahee baste hai..aap bhee hindi me likhker koi mahaan kaarya nahee ker rehe hain…kshama chaahongaa fir se…..Hindi hamaaare rakt me hai…hindi hain hum watan hai hindustaan hamara…aapke chaahne yaa naa chhahne se ek patta tak nahee hilegaa…..
    ramcharita manas ki panktiyaan yaad aa gayeen aapke liye…dhyaan deejiyegaa..
    hoee soyee ram rachi raakha,
    ko kari tarak badaawe saakh…
    jai shri ram…allah hafiz..

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