आपकी सोच ठीक नहीं है कि हिंदी को आई.आई.टी.वाले उगालदान बना रहे हैं

मैंने क्या लिखा इसका कोई मतलब तब खास नहीं रह जाता जब उसे लोगों ने अपनी सुविधानुसार पढ़ा, और जो बुरा लगा उसे आधार बनाकर बहस चली दी. सबने मिलकर यह साबित किया है मानों मुझे आईआईटी के कवियों का हिन्दी में कविता करना बुरा लगा. ज्ञान जी ने इसे चेतावनी देनेवाली पोस्ट कहा है. इष्टदेव ने मेरे लिखे पर शांतिपाठ करते हुए जो पहली टिप्पणी की कि “अगर आई आई आई टी वाले आज हिंदी में कविता कर रहे हैं तो कल विज्ञान की बातें भी लिखेंगे मित्र. घबराइए मत.” तो मुझे सांत्वना देना सबने अपना फर्ज समझा. मैं सबका स्वागत करता हूं और सबकी सांत्वना तहे दिल से स्वीकार करता हूं.

आमतौर पर समीरलाल इस तरह के संवाद से विलग ही रहते हैं. लेकिन वे भी कहते हैं”एक बार कविता के माध्यम से यह युवा आगे आयेंगे तो फिर विज्ञान पर भी लिखेंगे और तकनीक पर भी. कम से कम कहीं से बात तो शुरु हुई” यह दिलासा देनेवाली बात है. नहीं तो समीरलाल जी और ज्ञानदत्त पाण्डेय हमसे ज्यादा इस बात के गवाह हैं कि काम-काज और रोजी-रोटी की भाषा से हिन्दी बेदखल होती जा रही है. पिछले साठ सालों में यही हो रहा है. विज्ञान, तकनीकि, व्यापार, इतिहास, भूगोल की भाषा पहले ही अंग्रेजी हो चुकी है. संभव है अलगे 20-30 सालों में हिन्दी सिर्फ भावनाओं की भाषा बनकर रह जाए. जाहिर है तब हम सब मिल-जुल कर आपस में कविता करेंगे और हिन्दी के माथे पर बिंदी लगा देंगे.

मेरी वेदना किसी की कविता करने या न करने से नहीं जुड़ा है. ब्लागिंग मेरे बाप की बपौती तो है नहीं जो मैं लोंगों को निर्देशित करता रहूं कि आप क्या लिखें और क्या न लिखें. लेकिन मैं ये भी देखता हूं कि जो लोग हिन्दी को हिकारत की नजर से देखते हैं वे कोई अंग्रेज नहीं हैं. वे हमारे ही बीच से अंग्रेज बन गये लोग हैं. और दुर्भाग्य से हिकारत की नजर रखनेवालों में तकनीशियन, डाक्टर, इंजिनीयर और ऐसे पेशेवर ज्यादा हैं जिनकी शिक्षा-दीक्षा अंग्रेजी में हुई है. वे मानते ही नहीं कि हिन्दी काम-काज की भाषा भी हो सकती है. समीरलाल जी ठीक कह रहे हैं कोई भी कवि हो सकता है. और सरकारी बाबू भी थोक में कविता करते हैं लेकिन वे कवि होने के बावजूद मानते हैं कि हिन्दी डे मनाकर काम चलाया जा सकता है. अभी अमेरिकावाला सम्मेलन इसका बढ़िया उदाहरण है जब प्रशस्तिपत्र अंग्रेजी में भेज दिया गया था.

कोई कविता करना चाहे करे, व्यंग्य लिखना चाहे लिखे, व्यक्तिगत डायरी लिखना चाहे लिखे. इस पर कोई गाईडलाई कैसे लगा सकता है? मैं तो दुखी हुआ कि आईआईटीवाले भी कविता से अपने ब्लाग का आगाज करेंगे तो बाकी लोगों का क्या? आलोक कुमार मुंबई आईआईटी तृतीय वर्ष के छात्र हैं. वे टिप्पणी करते हैं “दरसल हमलोग केवल कविता तक ही नही रुकने वाले हैं, हमलोग रचनात्मक तरह से हिंदी का उपयोग करेंगे। कुछ ऐसी प्रतियोगिता जिससे की लोग इनकी ओर आकर्षित हो, मगर थोडा समय लगेगा…इसलिये शुरुआत कविता से ही किये हैं…”

अभी तक तो ऐसा हुआ नहीं है फिर भी आलोक बाबू हमें इंतजार रहेगा उस दिन का जब आईआईटी मुंबई का कोई हिन्दी प्रेमी ऐसा कुछ कर गुजरेगा कि हम जैसे टुंटपुजिएं भी अपनी हिन्दी में ही काम करने की जिद पर फक्र महसूस कर पायेंगे.
(लेख का शीर्षक अनूप शुक्ल की टिप्पणी का हिस्सा है.)

2 thoughts on “आपकी सोच ठीक नहीं है कि हिंदी को आई.आई.टी.वाले उगालदान बना रहे हैं

  1. ठीक है मित्र। अपना रोजा तोड़ो। एक आध निवाला मुह में डालो। एक गिलास पानी पीकर सांस लो। ब्लॉगरी जिन्दाबाद। हिन्दी चाहे टुटही हो चाहे चमकौआ – सब चलेगी।

    Like

  2. हिंदी-प्रेम तो हर हिंदुस्तानी में है…अगर हम हिंदी के लिए कुछ करते भी हैं तो भी हम खास नहीं समझेंगे खुद को…आपको बता दूँ कि हिंदी में रचनात्मक होना गर्व की बात मानी जाती है हमारे यहाँ न कि श्रद्धा या दया के… फिर भी कुछ सवाल आपने ऐसे खड़े किये हैं जिसपर हम आई0आई0टी0 वालों को ही नहीं सबको सोचने का हक है। मगर हम अपना प्रयास जारी रखेंगे……

    Like

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s