तकनीकी शिक्षा और हिन्दी से प्रेम में विरोधाभास नहीं है

यह अनूप भार्गव की टिप्पणी है सुबीर संवाद सेवा पर. अनूप बाबू आपने कहा है कि आप पुराने आईआईटीयन रहे हैं. इसलिए यह पढ़कर आपको अच्छा नहीं लगा कि हिन्दी किसी कालेज की बपौती नहीं है. आप तकनीकि शिक्षा और हिन्दी प्रेम को अलग-अलग करके देख रहे हैं. मेरा सवाल भी यही है. क्या तकनीकि शिक्षा और हिन्दी प्रेम अलग-अलग होने चाहिए?

अभी तक की हमारी भाषाई समझ यही है कि हम हिन्दी को रोजी-रोटी की भाषा नहीं मानते. हमें लगता है कि तकनीकि, वाणिज्य, व्यापार, चिकित्सा की भाषा अंग्रेजी बनी रहे और हम हिन्दी को साहित्य की भाषा बनाकर रखें. कविता करनी हो तो हिन्दी और काम करना हो तो अंग्रेजी. हमारी यह समझ बन गयी है. मैं इसी समझ में उलट-पलट करना चाहता हूं.

आपमें से कितने लोग वेद प्रताप वैदिक को जानते हैं मालूम नहीं. लेकिन उन्होंने भारत के प्रतिष्ठित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में लंबी लड़ाई लड़ी. जानते हैं क्यों? क्योंकि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संबंध पर अपना शोध प्रबंध हिन्दी में लिखा था जिसे विश्वविद्यालय प्रशासन ने अस्वीकार कर दिया. कहा कि आप अपना शोध प्रबंध अंग्रेजी में ही लिखकर दें. वैदिक जी भी जिद्द पर अड़ गये. उन्होंने लड़ाई लड़नी पड़ी और आखिर में प्रशासन को झुकना पड़ा.

कहानी-कविता लिखने से भाषा दया और श्रद्धा का विषय बन जाती है. सेवा हमेशा कमजोर की होती है. और हिन्दी सेवक जब कहते हैं कि वे कविता लिखकर हिन्दी की सेवा कर रहे हैं तो वे यह मानकर चलते हैं कि यह बूढ़ी गाय है जो दूध नहीं दे सकती. लेकिन क्योंकि गाय है इसलिए इसकी सेवा करो कुछ पुण्य लाभ हो जाएगा.

जो यह पुण्य लाभ कमाना चाहते हैं वे जरूर कमाएं. अपने राम तो इसे रोजी-रोटी की भाषा के रूप में देखते हैं. रोजी-रोटी, विमर्श, संवाद, तकनीकि, विज्ञान, चिकित्सा आदि की भाषा के रूप में हिन्दी स्थापित हो जाए तो कविता भी कर लेंगे. गद्य भी लिख लेंगे. वाह-वाह भी हो जाएगी और हिन्दी की सेवा भी नहीं करनी पड़ेगी.

टिप्पणीकार पर यह बात मुझे ज्यादा सटीक लगी कि “ये अंग्रेजींदा इंजीनियर आदि खाने कमाने की भाषा तो अंगेजी ही रखते हैं पर भावादि के वमन की भाषा हिंदी बनाते हैं.” ऐसा करने का उन्हें हक है लेकिन ऐसा करके वे सचमुच हिन्दी की “सेवा” ही कर रहे हैं. बूढ़ी गाय की तरह.

थोड़ी चर्चा यहां भी

4 thoughts on “तकनीकी शिक्षा और हिन्दी से प्रेम में विरोधाभास नहीं है

  1. प्रथम दृष्‍टया आपकी बात सही लगती है – ‘सेवा’ की बात निरीहता का भाव देती है, मानो कोई वृद्धाश्रम खोल रखा हो। किंतु इस सामान्‍यीकरण के अपने खतरे हैं कि प्रोद्योगिकी की भाषा बनने की प्रतीक्षा में इंजीनियर लोग अपने भावों को कैद रखें-

    इसलिए उगालदान, शिक्षा,….जिस की भाषा हो सके बनाने दें। एक प्रछन्‍न्‍ लाभ आप भूल रहे हैं इस तरह साहित्‍य सार्वजनिक होता है और कमबख्‍त विश्‍वविद्यालयी, पेशेवर आलोचकों से मुक्‍त होता है।
    भाषा न सही साहित्‍य की मुक्ति के लिए इसका स्‍वागत किया जा सकता है।

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  2. भैया आईआईटी ही क्यों सभी विषय हिंदी में कमोवेश अछूते हैं। सभी को हिंदी लेखन की विषयवस्तु बनाकर नैट पर लाना चहिए।
    जिस भाषा में हम अपना मन खोल सकते हैं वह भाषा किसी भी विषय की प्रस्तुति के लिए मुश्किल नहीं हो सकती। बहाने कितने भी क्यों न बनाएँ? विज्ञान विषयों पर भी तो कविताएँ लिखी जा सकती हैं। इसके लिए योजना बद्ध होकर काम करना पड़ेगा, न कि हल्के से लेते हुए। जो कविता लिख सकते हैं उन्हें लिखने से ज़्यादा विषय और विधा चुनने के लिए प्रोत्साहित किया जाय। हिंदी में तो वे लिख ही रहें है!!!

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  3. मैं इसे इस तरह से देखता हूँ की ये युवान कल के कर्ता धर्ता है. अगर इनके मन में हिन्दी के प्रति लगाव हुआ तो यह हिन्दी के लिए फायदेमंद ही होगा. आज जरूरत इन्हे लताड़ने की नहीं, इनके मन में हिन्दी प्रेम को घाड़ा करने की है, ताकि कल जब ये दक्ष होंगे तो अपने विषयों पर हिन्दी में लिखेंगे. ये अगर अंग्रेजी में पढ़ रहे है तो दोष इनका नहीं इनकी पीछली पीढ़ी का है जिसने हिन्दी को इस लायक नहीं बनाया. हमें अपनी आने वाली पीढ़ीयों के लिए काम करना है. हिन्दी मरने न पाये.

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  4. “जो यह पुण्य लाभ कमाना चाहते हैं वे जरूर कमाएं. अपने राम तो इसे रोजी-रोटी की भाषा के रूप में देखते हैं.”

    मैं भी रोजी-रोटी के लिए इसे सबसे बढि़या भाषा मानता हूँ, अंग्रेज़ी से भी ज्‍यादा। बशर्ते आप इसमें काम करने में रस लें, और इसके व्‍यावसायिक उपयोग के लिए अपना दिमाग़ खुला रखें। – आनंद

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