ऋषिकेश तीर्थाटन करने जाईये-2

कुछ साल पहले दिल्ली में एक सेमीनार में इस बात का रोना रोया गया था कि भारत में घरेलू पर्यटन संतोषजनक नहीं हैइस रोने का आशय यह है कि भारतीय पर्यटन के लिहाज से टहलते नहींजब आप पर्यटन नहीं करते तीर्थाटन करते हैं तो आपका घूमनाफिरना आपके लिए फायदेमंद भले हो लेकिन व्यावसायिक आंकड़े में यह ठीक नहीं बैठता। बात सही है। भारत में पर्यटन की जगह तीर्थाटन का महत्व है। भारतीय जीवनशैली कुछ इस तरह की है आपको १२ ज्योतिर्लिंग, चारधाम और ५२ शक्तिपीठों में से कुछ जगह तो जाना ही पड़ता हैइसके अलावा पितरों की चिंता करते हुए जीवन में एक बार गया जाना होता हैइसके बाद भी आनेजाने और विचरण करने के लिए कुंभ मेले हैं, छुट-पुट तीर्थ हैं, रामेश्वरम्, साईंबाबा और बालाजी का दरबार है. और न जाने कितने “भगवान” हैं जो ऐसी श्रद्धा के केन्द्र हैं जिसे हमारी तर्क बुद्धि मान्यता ही नहीं देती है. कहीं कोई स्थानीय देवी हैं, तो कहीं कोई स्थानीय देवता जिनका कोई न कोई संबंध किसी न किसी स्थापित देवता से होता है. यानी फला देवी पार्वती की अवतार हैं. या फिर ऐसी ही कोई धारणा.

इसीलिए भारत 33 करोड देवी-देवताओं का घर है. यह कोई हंसी-मजाक नहीं है. हर गांव में औसतन दो-चार ऐसे शक्तिपीठ होते हैं जिनकी मान्यता केवल इस गांव तक ही सीमित होती है. मेरे अपने गांव में ऐसे दर्जनभर से ज्यादा आस्था केन्द्र हैं जिनका अस्तित्व सिर्फ मेरे गांव तक ही है. फिर भी उनके प्रति श्रद्धा में कोई कमी नहीं है. पीढीगत संस्कार हमें बाध्य करते हैं कि हम उन स्थानों पर शीश झुकाएं. और कुछ खास तो नहीं लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में हमें श्रद्धा और विश्वास की शिक्षा अपने-आप मिल जाती है. यह श्रद्धा और विश्वास हमें जीवनभर टूटने नहीं देता, बिखरने नहीं देता. जाहिर है हमें इसकी शिक्षा ऐसे माध्यम से मिली जो कोई डिग्री नहीं दे सकता लेकिन जीवन में इसका महत्व तो होता ही है. श्रद्धा हैं शक्ति तो विश्वास हैं शिव. तुलसीदास ने रामचरितमानस में कहा है-

“भवानी शंकरौ वन्दे, श्रद्धा-विश्वास रूपिणौ”

अगर आप मन की शांति चाहते हैं तो शुरूआत इन्ही दो बातों से करनी होगी. ऋषिकेश आजकल तीर्थाटन और पर्यटन का सम्मिलित स्थान बन गया है. लेकिन आज भी यहां अधिकांश ऐसे लोग आते हैं जो योग और ध्यान के बारे में रूचि रखते हैं. क्योंकि भारत से जो संन्यासी बाहर गये हैं उनके साथ स्वाभाविक रूप से ऋषिकेश का नाम जुड़ जाता है. इसलिए विदेशों में योग और ध्यान शब्द जितना प्रचलित हुआ उतना ही ऋषिकेश भी. यहां आनेवाले विदेशी सैलानियों को देखकर तो यही लगता है.

कुछ साल पहले तक विदेशी सैलानियों के लिए बड़ी छीना-झपटी होती थी. मुझे याद है पहली यात्रा में हमारे साथ यूक्रेन की ऐलेना टेनेट्स थी. क्रियायोग की बहुत अच्छी साधक. मैं प्यार से उसे योगमाई कहता था और उसे यह शब्द बहुत अच्छा लगता था. हम लोग जब ऋषिकेश पहुंचे तो ऐसे ऐसे लोग उसे योग सिखाने की बात करते थे जिन्हें खुद आसनों से ज्यादा कुछ नहीं आता था. जबकि ऐलेना टेनेट्स क्रिया योग की दक्ष अभ्यासी थी और स्वामी शंकरानंद से दीक्षित थी. नियमित चार-पांच घंटे अभ्यास करती थी और उसके चेहरे पर वह स्वाभाविक मुस्कान थी जो किसी सच्चे साधक के चेहरे पर अपने-आप आ जाती है.

लेकिन अब यह छीना झपटी नहीं है. कोई गोरा शिष्य हो इसकी भूख भी अब संन्यासियों में उतनी नहीं दिखती जो आज से पांच-छह साल पहले दिखती थी. अपने आस-पास कुछ गोरे लोगों को बिठाकर उपदेश करना या योग की शिक्षा देना अब गये जमाने की बात हो गयी है. बाहर से आनेवाले सैलानी भी अब उन्हीं आश्रमों को अपनी आश्रयस्थली बनाते हैं जिसके बारे में पहले से उन्हें कुछ पता हो. आश्चर्यजनक रूप से विदेश में बसे भारतीयों के लड़के-लड़कियों की संख्या यहां बढ़ रही है जो दो-तीन महीने का कोर्स करने के लिए आते हैं. संभवतः यह संस्कार की खोज में हो रहा है.

ऋषिकेश का एक हिस्सा अगर आपको मोक्ष के उपाय सिखाता है तो दूसरा हिस्सा वह भी है जहां इहलोक के वे सारे उपाय काम करते हैं जो आमतौर पर किसी भी शहर में पाये जाते हैं. दूर से हमारे मन में यह बात बैठी होती है कि ऋषिकेश जाएंगे तो वहां बड़ा धार्मिक माहौल होगा. हर व्यक्ति उच्च कोटि का साधक होगा. लेकिन जब आप यहां आते हैं तो आपको पता चलता है कि यहां सिनेमा के शौकीन भी उसी तरह हैं जैसा किसी और शहर में होते हैं. यहां नश्वरता का उसी तरह बोलबाला है जैसा कि भू-भाग के किसी भी हिस्से में हो सकता है. यह ऋषिकेश वह नहीं है जिसकी मानसिक कल्पना के साथ हम यहां आते हैं. यह आम आदमी का जीवन संघर्ष है. गंगा के किनारे बैठा आदमी गंगा से उतना ही दूर रहता है जितना अमरीका में बैठा कोई गंगानिष्ठ भारतीय.

दुनियावालों के मन में ऋषिकेश मोक्षमार्ग बतानेवाली जगह है तो ऋषिकेश में भी दुनियादारी को जीनेवाले और उसे ही शास्वत सत्य माननेवाले लोगों का जमावड़ा है. वे सामान्य दिनचर्या करते हैं और अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं. उनको नाड़ीशोधन प्राणायाम नहीं सीखना है. उनको अनहद नाद का गान नहीं सुनना है. वे कुमार शानू, सोनू निगम और उदित नारायण का गान सुनकर खुश हैं. यहां आधुनिकता की भोड़ी नकल होती है. लोग दूर-दूर से शांति तलाशने भले ही ऋषिकेश के आस-पास जमीन तलाशते हों लेकिन खुद ऋषिकेश और पौड़ी जिले के लोग रोटी तलाशने दिल्ली चले आते हैं.

फिर भी ऋषिकेश में आज भी ऐसे संन्यासी हैं जो गुप्त रूप से साधना कर रहे हैं. वे मिलते-मिलाते नहीं. वे ऐसे ही कहीं किसी आश्रम के किसी कोने में बैठे मिल जाएंगे. बहुधा तो उन तक पहुंचना संभव नहीं है. ऋषिकेश ने योग को दुनिया में स्थापित करने में बहुत मदद की है इसमें दो राय नहीं. और जब तक शांति की तलाश रहेगी ऋषिकेश लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता रहेगा.

4 thoughts on “ऋषिकेश तीर्थाटन करने जाईये-2

  1. शांति की तलाश तो शायद कभी खत्म नहीं होगी.

    आपका विवरण पढ़्कर दिल खुश हो गया. एक आनन्दा नेचुरोपेथी रिसोर्ट, ऋषिकेश के बारे में पता किया था. बड़ा ही मंहगा है भाई.

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  2. आपका विवरणपढ़ कर तो वाकई तीर्थाटन का मन हो आया है…पर शान्ति के लिए नहीं मस्ती के लिए निकला जा सकता है….

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