ऋषिकेश में तीर्थाटन करने जाईये

पांच सालों में यह कोई सातवीं बार मैं ऋषिकेश गया था. पांच साल पहले पहली बार जब गया था तो रात के एक बजे पहुंचा था. बारिस के दिन थे और मेघ गरज -गरज कर टूट पड़ते थे. भय और सन्नाटे के उस माहौल में ऋषिकेश ने अद्भुद आध्यात्मिक अनुभूति दी थी. सात दिनों तक स्वार्गाश्रम के परमार्थ निकेतन में योग सीखते रहे. ध्यान करते रहे. बहुत गये तो राम-झूला और लक्ष्मण झूला. इसलिए पहली बार लौटे तो ऋषिकेश की दिव्य अनुभूतियां साथ थीं. वहीं स्वामी वेदभारती से मुलाकात हुई. स्वामी वेदभारती से वह मुलाकात आगे की यात्राओं का प्रयोजन बनता गया. तब से जब भी गया तो कारण कहीं न कहीं स्वामी वेद भारती ही थे.

इस बार भी कारण वही थे. आश्रमों में लोग शांति की तलाश में जाते हैं. लेकिन आमतौर पर वहां वह सबकुछ होता है जो आप अपने व्यक्तिगत जीवन में प्रयोग करते हैं. लेकिन कुछ आश्रम ऐसे भी हैं जहां शांति की सच्ची उपासना होती है. स्वामी वेदभारती का आश्रम भी उन्हीं आश्रमों की श्रेणी में आता है. आपके पहुंचने पर एक कमरे में डाल दिया जाता है और आठ बजे नाश्ता, एक बजे भोजन, चार बजे चाय और शाम को आठ बजे फिर भोजन. इसके बाद विश्राम वाली अनुशासित जीवनशैली जीनी पड़ती है. शहरों में रहने का आदी मनुष्य अचानक इस जीवनशैली से कैद का अनुभव करता है. तब शांति की तलाश मंहगा सौदा हो जाता है. एकाध दिन तो ठीक है लेकिन उसके बाद सामान्य जीनवशैली याद आने लगती है. मौन, शांति, साधना, तपस्या सुनने में जितने आकर्षक होते हैं जीवन में उतारना उतना ही मुश्किलभरा होता है. हफ्तेभर रहने का मन बनाकर गया था. चौथे दिन ही वहां से छुट्टी ले ली. स्वामी जी खुद भी एक महीने के लिए यूरोप जा रहे थे तो मुझे लगा अब यहां रहकर करेंगे क्या?

अपने ऋषिकेश प्रवास के दौरान इस बार मैंने अनुभव किया कि बहुत व्यवस्थित शहर भी मुर्दा होते हैं. नापजोखकर शहर नहीं बसाने चाहिए. क्योंकि उनकी नैसर्गिक बनावट दब जाती है. चंडीगढ़ चले जाईये. बहुत व्यवस्थित शहर है. नापजोख कर बना है. फिर भी चंडीगढ़ कोई आकर्षण पैदा नहीं करता. इस मायने में भारत के अधिकांश शहर अव्यवस्थित और अपनी संभावनाओं के अनुसार विकसित हुए हैं. ऋषिकेश भी इसमें अपवाद नहीं है. इसलिए स्वतंत्रता को यहां अराजकता की हद तक प्रदर्शित किया जाता है. वैसे ही जैसे बनारस, पटना, इलाहाबाद, भोपाल या फिर अन्य किसी दूसरे उत्तर भारतीय शहर में होता है. पूरा ऋषिकेश टेंपुओं से पटा पड़ा है. जैसे ही आप वहां दाखिल होते हैं दिल्ली से ज्यादा शोरोगुल से आपका इस्तकबाल होता है. छीना-झपटी और यात्रियों को आकर्षित करने की अराजक हरकतें तो अपनी जगह हैं ही.

फिर भी एक अघोषित नैतिक आवरण आपकी रक्षा करता है. अगर आप इस पचडे में नहीं पडना चाहते तो एक सीमा के बाद आपसे कोई जोर-जबर्दस्ती नहीं करता. इस नैतिक अनुशासन के पीछे भारत का पूरा एक जीवन दर्शन काम करता है. अगर आप थोड़े दिन किसी भारतीय शहर में रहते हैं तो आपको व्यवस्थित शहरों के खोखलेपन और अव्यवस्थित शहरों के बीच जीवंतता का फर्क समझ में आ जाएगा. अव्यवस्थित शहरों की इस ऊपरी छीना-झपटी के पीछे सहअस्तित्व की जबर्दस्त समझ है. व्यवस्थित शहर तो खोखले नखलिस्तान ही होते हैं. जहां शहर पर शहर की व्यवस्था ज्यादा हावी रहती है.

पश्चिम में शायद लोग एडवेंचर टूरिज्म करते है. या फिर मन बदलने के लिए यात्राएं करते हैं. दो-चार सौ किलोमीटर गाड़ी दौड़ा लेते हैं और मन को शांत कर लेते हैं. यह कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे आप उत्तेजित मन को शांत करने के लिए अधिक उत्तेजित नशा कर लें. आपको लगता है कि आप शांत हो गये लेकिन गहरे में आपने अपने आपको और उत्तेजित कर लिया. लेकिन भारत बड़े वर्ग में ऐसा नहीं होता. यहां आज भी यात्रा पर्यटन से ज्यादा तीर्थाटन है. ऋषिकेश जाना कुछ लोगों के लिए पर्यटन हो सकता है लेकिन अधिकांश लोग तीर्थाटन पर ही ऋषिकेश आते हैं. गंगा में डुबकी लगाते हैं और यह भ्रम पालकर वापस लौट जाते हैं कि उनको उनके पापों से आंशिक मुक्ति मिल गयी. पापों से मुक्ति मिलती है या नहीं यह कहना तो मुश्किल है लेकिन कुछ देर के लिए मन जरूर शांत हो जाता है. ऋषिकेश में गंगास्नान के बाद अलौकिक शांति का अनुभव तो होता है. इसके पीछे क्या कारण हैं यह कहना मुश्किल है लेकिन शांति का अनुभव प्रत्यक्ष प्रमाण है.

यह मेरे प्रारब्ध के संस्कार ही होंगे जो मुझे गंगातट पर खींचकर ले गये. आश्रम लकदक है और कुछ व्यवस्था ऐसी कि आपको गंगातट पर जाने की बात ध्यान में नहीं आती. लेकिन जिस दिन मैं वहां से निकला तो मेरे पैर अपने आप गंगातट पर खींचे चले गये. मैं कोई अतिशयोक्ति नहीं कह रहा हूं. मेरी गंगास्नान की कोई योजना नहीं थी. लेकिन मैंने गंगास्नान किया. गंगास्नान किया तो वहीं गंगा के किनारे बैठकर थोड़ी देर उपासना भी की. चलते समय कुछ दान-दक्षिणा भी दिया. और यह सब करते हुए जब मैं अपनी बस पकड़ने लौट रहा था तो मेरे मन में एक तृप्ति का अनुभव हो रहा था. आश्रम में ध्यान वगैरह सिखाया जाता है. एक गुरूकुलम है जहां देशी-विदेशी लड़के भारतीय परंपराओं का अध्ययन कर रहे हैं. ढेर सारे विदेशी मेहमान भी यहां विराजते हैं. कुछ तो अपना घर-बार छोड़कर यहीं आश्रम में बस गये हैं. लेकिन मुझे आश्रम के शानदार कमरों और ध्यानकक्ष में वह शांति नहीं मिली जो गंगास्नान और उसके बाद कंकड़-पत्थरों पर बैठने से मिली.

बहुत सारे लोग इसी बात में उलझे रहते हैं कि ठहरने की अच्छी व्यवस्था हो. साधन हो. और उन सबसे अलग तीर्थाटन में भी वे अपनी अहमियत और अहं की रक्षा चाहते हैं. मुझे लगता है यह तीर्थाटन और पर्यटन का फर्क है. पर्यटन में प्रदर्शन करना ठीक है लेकिन तीर्थाटन तो समर्पण के लिए करना चाहिए. अगली बार आप किसी तीर्थाटन पर जाएं तो हो सके तो इस बारे में जरूर सोचें कि आप पर्यटन करने आये हैं या तीर्थाटन?

अरे हां, एक बात और. दिल्ली से जाते समय हरिद्वार के पहले एक छोटा सा कस्बा है खतौली. इस शहर से गुजरते हुए एक चाय की गुमटी दिखी जिसके ऊपर यह बोर्ड लगा हुआ था. “इश्ताक चायवाले द्वारा कैंसर का ईलाज”. मैं रूककर पता करना चाहता था कि माजरा क्या है? लेकिन अपने साधन से न होने कारण मैं ऐसा नहीं कर सका. भारत ऐसे चमत्कारों से भरा पड़ा है. यहां दिल्ली के चांदनी चौक में एक आदमी पीलिया(हेपेटाईटिस-बी) की दवा देता है. बहुत से लोगों को डाक्टर जवाब दे देते हैं और यहां उसकी जड़ी खाने से वही लोग चंगे हो जाते हैं. और अच्छी बात यह है कि वह व्यक्ति कोई पैसा नहीं लेता. यानी यह संभावना खत्म हो जाती है कि वह कोई व्यवसाय कर रहा है.

भारत के ऐसे सप्तरंगी लोकजीवन को मेरा सादर नमन.

7 thoughts on “ऋषिकेश में तीर्थाटन करने जाईये

  1. तो आपने लिख ही दिया..और लिखिये जी..थोड़ी फोटो भी हो जाय.

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  2. आनन्द आया आपका यात्रा वृतांत पढ़्कर. सच है पर्यटन और तीर्थाटन में अंतर होता है.

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  3. बहुत बढ़िया संजय भाई बस तस्वीरों की कमी खली कुछ्।
    यही सब मिलकर तो हमारा भारत बनाते हैं।
    शुक्रिया!!
    आपकी नज़रों ने इस यात्रा में बहुत कुछ देखा, सुना और महसूस किया है, तो इंतजार रहेगा आपके लेखन का

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  4. वाह संजय भाईसाहब,

    आपने हमें भी पुरानी यादों में पहुँचा दिया। ऋषिकेश में गंगा मैया जब पर्वतों के पीछे से मुड़ती हुई आती हैं तो ऐसा लगता है मानो एक अद्भुत आध्यात्मिक सौंदर्य और शांति की पराकाष्ठा पर पहुँच गई हो।

    हमारे दर्शन के अनुसार सभी नदियाँ आदरणीय हैं तथा सबका अपना महत्व है पर मैंने जो शीतलता और मन के भीतर श्रद्धा गंगाजी के किनारे महसूस की है (चाहे हरिद्वर ऋषिकेश, कानपुर, इलहाबाद या बनारस कहीं भी हो) वो किसी अन्य नदी के किनारे चाह कर भी नहीं महसूस कर पाया। अभी कुछ ही दिन पहले मुझे कोलम्बिया नदी के साथ बहुत समय बिताने का अवसर मिला। सब सुंदर था, बढ़िया सड़कें, साफ सुथरी नदी, समुद्र में विलीन होती हुई, मन में बड़ी इच्छा हुई की श्रद्धापूर्वक नमन करें, नमन किया भी पर गंगाजी जैसी श्रद्धा मन में नहीं आ पाई।

    गंगा जी पर एक बार कलम नें एक बार कुछ लिखने का प्रयास भी किया था,

    आकर्षण तैर रहा लहरों के संग में,
    किरणें भी रंग गईं पानी के रंग में,
    दिनकर की आभा का अनुपम स्वरूप है,
    गंगा की घाटी है गुनगुनी धूप है,

    बीत गया कालखण्ड स्वर्णिम प्रभात का,
    धरती के पीछे है चाँद नई रात का,
    दोपहरी चमक रही बैकुण्ठी धाम में,
    बर्फीली धारा के अप्रतिम प्रणाम में,
    मंत्रों की ध्वनियों से गूँजता भवन भवन,
    मंदिर की आरती बुहारती पवन पवन,
    घाटों पर तीरथ के अनगिन प्रयोग हैं,
    अक्षत के दाता को अक्षत के भोग हैं,
    हाथ जोड़ डुबकियाँ लगा रही है ज़िन्दगी,
    धुलते हैं पाप यहाँ निर्धन धन भूप है,
    गंगा की घाटी है गुनगुनी धूप है।

    आपकी पोस्ट बहुत अच्छी लगी।

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  5. लक्षमण झूला के बारे में कुछ और जानकारी दीजिए और दिल्ली से वहां तक की यात्रा के कुछ यातायात साधन भी हो सकें तो बताइए।

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