जब शांतिपूर्ण विरोधों की अनदेखी होती है तब….

गणपति
महासचिव, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

यह सवाल उठाया जाता रहा है कि माओवादी अपनी मांगों के लिए अहिंसक तरीके से आंदोलन क्यों नहीं करते हैं? मैं समझता हूं यह बात शासक वर्ग से पूछना चाहिए कि वे आंदोलनों को शांतिपूर्ण ढंग से क्यों नहीं होने देते हैं? शासक वर्ग से मेरा तात्पर्य बड़े जमींदार, सम्राज्यवादी, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और सरकार से है। नंदीग्राम और सिंगूर में हिंसा के बाद यह खबर आई कि माओवादियों ने स्थानीय जनता को भड़काया और उनके साथ प्रदर्शन में हिस्सा लिया। नंदीग्राम में प्रदर्शन की शुरूआत शांतिपूर्ण तरीके से हुई थी। शुरूआत में समस्याओं के समाधान के लिए हिंसात्मक तरीके नहीं अपनाए गए थे। हिंसा की शुरूआत तो प्रशासन की तरफ से हुई थी। गोली उनकी बन्दूकों से चली और गरीब किसानों-मजदूरों की मौत हो गई।

शुरूआत में कोई भी अपनी समस्याओं के समाधान के लिए हिंसात्मक तरीके नहीं अपनाता है। हिंसा तभी होती है जब शांतिपूर्ण प्रदर्शनों, रैलियों, भूख-हड़ताल इत्यादि पर ध्यान नहीं दिया जाता या उनका दमन करने की कोशिश की जाती है। सशस्त्र संघर्ष या हिंसक संघर्ष का प्रश्न व्यक्तिपरक सनक या पार्टी की इच्छाओं पर आधारित नहीं है। यह किसी एक की इच्छा से मुक्त है। ऐसी स्थिति एक दिन में नहीं बनती है। शांतिपूर्ण ढंग से धरना या सभा करते हुए लोगों पर गोलियां बरसाने के लिए सिपाहियों, सीआरपीएफ और सेना को क्यों भेजा जाता हैं? औरतों का बलात्कार करने, संपत्ति को बरबाद करने और भारतीय संविधान का उल्लघंन करके फर्जी मुठभेड़ करने की अनुमति किसने दी है? ऐसे अमानवीय कृत्यों के बावजूद उन्हें निर्दोष माना जाता है। कलिंग नगर, नंदीग्राम और ऐसे ही कई स्थानों पर गोलियां बरसाई गईं। इसके लिए कौन जिम्मेदार है?

सेज नीति का उद्देश्य देश के अंदर औपनिवेशिक विदेशी क्षेत्र बनाना है, जहां जमीन का कोई कानून लागू नहीं होता है। वृंदा करात ने कहा कि माओवादियों ने नंदीग्राम में आने के लिए समुद्री रास्ते का इस्तेमाल किया। ये राजनीतिक दलाल मुद्दे को मोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। बार-बार यह दोहराया जा रहा है कि`बाहर´ से आए माओवादियों ने स्थानीय जनता को भड़काया और तब पुलिस के पास आत्मरक्षा में गोली चलाने के सिवा कोई विकल्प नहीं रह गया था। अन्य प्रतिक्रियावादी शासक वर्ग की तरह बंगाल के मार्क्सवादी शासक भी बाहरी हाथ का राग अलापने में लगे हैं, वह भी उस हिंसक स्थिति के लिए, जो उन्होंने खुद पैदा की थी। इन तथाकथित सिद्धांतवादियों के तर्कों के राजनीतिक दिवालियेपन को देखना घिनौना है।

इन लोगों के लिए सलेम या टाटा `बाहरी´ नहीं हैं, जबकि माओवादी `बाहरी´ हो गए । गोएबेल्स भी अपनी कब्र से निकलकर देखता होगा कि उसकी झूठ बोलने की कला किस तरह बुद्धाओं, करातों, येचुरिओं आदि`मार्क्सवादियों´ द्वारा उन्नत हुई है। बुद्धदेव बंगाल के डायर की तरह उभरे और खुद को बड़े घरानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का वफादार नौकर साबित किया। देश में बड़े व्यावसायिक घरानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों की रक्षा के लिए सीपीआई (एम) एक बेहतरीन दांव है। ऐसे मौकों पर जहां तक हमारी भूमिका का सवाल है तो निश्चित तौर पर हम अग्रिम मोर्चे पर रहने और आंदोलन को एक दिशा देने की हर संभव कोशिश करेंगे।

हम अपने जनाधार के विस्तार की रणनीति पर काम कर रहे हैं मजदूर, किसान, मध्यम वर्ग, दलित, महिलाएं, आदिवासी और करोड़ों मेहनती लोग हमारे जनाधार का निर्माण करते हैं। ये वृहत आबादी ही वास्तविक भारत है न कि समाज के पांच या दस प्रतिशत शोषक वर्ग। इस आबादी को क्रांति की जरूरत है और वे हमारी ओर आशावादी नजर से देखते हैं। जैसे-जैसे हमारे व्यक्तिपरक बल में वृद्धि होगी हम देश भर में इन पीड़ितो के बीच जगह बनाएंगे। समाज के पीड़ित जनों के बीच हमारा एक मजबूत आधार बन गया है, जहां हम सशस्त्र सामंत विरोधी कृषि संघर्ष का नेतृत्व कर रहे हैं। अब हमें शहरी क्षेत्रों में समाज के दूसरे हिस्सों जैसे-मजदूर वर्ग, युवाओं, मध्यम वर्ग, छोटे व्यापारियों, फेरीवालों के बीच अपनी पैठ बनाने की आवश्यकता है।

(यह लेख प्रथम प्रवक्ता में छपा है जो विद्या हरिवेलके से बातचीत पर आधारित है)

6 thoughts on “जब शांतिपूर्ण विरोधों की अनदेखी होती है तब….

  1. साथी गणपति, शुतुरमुर्ग की मुद्रा से बाहर निकलिए। सशस्त्र संघर्ष …संघर्ष का महज एक और अंतिम रूप है। असहाय लोगों का भगवान बनकर कभी क्रांति नहीं होती। व्यापक जनभागीदारी और जनमोर्चे की अहमियत आप मुझसे ज्यादा समझते होंगे।

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  2. लिखा तो बढ़िया है पर सवाल यह है कि आक्रोश की अभिव्यक्ति हिंसा से ही हो सकती है? अधिकार पाने के लिए हिंसा का सहारा कितना उचित है।

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  3. संजय जी सबसे पहले आप‍को हार्दिक धन्‍यवाद देना चाहता हूं। बढिया लेख प्रस्‍तुत किया है आपने। दरअसल नक्‍सलवादी कायर होते है। हिंसा का सहारा वो लेते है जिन्‍हें जनता का विश्‍‍वास प्राप्‍त नहीं होता। लोगों के हाथ काट देने, पैर काट देने, नरसंहार करने, थाना लूटने, बैंक लूटने, फिरौती लेने से समाज परिवर्तन की बात करना बेमानी है। माकपा और भाकपा तो विचारहीन है ही।

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  4. यह बड़ा भयावह समय है जब लोगों के शांतिपूर्ण विरोधों, शिक़ायतों का कोई असर नहीं होता। हिंसा मंजूर नहीं, अहिंसा से कुछ होता नहीं, तो आदमी क्‍या करे? कहाँ जाए?- आनदं

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  5. अहिंसा से कुछ होता नहीं, तो आदमी क्‍या करे.क्या अंत में उसके पास हिंसा का रास्ता ही बचता है..और हिंसा कभी कायर नहीं कर सकते है,,,और जब राज्य हिंसा करता है तो लोग क्यों चुप हो जाते हैं…चाहे गुजरात हो या बंगाल

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