एग्रीगेटर होने का धर्म

आलोक कुमार शुरूआती हिन्दी ब्लागरों में से एक हैं. कुछ लोग उन्हें पहला हिन्दी ब्लागर भी कहते हैं. यहां मैं उनके एक ई-मेल का जिक्र कर रहा हूं जो दो दिन पहले आया था. ई-मेल में वे सवाल करते हैं कि क्या उनके ब्लाग में कुछ भी ऐसा आपत्तिजनक दिखता है जिसके चलते कोई एग्रीगेटर उनके ब्लाग को अपने यहां से हटा दे.

कल दोबारा उनका ई-मेल आया और उन्होंने यह याद दिलाया है कि ब्लागवाणी को उन्होंने लिखा था लेकिन उनकी ओर से अभी तक कोई जवाब आया नहीं है. उनको शंका है कि उनके ब्लाग को ब्लागवाणी से इसलिए हटाया गया है क्योंकि वे चिट्ठाजगत से जुड़े हुए हैं. आलोक कुमार हमसे बेहतर जानते हैं कि इन बातों का सही-सही मतलब क्या होता है. ब्लागवाणी ने उनका ब्लाग अपने यहां से क्यों हटाया और आलोक कुमार यह सवाल क्यों उठा रहे हैं इसके पीछे का मर्म तो ब्लागवाणी के संचालक और आलोक कुमार ही जानें.

मुझे लगता है यह तकनीकि से ज्यादा निजी व्यक्तित्व और विचार का विषय है. तकनीकि तो सिर्फ हमें अभिव्यक्ति का मौका देती है. हम क्या अभिव्यक्त करना चाहते हैं यह आखिरकार तो हमें ही तय करना है. अच्छे लोग जहां भी होंगे अच्छी व्यवस्था का निर्माण कर लेंगे. लोग ही बुरे हों तो अच्छी व्यवस्था भी बुरी हो जाती है. फिर क्या ब्लागर और क्या एग्रीगेटर.

बड़े काम करने के लिए चेतना की व्यापकता होनी चाहिए. उदार हृदय और समग्र बुद्धि के बिना बड़े काम नहीं होते. बड़े काम करने के दावे हम चाहे जितने कर लें आखिरकार हम छोटे ही रह जाते हैं. यह किसी ब्लागर-एग्रीगेटर का सवाल नहीं है. यह हमारे व्यक्तित्व का विषय है. मैं, आप, और कोई तीसरा सभी पर यह बात लागू होती है. आशा है हम अपनी खंडित बुद्धि को विस्तार देंगे. पूर्वाग्रह मुक्त मन से उस काम में पूर्ववत सक्रिय हो जाएंगे जिसके लिए यहां इस जगह पर मुलाकात हुई है.

आपलोग तो खुद समझदार हैं, मैं नाचीज आपको क्या कह सकता हूं.

12 thoughts on “एग्रीगेटर होने का धर्म

  1. सब एग्रीगेटर किसी न किसी रंग में रंगे हुए नज़र आते हैं.. किसी को गुजरात प्यारा है तो किसी को बंगाल

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  2. यह रुझान तो ब्लॉग लेखकों में भी देखी जा सकती है। अच्छा नजरिया …..

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  3. एग्रीगेटरों द्वारा अपनी पसंद से ब्‍लॉगों को हटाने की प्रवृत्ति के हम सिद्धांतत: विरोधी रहे हैं। यहॉं नारद की तरह ‘सामहिक मंच है’ जैसा नारा तो है नहीं कि हम कोई दबाब बना सकें पर अगर सैद्धांतिक कारण से ऐसा किया गया है तो हमारी सैद्धांतिक असहमति है।
    अगर व्‍यवसायिक कारण से ऐसा है तो ये कौन ब्लागवाणी इसमें करोड़ो कमा रहा है।

    हमारा अनुरोध है मैथिलीजी पुन: एक्‍सक्‍ल्‍यूजन की बजाय शामिल करने पर विचार करें। शायद व्‍यवसायिकता की समझ भी यही कहती होगी।

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  4. ब्लागवाणी आलोक का ब्लाग क्यों नहीं दिखा रहा है?
    चिठ्ठाजगत सिरिल का ब्लाग क्यों नहीं दिखा रहा है?

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  5. आजतक ऐसा नहीं सुना कि किसी चिट्ठाकार ने चिट्ठाजगत पर चिट्टा जोड़ा हो और वह शामिल न हुआ हो। क्या सिरिल ने चिट्ठाजगत पर चिट्ठा शामिल किया है? यह सिरिल है कौन? उसका आलोक से वास्ता क्या है? उसका चिट्ठा कहाँ है?

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  6. यह आलोक है कौन? कोई anonymous? क्या वह रो रहा है ? इसका सिरिल से क्या वास्ता है ?

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  7. संजय जी, आपकी यह पोस्ट बहुत पसंद आई। न जाने लोगों को पहला पहला की रट लगाने में क्या मज़ा आता है। अभी हिन्दी की हालत ही क्या है जो इतना गरूर किया जाए। हमारे तथाकथित लोकतंत्र में हिन्दी या हिन्दी वालों के हाथ में कोई भी ताकत नहीं, फिर काहे का दिखावा। लगता है अंग्रेज़ी का प्रभुत्व रखने वालों के बाद अब हिन्दी वाले अपना प्रभुत्व दिखाना चाहते हैं।

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  8. अब इस बारे तो हम कुछ कहने की स्थिति में नहीं। इस पर आलोक जी और मैथिली जी ही प्रकाश डाल सकते हैं।

    ऊपर अफलातून जी की आलोक भाई के प्रति टिप्पणी अच्छी नहीं।

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  9. अलोक जी से हमदर्दी है,
    किन्‍तु सठेशाठ्यू समाचरेत का ही व्‍यवहार है। अगर चिटृठाजगत को शिरील जी का ब्‍लाग हटाने का हक है तो ब्‍लागवाणी ऐसा करता है तो व्‍यर्थ की पंचायत क्‍यों ?

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  10. @महाशक्ति,
    आलोक जी का कहना है कि सिरिल जी ने चिट्ठाजगत पर कभी अपने ब्लॉग को शामिल ही नहीं किया, अतः उनका ब्लॉग हटाने की कोई बात नहीं हुई है। दूसरी ओर आलोक जी का ब्लॉग पहले ब्लॉगवाणी पर था पर अब नहीं है।

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