इतने स्थिर कि जड़ हो गये

पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिस गांव में पैदा हुआ हूं वह काशी, प्रयाग, अयोध्या त्रिकोण के बिल्कुल केन्द्र में है. इसके अलावा मां विंध्यवासिनी और परमपावन गंगा का सानिध्य भी प्राप्त है. मैं बहुत सौभाग्यशाली हूं ऐसा तो आभास होता ही है लेकिन सवाल भी मन में उठता है कि क्या केवल सौभाग्य से जीवन चल जाएगा? जब-जब मैं अपने गांव जाता हूं तो मेरे मन में हमेशा एक ही सवाल आता है कि क्या हम सदगुण विकृति के शिकार हो गये हैं? क्या इस परम पवित्र भूभाग में गुप्त सरस्वती के रूप में व्याप्त जीवन की समझ किसी काम की नहीं रही?

इस पूरे इलाके में एक अजीब सा खोखलापन आ गया है. ब्राह्मणों को इस बात का अभिमान तो है कि वे ब्राह्मण हैं लेकिन इस बात का आभास नहीं है कि ब्राह्मण होने का मर्म क्या है? ब्राह्मण होने की पात्रता तो वे कब की खो चुके है. इस पूरे इलाके में मानसिक गुलामी और जीवन में फैल गयी छुद्रता हर समाज और वर्ग में दिखाई देती है. खासकर ब्राह्मणों और ठाकुरों में. इन दो जातियों में जितनी गिरावट आयी है उतनी और किसी जाति समूह में नहीं. सवर्णों के जीवन में आयी इस गिरावट का असर यहां के समाज में साफ तौर पर दिखता है. अन्य दो वर्ण अर्थात वैश्य और सूद्र आश्चर्यजनकरूप से बहुत बेहतर मानसिक और आर्थिक अवस्था में जी रहे हैं. उनकी मेहनतकश मानसिकता ने उनका स्खलन नहीं होने दिया है.

ब्राह्मणवादी मानसिकता इस इलाके के ब्राह्मणों को बहुत भारी पड़ी है. झूठे दंभ और अहंकार ने धीरे-धीरे उनके जीवन में स्थाई छीजन का निर्माण कर दिया है. आज कई बड़े शहरों में जितने निम्न काम हो रहे हैं उसको यहीं के सवर्ण कर रहे हैं. दिल्ली और मुंबई का मेरा विस्तृत अनुभव और अध्ययन है. इन दो जगहों के आधार पर मैं कह सकता हूं कि जो सवर्ण गांव में सीना फुलाकर चौड़े होते हैं वही शहर में रिक्शा और पान लगाने का व्यवसाय करते हैं. मुझे तब बहुत आश्चर्य होता है जब इन्हीं लोगों को इनके गांवों में मिलता हूं. शहर के निम्नस्तरीय काम करनेवाले ये ब्राह्मण या ठाकुर जब गांव पहुंचते हैं तो वापस उसी झूठी खोल में घुस जाते हैं जिसका अर्थ भी इन्हें नहीं पता.

सवर्णों में आये इस पतन का असर पूरे समाज पर पड़ा है. पूरा इलाका मानों जड़ हो गया है. गरीबी से ज्यादा तकलीफदेह है यहां की चाटुकार मानसिकता. मनीआर्डर अर्थव्यवस्था ने पूरे इलाके को काहिल बना दिया है. किसी भी गांव में चले जाईये. हर घर से कोई न कोई परदेशी होगा. कई घरों में सिर्फ औरतें, बच्चे और बूढ़े ही गांव में रहते हैं. सारे मर्द परदेश में कमाई करने के लिए बाहर जा चुके होते है. पूर्वी उत्तर प्रदेश की लगभग पूरी अर्थव्यवस्था मनीआर्डर पर निर्भर है. इसलिए यहां कोई उद्योग-धंधा या फिर उन्नत खेती कभी विकसित ही नहीं हो सकी. घर में पैदा हुआ बच्चा शहर को अपनी पूरी जवानी समर्पित करने चला जाता है. जब बूढ़ा होता है तो पुनः लौट आता है. पता नहीं कितनी पीढ़ियों से यही सब चलता आ रहा है. और फिलहाल यह सिलसिला टूटता दिखाई नहीं दे रहा है.

इस प्रक्रिया ने पूरे इलाके को एक ऐसी जीवनशैली का शिकार बना दिया है जो स्थिरता नहीं जड़ता है. लोकोक्तियों-कहावतों और झूठे किस्सों को ग्यान की उपासना समझी जाती है. अधिकांश लोग जो गांव में हैं उनके सामने जीवन चलाने के बहुत ही कम अवसर हैं. अब परदेश यानी दिल्ली बंबई जाना, मेहनत मजूरी करना और साल छह महीने में एकाधबार लौटकर गांव आना यही यहां का उत्तम जीवन है. उजले-चमकीले और उर्जावान नौजवान शहरों की भेंट चढ़ा दिये जाते हैं. फिर भी यहां इस तरह के जीवन को महिमामण्डन किया जाता है. मसलन कोई आपसे मिलेगा तो आपसे पूछेगा कि आप कहां रहते हैं. क्या कमाते हैं. इसके बाद ही आपसे आगे की बात करता है. यह बात गौड़ है कि आप क्या काम करते हैं. किसी भी पतित समाज या व्यक्ति की यही निशानी होती है कि वह आपके काम या व्यक्तित्व से नहीं बल्कि आपके रूपये-पैसे से आपका आंकलन करता है. पूर्वी उत्तर प्रदेश में चहुंओर यह व्याप्त है.

9 thoughts on “इतने स्थिर कि जड़ हो गये

  1. आपका लेख एक सच्चाई को सामने खोल कर रख रहा है। उस इलाके के लोग, जो बाहर रह रहे हैं, यह बात जानते ही हैं कि वहाँ रह के उनका कुछ नहीं होने वाला। न कोई कारखाने हैं, न कोई उद्योग। न कला की रचना करने वाले या उसे बढ़ावा देने वाले ही कोई हैं। कोई बड़ा उद्योग घराना वहाँ अपना दफ़्तर नहीं खोलना चाहता। लोग चाह कर भी वापस नहीं आ सकते हैं। जो वहाँ बचे हैं उनकी मानसिकता के बारे में तो आप बता ही रहे हैं।

    एक हद तक ही सरकार, प्रणाली आदि को दोष दिया जा सकता है। सरकार की प्रणाली तो गुजरात और पंजाब में भी वैसी ही है।

    सच है कि प्राचीन महिमा का सूद बहुत पहले मिलना बंद हो गया था, और अब मूल को भी अकर्मण्यता ने खा खा कर समाप्त कर दिया है।

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  2. पूरा देश ब्राह्मणवादी मानसिकता का शिकार है गुरुदेव

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  3. संजय भाई, बड़ी कड़वी सच्चाई आपने बयां की है। मैं भी इसका गवाह हूं, पूर्वी उत्तर प्रदेश का ही हूं। समझ में नहीं आता कि लोगों को इससे निकालने का रास्ता क्या है। मुझे इन पर गुस्सा नही आता, दया आती है। पर क्या करूं, कभी-कभार गांव जाता हूं कि इनकी बातें सुनकर लगता है कि इन सभी को उल्टा करके पेड़ से लटका दिया जाए।

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  4. सही बात है.. एक ज़बरदस्त हिलोड़ चाहिये इस सोये हुए प्रदेश को.. एक जागरण चाहिये.. आप कर सकते हैं कुछ.. कीजिये..

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  5. संजय भाई अनिल जी से मी सहमत हूँ. पर इस दुर्भाग्यजनक स्तिथी से निकलने का रास्ता तो इन्ही लोगो को खोजना होगा. हाँ कमियां सरकार की तरफ़ से जरूर है पर वो किस क्षेत्र मे नहीं है.

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  6. दुर्भाग्यपूर्ण और दुखित करने वाला विषय यह नहीं है कि ऐसा हो रहा है बल्कि यह है कि ऐसा ही होता रहेगा क्योंकि इससे बाहर निकलने की दिशा में कोई सार्थक प्रयास की पहल तक नहीं हो रही.

    अच्छा विषय उठाया आपने.

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  7. लगता है – गांव हो कर आये हो।
    मेरा एक मित्र भुज में आये भूकम्प के समय चार दिन स्पेशल ड्यूटी में उस क्षेत्र में रहा। वहां से आ कर कुछ दिन विभीषिका देखने से इतना असामान्य रहा कि उसकी हदस जाने में 10-15 दिन लग गये।
    आप भी उसी तरह की हदस से गुजर रहे हैं क्या?

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  8. करना तो कुछ वहाँ के लोगों को ही पडेगा । मेरे खयाल से जातीवाद के चक्कर से हट कर सब के लिये कुछ करना होगा ।

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  9. बिलकुल ठीक कहा आपने, अपने झूठे अभिमान और इस मनीआर्डर आधारित अर्थव्‍यवस्‍था ने वहाँ लोगों को पंगु बना दिया है। जो व्‍यक्ति यहाँ दिल्‍ली में आकर जितनी मेहनत करता है, यदि उतनी मेहनत वहीं रहकर करे तो कमाई कहीं अधिक होगी। परंतु जाने कौन सी चीज़ है जो वहां हाथ-पैर बांध देती है।-आनंद

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