यहां आधुनिकता का मतलब पोषण नहीं, शोषण है

पूर्वी उत्तर प्रदेश का यह पूरा इलाका मनीआर्डर अर्थव्यवस्था से चलता है. यानी यहां रोजी-रोटी की परंपरागत जातीय संरचना टूटी है लेकिन इसका कोई विकल्प खड़ा नहीं हुआ है. जाति व्यवस्था रोजगार की पक्की गारंटी देती थी. वह टूट गयी है लेकिन नयी व्यवस्था क्या हो इसकी कोई योजना नहीं है. अस्सी-नब्बे के दशक में सरकारी नौकरी का जोर था. आईएएस होना वैसे ही गर्व की बात होती थी जैसे किसी मुकुट में कोहिनूर हीरा जड़ गया हो. आईएएस होने का तिलिस्म आज भी बरकरार है लेकिन सरकारी नौकरी का भ्रम टूटा है. जब भ्रम था तब भी यह कुछ खास फायदेमंद नहीं था. अब तो इक्के-दुक्के लोग ही सरकारी नौकरी के लिए प्रयास करते हैं. फिर इतनी बड़ी सघन आबादीवाला इलाका अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए क्या करता है?

खेत सिकुड़ रहे हैं. आबादी के दबाव के कारण औसतन हर दस साल में तीन से पांच प्रतिशत भूमि भवन निर्माण में जा रही है. इसका असर सार्वजनिक जमीन पर हो रहा है. चारागाह और अन्य सार्वजनिक भूमि को खेत में बदला जा रहा है. बाग-बगीचों तक में खेती की कोशिश हो रही है. यानी छोटी होती जोत के सहारे अधिसंख्य लोगों का पेट नहीं पाला जा सकता.शानो-शौकत की बात ही दूर है. सरकारी नौकरी की कोई उम्मीद नहीं है. शिक्षा आज भी अकादमिक रूप धारण किये हुए है इसलिए यहां की पढ़ाई रोजी-रोटी देनेवाली नहीं है. परंपरागत तकनीकि ज्ञान से लोग दूर हो गये हैं और नयी तकनीकि सीखने की कोशिश नहीं की. ऐसे हालत में परदेश जाकर मेहनत-मजूरी करने के अलावा जीने के लिए और कोई रास्ता बचता भी नहीं है.

इलाके के मजदूर आपको देश-विदेश के हर कोने और हर व्यवसाय में मिल जाएंगे. वे अलंग के खतरनाक शिपब्रेकिंग उद्योग में हैं तो तमिलनाडु के तिरूपुर में गंजी-जांघिया भी बना रहे हैं. अमेरिका कनाडा से लेकर दुबई के लेबर कैंपों तक यहां के मजदूर आपको मिल जाएंगे. यानी पलायन ही यहां का एकमात्र रोजगार है. पलायन करके यहां से दूर गये मजदूर अपना हाड़-मांस गलाकर जो धन अर्जित करते हैं उसका एक निश्चित हिस्सा इस इलाके में पहुंचता है जिसके सहारे आज लगभग पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था चल रही है. इतनी मेहनत से कमाया गया धन जब यहां पहुंचता है तो अक्सर वह जाया हो जाता है.

कंपनियों ने इस इलाके में अपना मकड़जाल अच्छी तरह से बिछा लिया है. गांव की गुमटी से लेकर इलाहाबाद और बनारस में हालिया बने मालों तक आपको कंपनियों का साम्राज्य दिखाई देगा. आधुनिकता आयी है लेकिन पोषण के लिए नहीं. वह यहां शोषण करती है. यहां आधुनिकता एक स्पंज व्यवस्था के रूप में काम करती है. जो मेहनत से कमाये गये धन को अपने विविध सोख्तों से सोख लेती है. यहां का अधिकांश खर्च कंपनियों के उत्पाद को खरीदने पर होता है. यहां तक कि खेती में भी जो धन निवेश होता है वह किसी न किसी रूप में कंपनियों की जेब में पहुंच जाता है. आप ट्रैक्टर रखते हैं और उस पर खर्च करते हैं तो वह पैसा कहां जाएगा? आप खाद-बीज बाजार से खरीदते हैं तो उसका पैसा कहां जाता है? आप साबुन-दियासलाई और ऐसी ही दैनिक जरूरतों की वस्तुएं खरीदते हैं तो वह पैसा कहां जाता है? जाहिर है यह स्थानीय अर्थव्यवस्था को कतई मदद नहीं करता.

यहां कमाने की व्यवस्था और अवसर कोई पैदा नहीं करता. न सरकार और न ही निजी कंपनियां. वे खर्च करने के रास्ते बनाती हैं. यानी कमाएं आप अपने संघर्ष से और खर्च करें उनकी इच्छा से. यह तो एक किस्म का अपराध है. बहुत संगठित अपराध जिसकी योजना सरकारी कारिंदे और कंपनियां मिलकर बनाते हैं. अगर कमाने के अवसर उसी अनुपात में बढ़ते तो शायद स्थिति इतनी भयावह नहीं होती और इतनी दुख भी नहीं होता. अच्छी अर्थव्यवस्था की निशानी भी तो यही है कि आप पैसे को ज्यादा से ज्यादा बाहर दौड़ाएं. गड्ढे में गाड़कर रखा गया धन किसी भी तरह से अर्थव्यवस्था को मदद नहीं करता. लेकिन गड्ढे में गाड़ने के लिए प्रजा के पास धन हो इसकी चिंता तो राजा को ही करनी होती है. यहां तो राजा ने अपना कर्म बदल लिया है. प्रजा में इतनी चेतना बची नहीं है कि अपने बूते कुछ कर ले. वह जो कर सकती है वह कर रही है. वह है – पलायन. अब नीति निर्धारकों क्या करना चाहिए, क्या वे सोचने की जहमत उठायेंगे?

5 thoughts on “यहां आधुनिकता का मतलब पोषण नहीं, शोषण है

  1. नाम बस बदल दें तो यह सारा विवरण मुझे छत्तीसगढ़ सा ही लगा!!

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