“यमुना डिपो” पर दिल्ली मेट्रो जवाब दे

दिल्ली मेट्रो के कार्यकारी निदेशक ई श्रीधरन के लिए यह गर्व की बात है कि उन्होंने दिल्ली को वह पवित्र गाय दे दी है जिस पर कोई सवाल नहीं उठा सकता. न कानून, न प्रशासन और न ही मीडिया. यह दिल्ली की चरमराई जन-परिवहन प्रणाली ही है कि श्रीधरन जो कुछ करते हैं उसका आंख-मूंदकर समर्थन कर दिया जाता है. इस आंखमूंद समर्थन ने श्रीधरन के उत्साह को बल्लियों उछाल रखा है और अब इसी उछल-कूद में वे यमुना की छाती पर जा खड़े हुए हैं. उनका बुलडोजर दिन-रात काम कर रहा है. ठीक यमुना की छाती पर आईटीओ और शकरपुर के बीच 111 एकड़ जमीन पर यमुना डिपो बनाया जा रहा है.

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यमुना डिपो जहां बन रहा है वह जमीन किसी डिपो आदि जैसे निर्माण कार्य के लिए सुरक्षित नहीं है. भारत सरकार के ही एक अन्य विभाग राईट्स ने निर्माण कार्य शुरू होने के पहले एक सर्वेक्षण किया था. सर्वेक्षण में जो मुख्य बातें आयीं उसमें यह भी था कि यह जगह आस-पास की सतह से तीन मीटर नीचे है. (ध्यान रहे यह नदी का पेटा है) और यहां डिपो बनाने के लिए मिट्टी और फ्लाईऐश की भराई करनी होगी. साथ ही 200 पेड़ काटने होंगे और गंदे तेल और डिपो से निकलनेवाले कचरे के कारण नदी और भूजल के प्रदूषित होने का खतरा बना रहेगा. एक तरह से यमुना डिपो पर यह सवाल उठाया गया था कि यहां ट्रेन डिपो बनाना सुरक्षित नहीं है. भूकंप का हल्का झटका या फिर बाढ़ का हल्का झटका भी इस डिपो को बर्बाद कर सकता है. फिर भी यहां काम शुरू किया गया और अब पटरियां बिछाने और स्थाई भवन निर्माण का काम शुरू होनेवाला है.

डिपो की सुरक्षा बड़ा सवाल नहीं है. बड़ा सवाल है शहर और नदी की सुरक्षा. जहां यह डिपो बन रहा है भौगोलिक रूप से यह यमुना के जल भराव के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां सतह के नीचे स्थित बेडरॉक बहुत नीचे है. बेडरॉक का बहुत नीचे होना अगर जलभराव के लिए लाभदायक है तो स्थाई निर्माण के लिए खतरनाक. लेकिन इन सब बातों को दरकिनार करते हुए दिल्ली मेट्रो के निदेशक ने डिपो बनवाने का सरकारी फरमान हासिल कर लिया. श्रीधरन कहते हैं “यमुना के बारे में मैंने सरकार को चार सूत्री फार्मूला दिया था. मेरे हिसाब से पहले यमुना की चौड़ाई कम की जाए, उसका पाट संकरा किया जाए, और तटों की जमीन को कंक्रीट से पक्का किया जाए. पाट संकरा करने से जो जमीन निकलेगी उसका उसे रियल-एस्टेट के रूप में विकसित कर बेचा जाए. ” श्रीधरन के बयान के पीछे उनकी मंशा साफ दिख रही है.

मंशा अकेले श्रीधरन की नहीं है। इसमें दिल्ली के कई नामी भूमाफिया और बिल्डर, सरकारी नुमाइंदे और वित्तीय कंपनियां शामिल हैं. यमुना की 10 हजार हेक्टेयर जमीन को खाली मानकर ये लोग चरणबद्ध तरीके से उसपर कब्जा करना चाहते हैं. अब श्रीधरन और उनकी दिल्ली मेट्रो रियल एस्टेट के इस खेल में अहम खिलाड़ी के रूप में उतरकर सामने आये हैं. वैसे इसके पहले भी शास्त्री पार्क डिपो बनाते समय ही इस बात का पूरा इंतजाम कर लिया गया था कि इतनी जमीन कब्जा कर लो कि आगे इसका रियल-एस्टेट व्यवसाय में उपयोग किया जा सके. हुआ भी वही. आज शास्त्रीपार्क डिपो में छह हेक्टेयर क्षेत्र में आईटी पार्क खड़ा हो गया है जिसे लार्सन एण्ड टुब्रो के साथ मिलकर बनाया गया है. इसके अलावा खैबरपास डिपो में 6.8 एकड़ जमीन पर 194 करोड़ की लागत से एक आवासीय परिसर बन रहा है. इसमें दिल्ली का ही एक बिल्डर पार्श्वनाथ डेवलपर दिल्ली मेट्रो को सहयोगी है. पार्श्वनाथ डेवलपर के साथ दिल्ली मेट्रो ने 150 करोड़ का एक समझौता किया है इस समझौते के तहत पार्श्वनाथ डेवलपर्स दिल्ली मेट्रो के साथ मिलकर मेट्रो की खाली पड़ी जमीन पर कामर्शियल प्रापर्टी बनाएगी. कोई भी यह सवाल पूछ सकता है कि दिल्ली मेट्रो के पास यह खाली जमीन आयी कहां से? जब मेट्रो ने स्थान का इतना बेहतर प्रबंधन किया है कि टायलेट तक नहीं बनाये हैं तो यह खाली जमीन कहां से पैदा हो गयी?

मेट्रो की चकाचौंध में दिल्ली सरकार ने जो जमीन दिल्ली मेट्रो को उपलब्ध करवाई उस जमीन का लैंण्ड यूज मनमानी तरीके से बदल दिया गया. सार्वजनिक संपत्ति कब निजी मिलिकयत में बदल गयी किसी को पता नहीं चला. दिल्ली मेट्रो ने शुरू से ही जरूरत से ज्यादा जमीन कब्जा कर रही थी. आज दिल्ली मेट्रो के दफ्तर में एक विभाग बन गया है जो सिर्फ रियल एस्टेट का काम देखता है. लेकिन यह विभाग अचानक नहीं बना है. दिल्ली मेट्रो की शुरू से ही यह योजना थी कि वह अपने परियोजना खर्च का तीन प्रतिशत रियल-एस्टेट के व्यवसाय से निकालेगी. आज मेट्रो यही कर रहा है. मेट्रो के नाम हथियाई गयी जमीन को रियल-एस्टेट के कारोबार में प्रयोग किया जा रहा है. बात तब भी उतनी न अखरती अगर यह यमुना को भी अपने चपेट में न लेती. अब दिल्ली मेट्रो यमुना को खा जाने का खेल खेल रही है. दुर्भाग्य से कोई भी इस बात की जांच-पड़ताल नहीं कर रहा है कि यमुना डिपो बनने से दिल्ली को कितना फायदा और कितना नुकसान होगा.

6 thoughts on ““यमुना डिपो” पर दिल्ली मेट्रो जवाब दे

  1. संजय जी
    आपने एक महत्वपूर्ण विषय पर सवाल उठाया है।

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  2. वाकई आश्चर्य हो रहा है कि ऐसे मुद्दे पर मीडिया के कर्णधारों की नज़र क्यों नही जाती!!

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  3. वाकई, आपने बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दे को उठाया है। इस बारे में मीडिया के माध्यम से दिल्ली की जनता को तुरंत जागरुक किए जाने की जरूरत है।

    मुझे शक है कि इस मामले में कोर्ट का रुख भी भूमाफिया और रीयल इस्टेट के इन कारोबारियों के पक्ष में जाएगा।

    यमुना के किनारे बसे झुग्गी-झोपड़ी के लोगों को इनलोगों ने इसी मकसद से उजाड़ा ताकि वहां ये लोग अब रीयल इस्टेट का नया पॉश लोकेशन बना सके हैं।

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  4. नदी को हल्के में ले रहे हैं ये लोग.. जिस दिन नदी ने उलटे हाथ का एक थपेड़ा दे दिया.. ऐसी मुँह के बल गिरेगी दिल्ली कि उठाये नहीं उठेगी..
    इस मुद्दे पर बखेड़ा होना चाहिये..

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