ब्लॉग को ब्लॉग ही रहने दो

आज नवभारत टाईम्स में अनुराधा और दिलीप मंडल का हिन्दी ब्लाग पर एक लेख है. लेखक द्वय कहते हैं कि ब्लाग ब्लाग ही है कोई करिश्मा नहीं. इस बात के पक्ष में लेखक द्वय काफी बौद्धिक विश्लेषण करते हैं. लेखक द्वय कहते हैं “दरअसल बहस इस बात की नहीं है कि एक माध्यम के तौर पर ब्लाग का इस्तेमाल किया जाए या नहीं, समस्या तब होती है जब कुछ लोग इसके असर को लेकर चमत्कृत हो जाते हैं और दूसरों को भी चमत्कृत करने की कोशिश करते हैं.ब्लाग से किसी चमत्कारिक नतीजों की उम्मीद करना मौजूदा स्थितियों में निरर्थक है.”
दिलीप मंडल संभवतः पत्रकार हैं और खुद भी हिन्दी ब्लाग लिखते हैं. अपने लेख में वे जिस मौजूदा स्थितियों का उल्लेख कर रहे हैं उसके विस्तार में जाने की जरूरत है. आमतौर पर तकनीकि की समस्या, हिन्दी के मानकीकरण और इंटरनेट की पहुंच को दोषी मानकर ही हम इस निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं कि हिन्दी ब्लागिंग शायद इन्ही कारणों से विस्तार नहीं पा रहा है. ये कारण एक हद तक जिम्मेदार तो हैं लेकिन पूरा सच यही नहीं है. हिन्दी की आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि भी इसके विस्तार में बाधा है जिसकी चर्चा कोई नहीं करता. आज भी हम राजभाषा विभाग की तर्ज पर यही मानते हैं कि हिन्दी में काम करना हिन्दी की सेवा है. ब्लागिंग पर भी इसका असर दिखता है.
इंटरनेट की पहुंच समस्या नहीं है.
भारत में आज जितने लोग इंटरनेट का प्रयोग कर रहे हैं उसमें से कितने हिन्दीभाषी है? और जितने हिन्दीभाषी हैं उनमें से कितने अपनी भाषा में इंटरनेट पर काम करना चाहते हैं? इन दो सवालों के विश्लेषण से हमें जवाब मिल जाना चाहिए. इन सवालों का एक आसान जवाब यह है कि हिन्दी का तकनीकि विकास इस तरह से कभी हुआ ही नहीं कि आम उपभोक्ता इसके प्रति आकर्षित हो सके. थोड़ा मौका मिला तो कुछ जूनूनी लोग जुगाड़ तकनीकि का प्रयोग करके किसी तरह इंटरनेट पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं. इसलिए इंटरनेट पर हिन्दी आज भी भावनात्मक अभिव्यक्ति है न कि सहज जरूरत. इसलिए इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि इंटरनेट के विस्तार मात्र से हिन्दी में सक्रियता बढ़ जाएगी. कारण कुछ और हैं.
शब्दों का मानकीकरण समस्या नहीं है.
असल में इसे समस्या की तरह पेश किया जाता है. जिस अखबार में यह लेख छपा है उसने अपने आप को बहुत बदला है. बहुत से अंग्रेजी शब्दों को उसने देवनागरी में लिखना शुरू किया है. मसलन लेख का उपशीर्षक है “इस तेजी से डिवेलप होते मीडियम की क्षमता और सीमाओं पर साफ नजरिया बनाया जाना चाहिए” इस पूरे वाक्य में डिवेलप और मीडियम खटकते हैं. जबकि “ब्लॉग है कोई करिश्मा नहीं” में ब्लाग शब्द नहीं अखरता. इनकी जगह अगर आप विकसित और माध्यम को रखकर पढ़ें तो आपको वाक्य ज्यादा सहज लगेगा. यह भाषा में जबरिया आधुनिकता का तड़का लगानेवाले लोगों की समझ है जो मनमाफिक रूप से शब्दों के मानकीरण को समस्या मान लेते हैं. एक ही शब्द के दस शब्दरूप हों तो यह कोई समस्या नहीं है. वैविध्य भाषा का श्रृंगार होता है समस्या नहीं. नवभारत टाईम्स छाप मूर्ख मंडली अगर इस आधार पर भाषा के मानकीकरण की वकालत करे कि आप अंग्रेजी के शब्दों को जबरिया अपनी भाषा में ठूंस लें तो समस्या कम नहीं होगी बल्कि और बढ़ेगी. भाषा के प्रवाह में सहजरूप से कुछ शब्द शामिल हो जाते हैं उनका विरोध भी नहीं करना चाहिए लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप मीडियम, डिवेलप और बोल्ड जैसे शब्दों को शामिल करने को हिन्दी का मानकीकरण मान लें.
हिन्दी के ब्लाग किस दशा में हैं यह हम सबको पता है लेकिन इसकी क्या दिशा हो यह किसी को नहीं पता. डायरी लिखें या इसे सार्वजनिक अभिव्यक्ति का मंच बनने दें इस पर तो अभी ठीक से बहस भी नहीं खड़ी हुई. इस बात पर भी अभी ठीक से विचार शुरू नहीं हुआ कि क्या हिन्दी ब्लागर उनकी आवाज बन सकते हैं जिसकी आवाज मूल मीडिया ने उठाना छोड़ दिया है. फिर भविष्य में जब इंटरनेट अधिकांश लोगों के लिए सूचना का प्राथमिक विकल्प हो जाएगा तब एक भाषा के तौर पर हिन्दी कहा होगी और कहां होंगे इसमें काम करनेवाले लोग यह तो इस बहस से ही निकलकर सामने आयेगा. एक बात जरूर है कि ब्लाग की इतनी चर्चा इसलिए हो रही है कि कुछ उम्मीदें पाल रखी है लोगों ने. जब कोई नया माध्यम उभरता है तो उसके प्रति आकर्षित होना सहज है. हिन्दी ब्लाग के प्रति इतना ध्यानाकर्षण भी उसी आकर्षण का परिणाम है. सोचना तो उन ब्लागरों को है जो ब्लाग लिखना सीख गये हैं. वे अपनी इस अघोषित जिम्मेदारी का निर्वहन जैसा करेंगे हिन्दी ब्लागिंग का भविष्य भी वैसा ही होगा.
तकनीकि, शब्दों का मानकीकरण और इंटरनेट की पहुंच कोई समस्या नहीं है. यह सब तो अपनी गति से विस्तार पा लेगा क्योंकि यह बाजार की मजबूरी है. असल समस्या हमारी आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि में छिपा है. फिर भी नये माध्यम के अनोखेपन को बचाने की पहल तो हमें ही करनी होगी. क्यों?

13 thoughts on “ब्लॉग को ब्लॉग ही रहने दो

  1. “सोचना तो उन ब्लागरों को है जो ब्लाग लिखना सीख गये हैं. वे अपनी इस अघोषित जिम्मेदारी का निर्वहन जैसा करेंगे हिन्दी ब्लागिंग का भविष्य भी वैसा ही होगा.”
    सही कहा संजय जी आपने. विचारोत्तेजक लेख लिखा है.

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  2. विचारणीय!!
    सही कहा।
    एक तरह से देखा जाए तो भविष्य अभी गढ़ा ही जा रहा है क्योंकि वर्तमान ही तय करता है भविष्य!

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  3. हाँ बात वही है, सवेरा अभी हुआ है शाम की चिंता पहले ही सताने लगी। लोग कहते थे केबल टीवी के आने से भारतीय संस्कृति की अह्वेलना होने लगेगी। पर मुझे लगता है कि केबल टीवी के समाचार की वजह से कई बार दंगा फ़साद होने से बचता है क्योंकि अफ़वाहें नहीं फैलती हैं। किसी भी माध्यम को श्वेत-श्याम में रंगा नहीं जा सकता, वह तो उसका इस्तेमाल कैसे होता है उस पर निर्भर है। माध्यम तो बस उतना ही है – माध्यम भर।

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  4. बहुत सही फरमाया आपने, हिंदी का रोना रोने भर से कुछ नहीं होने वाला। यदि हमने हर स्तर पर इसे अभिव्यक्ति का माध्यम बनाए रखा, तो इसका परचम खुद ब खुद लहराएगा। आज के वैश्वीकरण के युग में हिंदी के महत्व को सवॅत्र स्वीकार किया जा रहा है, किया जाता रहेगा। हां, हिंदी अखबारों के शीषॅकों में अंग्रेजी के शब्दों को अनावश्यक रूप से ठूंसना कतई न्यायसंगत नहीं है।

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  5. संजय जी, मुझे लगता है कि यथास्थितिवादी सुविधाजीवी बुद्धिजीवियों की बात का जवाब देने की जरूरत नहीं है। ठहरे हुए पानी से कोई नयी अपेक्षा करना गलत है।

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  6. आपके विचारो से मै शतप्रतिशत सहमत हूँ |

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  7. baat me bahut dum hai, lekin aajki is global duniya me hindi bolne wale aur hindi jaanne wale clients ki percentage dekhke tulna karni chahiye, Enhglish ke mukable woh abhi bahut kam hai. Isilye vikas ka percentage bhi kum hi hoga.

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  8. इस बात पर भी अभी ठीक से विचार शुरू नहीं हुआ कि क्या हिन्दी ब्लागर उनकी आवाज बन सकते हैं जिसकी आवाज मूल मीडिया ने उठाना छोड़ दिया है.
    ———————–

    हमें तो सिर्फ अपनी बात कहनी है। क्रंति और लोगों की आवाज छाप बात तो तथाकथित बुद्धिमानों का काम है।

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  9. एक अच्छा अवलोकन।

    हिन्दी ब्लॉग अभी अभिव्यक्ति का माध्यम भर बने हुए है, अलबत्ता ये डायरी लेखन से आगे निकल चुका है, लेकिन फिर भी यह प्रथमावस्था है, क्योंकि अभी ये स्थापित होकर, एक पाठक वर्ग तलाश कर रहे है, जब अच्छी संख्या मे पाठक मिल जाएंगे तो अगले चरण मे सम-सामयिक और अन्य मुद्दों पर ब्लॉगरों की आवाज मुखर होगी, तीसरे/चौथे या अगले चरण मे ब्लॉग्स एक पूरक माध्यम बनकर उभरेंगे, इसी समय इसके व्यवसायिकरण की कवायद भी शुरु होगी, शायद वही स्वर्ण चरण होगा। सब कुछ निर्भर करता है कि कितने चिट्ठाकार अपने इस शौंक को जिंदा रखते है, कितनी कलमें (कीबोर्ड) बीच रास्ते मे दम तोड़ देती है, जो बचते है वे चिट्ठाकार कितना लिखते है, अपने लेखन को कितनी गम्भीरता से लेते है, कितने इसको व्यवसायिक स्तर पर ले जाते और रोजी रोटी कमाते है। ये सारी चीजे देखने लायक होंगी और निश्चय ये अपने आप मे एक इतिहास होगा।

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  10. हिन्दी वेब पर तेजी से बढ़ती जा रही है |
    हिन्दी चिट्ठे और हिन्दी वेबसाइट की संख्या बढ़ती जा रही |
    आज कल काफी कम्पनियाँ भी हिन्दी टूल्स लॉन्च कर रही है |
    http://www.google.com/transliterate/indic/ का तोह पता ही है | इस टूल की वजह से हिन्दी लिखना इतना आसान हो गया है की कोई भी आम आदमी आराम से हिन्दी लिख सकता है |
    ओरकुट ने भी हिन्दी का सपोर्ट दिया है |
    गोस्ताट्स नमक कंपनी ने भी एक ट्राफिक परिसंख्यान टूल हिन्दी मे लॉन्च किया है जिसके इस्तेमाल से आपको ट्रैफिक रिपोर्ट्स हिन्दी में मिलती है |
    http://gostats.in

    इससे जाना जा सकता है की हिन्दी का भविष्य इन्टरनेट पे बहुत अच्छा है

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