जो अभाव के कारण दिवाली नहीं मनाते

त्यौहारों में बाजार की भूमिका तो होती ही है. बाजार ही वे अखाड़े होते हैं जहां आप शक्ति प्रदर्शन करते हैं. अपने होने की प्रासंगिकता सिद्ध करते हैं. आप बाजार के जितने हिस्से को अपने घर में समेट लाते हैं आपके होने की उतनी ही प्रासंगिकता होती है. लेकिन बाजार की इस चमक-दमक और स्वार्थोल्लास में बहुत सारे लोग ऐसे भी होते हैं जो बाजार के किनारे पर ही खड़े रह जाते हैं. वे तो बस ताक-झांक से संतोष कर लेते हैं. आपकी खरीदारी से अपना मनोवैज्ञानिक रिश्ता जोड़कर मान लेते हैं कि उन्होंने भी त्यौहारों में शिरकत कर ली है. हर दीवाली में यही सवाल मेरे मन में गूंजता है कि जो बाजार में अपने होने का प्रमाण नहीं दे सकते क्या उनके लिए त्यौहारों का कोई मतलब नहीं है?

पैसे से संपन्न एक खास वर्ग में आधुनिकता की विधिवत सींग उगने के बावजूद परंपरा की पूंछ बरकरार है. इसलिए इस पूंछ की लाज रखने के लिए यह वर्ग त्योहारों को अपने हिसाब से परिभाषित करता है. अगर ये लोग किसी गुप्त कमरे में बैठकर यह सब कर लें और हमें भनक भी न लगे तो आलोचना की आशंका ही समाप्त हो जाए. लेकिन यह वर्ग जो करता है उसका असर नीचे तक होता है.

यह असर कुछ ऐसा है कि अमीर को लाभ और गरीब को लोभ. गरीब जितना लोभ करेगा अमीर उतना ही अमीर होता चला जाएगा. अमीर की अमीरी के लिए जरूरी है कि गरीब लोभ में जिए. गरीब करता भी वही है. तीन से पांच हजार रूपया महीना कमानेवाला एक पारिवारिक आदमी किसी मंहगे शहर में अगर दीवाली मनाना चाहे तो वह क्या कर सकता है? उसके सामने आय के भले ही सीमित विकल्प हों लेकिन जब इसी पूंजी के साथ वह बाजार में अपना हिस्सा लेने पहुंचता है तो उसके निवेश का भी तरीका वही होता है जो किसी करोड़पति का हो सकता है. वह भी ऐसी ही वस्तुओं पर निवेश करता है जिसका लाभार्थी कोई न कोई कंपनी होती है. आम आदमी के खर्च करने के तरीकों में जो बदलाव पैदा किया गया है उसे बड़ी कंपनियां अपनी बड़ी रणनीतिक सफलता मानती हैं. उपहार के नाम पर यह पांच हजारी आदमी नमकीन और चाकलेट का पैकेट खरीदे तो भला बताईये इसे क्या कहें? और शहरों की बात मुझे नहीं पता लेकिन इस दीवाली पर दिल्ली के अधिकांश बाजारों में बड़ी कंपनियों के दो-दो कौड़ी के आलू चिप्स और नमकीन-चाकलेट ही बिक रहे हैं. जो बड़ी खरीदारी करना चाहते हैं उनके लालच के सामान कहीं और सजे हैं. अगर सबकुछ ठीक-ठाक रहा तो कंपनियां अपने विज्ञापन के बल पर इतना सबकुछ बेच लेंगी कि उनकी असली दीवाली मन सके.

तो क्या इसे ही भारतीय त्यौहार मान लें. संयोग से गांवों और छोटे कस्बों में जहां कंपनियों का दखल नहीं बढ़ा है वहां त्यौहारों की पवित्रता बरकरार है. आधुनिकता का झाड़ू वहां लगे तो हो सकता है कि त्यौहारों की पारंपरिकता वहां से भी विदा हो जाए वैसे ही जैसे हमारे बड़े शहरों से विदा हो रहा है. अब बड़े शहरों में त्यौहार का मतलब होता है कंपनियों को अमीर बनाना. बहुत सारी गैर-जरूरी चीजों से घर को अजायबघर बना देना. जो ऐसा नहीं कर पाते उनके मन में एक हीनभावना पैदा कर दी जाती है कि उनका होना किसी काम का नहीं है. अगर आपको अपने होने की सार्थकता रखनी है तो आपको विज्ञापन आधारित खरीदारी करनी ही होगी.

मुझे नहीं लगता भारतीय त्यौहार इसलिए मनाए जाते हैं कि हम ज्यादा से ज्यादा अपनी लालसा को तृप्त करें. मेरा मानना है कि त्यौहार हमें त्याग सिखाते हैं. समाज में दूसरे के प्रति संवेदनशीलता और सहअस्तित्व से जीना सिखाते हैं. अपनी अतृप्त लालसा पूर्ति की जगह जरूरतमंद की जरूरत को पूरा करने का संदेश देते हैं. पता नहीं रामजी के आने के बाद अयोध्या में दीवाली कैसे मनी थी लेकिन मैं खेतों में दीपक रखते हुए बड़ा हुआ हूं. खेत की मेड़ पर दीपक रखा तो उस मिट्टी के प्रति सहज अपनापन हो गया जो किसी एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में शायद पीएचडी करने के बाद भी न हो. घर के मुंडेर पर दीपक इसलिए नहीं रखते कि पड़ोसी से प्रतियोगिता करनी है. मेरा घर जगमग हो तो तुम्हारा भी हो. मेरे आंगन में ही अकेली रोशनी क्यों हो. तुम्हारे आंगन में मेरे आंगन से ज्यादा रोशनी हो. आस-पास हर घर में दीपक जले इसकी एक अघोषित चिंता और व्यवस्था होती थी. अब भी है. हां, मात्रा का भेद जरूर आ गया है.
अब तो कई सालों से लगभग हर त्यौहार अकेले में गुजारता हूं. या कह सकते हैं मनाता नहीं. क्योंकि जब सब अपने-अपने दायरे में सिमट गये तो मुझे तो बाहर होना ही था. अब मैं उस जमात के साथ रहकर खुश हूं जो अभाव के कारण त्यौहार नहीं मनाता. स्वार्थ की रोशनी में जिन्हें नहाना हो नहाएं, मैं उन अभावग्रस्त लोगों के अंधियारे का साथी रहना चाहता हूं जिनके लिए साल के 365 दिन एक समान होते हैं और जो कहीं से भी बाजार की गणित का हिस्सा नहीं हैं.

4 thoughts on “जो अभाव के कारण दिवाली नहीं मनाते

  1. त्योहार हमारी सामूहिकता की अभिव्यक्ति हैं और आजकल सामूहिकता बाज़ार की चेरी हो गई तो त्योहार भी बाज़ार की लूट का माध्यम बन गए हैं। लेकिन सामूहिकता के कुछ वैकल्पिक इंतजाम तो होने चाहिए…

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  2. त्यौहार को सादगी से भी मनाया जा सकता है।..लेकिन आपने जो लेख लिखा है वह बहुत सी सच्चाईयां ब्यान कर रहा है।

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  3. “मेरा मानना है कि त्यौहार हमें त्याग सिखाते हैं. समाज में दूसरे के प्रति संवेदनशीलता और सहअस्तित्व से जीना सिखाते हैं.”

    काश इस साल हम में से हर एक अपने आसपास के एक निर्धन परिवार की मदद कर सके कि वे भी जीवन की खुशियां बटोर सकें — शास्त्री

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है.
    इस काम के लिये मेरा और आपका योगदान कितना है?

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