नंदीग्राम महासंग्राम

नंदीग्राम में सीपीएम द्वारा जारी कत्लेआम थमने का नाम नहीं ले रहा है. देशभर में जितना विरोध हो रहा है नंदीग्राम में हालात उतने ही बेकाबू होते जा रहे हैं. नंदीग्राम के आसपास के चार गांव सीपीएम द्वारा खाली करा लिये गये हैं. वहां के लोग सड़कों पर हैं. आशंका है कि 3 नवंबर से अब तक 150 लोगों को कत्ल किया जा चुका है. एक हजार से अधिक लोगों का पता नहीं है. नंदीग्राम का पूरा इलाका सीपीएम के कब्जे में है. अभी और कितनी लाशे बिछेंगी, कितना खून बहेगा, कितने बच्चे अनाथ होंगे और कितनी अबलाओं का बलात्कार होगा कुछ पता नहीं.

यह भी एक खबर ही है कि सीपीएम ने नंदीग्राम को पुनः अपने कब्जे में ले लिया है. इस खबर के दो अर्थ हैं. एक, यहां सरकार और प्रशासन का नामोनिशान नहीं है इसलिए यहां के बारे में सारा निर्णय सीपीएम का कॉडर ले रहा है. सीपीएम कॉडर ऐसा इसलिए कर रहा है क्योंकि पश्चिम बंगाल उसकी जागीर है और इस जागीर पर न तो केन्द्र सरकार का कोई अंकुश है और न ही किसी प्रकार के शासन का कोई डर. दो, इस इलाके में कुछ और लोग प्रभावी हो गये थे जिन्हें हटाकर सीपीएम ने वापस अपना कब्जा स्थापित कर लिया है. इन दो अर्थों से जो सवाल खड़ा होता है वह यह कि क्या नंदीग्राम पर कुछ ऐसे लोगों ने कब्जा कर लिया था जिन्हें हटाना राज्य प्रशासन के बूते की बात नहीं थी इसलिए सीपीएम ने अपने रक्त-पिपासु कॉडर का सहारा लिया? या फिर जानबूझकर यह अफवाह फैलायी जा रही है कि बाहरी तत्वों के हस्तक्षेप से निपटने के लिए सीपीएम के कॉडर खून-खराबा कर रहे हैं. ये बाहरी तत्व हैं कौन?

असल में नंदीग्राम में एक ही बाहरी तत्व है और उसका नाम है सलेम ग्रुप आफ कंपनीज जिसका केमिकल हब यहां बनना है. ग्यारह महीने पहले जब विरोध की शुरूआत हुई थी तब से लेकर आज तक आग बुझी ही नहीं. सीपीएम कॉडर वहां एक अघोषित युद्ध लड़ रहा था. अधिकांश लोग अपने घरों से बेदखल किये जा चुके हैं. लोगों को जबरिया घरों से निकालने का यह काम अगर राज्य प्रशासन करता तो उसे कई सारे सवालों का जवाब देना पड़ता. इसलिए सिंगूर का तर्ज पर यहां भी कॉडर के हाथों में हथियार देकर छोड़ दिया गया. क्योंकि यहां मारकाट करनी थी इसलिए कॉडर ने यह अफवाह फैलायी कि नक्सली यहां नंदीग्रामवासियों के साथ मिलकर हिंसा कर रहे हैं. इन नक्सलियों को स्थानीय बहुसंख्य मुस्लिम आबादी के साथ-साथ माओवादी और जमात-ए-उलेमा-ए-हिन्द जैसे संगठनों का भी समर्थन मिल रहा है. हालांकि गृहसचिव ने अपनी रिपोर्ट में ऐसे किसी भी प्रकार के बाहरी तत्व होने से इन्कार किया है.

फिर भी अब मार-काट करने के लिए कॉडर के पास पर्याप्त कारण थे. अब उनके पास लक्ष्य और लक्ष्य में आनेवाली बाधा दोनों को परिभाषित करने का अवसर था. लेकिन यह सवाल कोई नहीं उठा रहा है कि क्या सीपीएम कॉडर कोई वैध प्रशासनिक ईकाई है जो खुलेआम राज्य सरकार के समर्थन में युद्ध लड़ रहा है. मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने कत्लेआम का समर्थन करके साबित कर दिया है कि राज्य में शासन और प्रशासन का वही मतलब है जो सीपीएम परिभाषित करे. स्थानीय लोग अगर विरोध करते हैं तो इस बात का उन्हें पूरा हक है कि वे अपने घर और जमीन की रक्षा कर सकें. देश का कोई भी नागरिक अगर अपनी संपत्ति नहीं बेचना चाहता तो उसके साथ कोई जोर-जबर्दस्ती नहीं की जा सकती. लेकिन यहां क्या हो रहा है? अगर उनके साथ जोर-जबर्दस्ती होती है तो उन्हें इस बात का पूरा हक है कि वे जरूरी होने पर हिंसा का सहारा भी ले सकते हैं. कानून भी आत्मरक्षा में हथियार उठाना असंवैधानिक नहीं मानता. लेकिन यह सीपीएम वाले गुंडे किस हक से हथियार उठाये हुए घूम रहे हैं? क्या वे कोई ऐसी पारा-मिलिट्री फोर्स हैं जिसका गठन राज्य सरकार ने अपनी सुविधा के लिए कर रखा है जो हर तरह के कायदे-कानून और संविधान के ऊपर हैं ?

सीपीएम का पश्चिम बंगाल में 27 साल पुराना शासन इसी भय के आधार पर टिका है कि जो भी उसका विरोध करेगा उसको राज्य में रहने या फिर जीने का ही कोई हक नहीं है. सीपीएम ने साबित कर दिया है कि वह सुविधानुसार ही संविधान और कानून को मानती है. उसके प्रशासन में विरोध को कोई जगह नहीं है. जनवरी में जो विरोध शुरू हुआ वह पूंजी की जोर-जबर्दस्ती का विरोध है. सीपीएम ने इस विरोध को हिंसक तरीके से दबाकर यह साबित कर दिया है कि उसके प्रशासन में सिर्फ उसके समर्थक ही जिंदा रह सकते हैं. विरोध की कहीं कोई गुंजाईश नहीं है. धूर्त बुद्धदेव भट्टाचार्य बोलते समय अटकते हैं लेकिन कहते यही हैं कि भूमि उच्छेद कमेटी ने जो किया उसे उसका जवाब मिला है. हमारे लोगों के पास और कोई रास्ता नहीं बचा था. यह एक राज्य का मुख्यमंत्री बोल रहा है या सीपीएम का गुंडा? क्या एक राज्य का मुख्यमंत्री अपने ही राज्य के लोगों में हमारे और उनके का भेद कर सकता है? ऐसे निरंकुश मुख्यमंत्री को एक मिनट भी सत्ता में रहने का हक नहीं है. केन्द्र सरकार अगर इस सरकार को बर्खास्त नहीं करती तो इस देश की जनता को समझ लेना चाहिए कि अब इस देश में लोकतंत्र समाप्त हो चुका है. जब मोदी और बुद्धदेव जैसे नरभक्षी लोकतंत्र के रक्षक हों तो और क्या कहा जा सकता है?

One thought on “नंदीग्राम महासंग्राम

  1. क्या बुद्धदेव जी मोदी से कुछ ज्यादा ही प्रभावित हो गए हैं।

    गुजरात पर इतना हल्ला मचाने वाले अब खामोश क्यों हैं।

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